योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९९ पदार्थान्तरेषु स्पृहा, तस्याः सर्वस्याः स्पृहायाः परिपूरकं नित्यपरिपूर्णतृप्तिलक्षण- परमशिवसामरस्यप्रतिपादनेन । १सर्वसंक्षोभणम् । सर्वस्य क्षित्यादेः शिवान्तस्यो- र्युपरि तत्त्वक्रमेण २संक्षोभः, तस्य संहारलक्षणस्य कारकम्, भेदप्रपञ्चलयरूप- त्वात् । सर्वसौभाग्यदायकम् । सर्वसौभाग्यं सर्वस्पृहणीयता, तस्या दायकम्, सर्वस्पृहणीयपरप्रेमास्पदपरशिवैक्यप्रतिपादनेन । सर्वार्थसाधकम् । सर्वेषां वैदिकानां तान्त्रियाणां ३क्रियाणामर्थः प्रयोजनं परशिवप्राप्तिः, तदुक्तं महाकविभिः— बहुधा ह्यागमैर्भिन्नाः पन्थानः सिद्धिहेतवः । त्वय्येव निपतन्त्योघा जाह्नवीया इवार्णवे ॥ (रघु० १०।२६) इति । तत्साधयति । सर्वरक्षाकरम् । रक्षा नाम प्रतिकूलपदार्थादुपहतिपरिहारः । षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं सर्वमेव प्रतिकूलपदार्थः, तस्मात् सर्वस्माद् रक्षां शिवाहमभाव- भावनालक्षणां करोति । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— मान आशा शब्द का अर्थ है अतृप्त मन का नाना प्रकार के पदार्थों की प्राप्ति के लिये टकटकी लगाये रखना । इस तरह की सभी अभिलाषाओं की पूर्ति यह चक्र कर देता है, क्योंकि यह अपने उपासक को नित्य परिपूर्णतृप्ति से ओतप्रोत परमशिव के साथ एकरस कर देता है । ३. संहार दशा में पृथिवी से शिवपर्यन्त तत्त्वों का एक दूसरे में लय हो जाता है । सब तत्त्वों के संहारात्मक क्षोभ को करने वाला यह सर्वसंक्षोभण चक्र अपने साधक की समस्त भेददृष्टि का विलय कर देता है । ४. सबके द्वारा स्पृहणीय वस्तु को सर्वसौभाग्य कहते हैं। यह सर्वसौभाग्यदायक चक्र सभी के द्वारा अभिलषणीय परम प्रेम के स्थान परम शिव के साथ साधक को एकता प्रदान कर देता है । ५. सभी वैदिक और तान्त्रिक क्रियाकलाप का एक ही प्रयोजन है—परमशिव की प्राप्ति । जैसा कि महाकवि कालिदास ने कहा है— नाना प्रकार के शास्त्रों में पुरुषार्थ के साधक अनेक उपाय बताये गये हैं । किन्तु जैसे सभी नदियों का जल लेकर गंगा अन्ततः समुद्र में मिल जाती है, उसी तरह से इन सब उपायों से व्यक्ति अन्ततः आपके पास ही पहुँचता है ॥ इस प्रयोजन की सिद्धि करने वाला है सर्वार्थसाधक चक्र । (६) सर्वरक्षाकर चक्र सभी प्रकार के प्रतिकूल पदार्थों के सम्पर्क से होने वाले कष्ट से साधक को बचाता है । ३६ तत्त्वात्मक यह सारा जगत् प्रतिकूल पदार्थ है । इन सब में शिवाहंभाव की भावना का प्रसार कर यह चक्र उनके विपरीत प्रभाव से साधक की रक्षा करता है । अर्थात् सभी पदार्थों में शिव विराजमान हैं और मैं भी उस शिव से भिन्न नहीं हूँ, इस प्रकार के ज्ञान का उदय हो जाने पर साधक जगत् में सभी प्रकार के प्रतिकूल पदार्थों से सुरक्षित हो जाता है । परापंचाशिका में बताया गया है— १. सर्वक्षोभकरं-ख. ग. ज. झ. उ. । २. क्षोभस्य सं-ख. ग. ज. झ. । ३. क्रियाणामर्थः-ग. ज. ।