भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१०० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः अहमि प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः । पराक्रमपरो भुङ्क्ते स्वभावमशिवापहम् ॥ (श्लो० ५०) इति । सर्वरोगहरम् । भेद‌लक्षणं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं सर्वमेव रोगः, तस्य हरम्, अभेदप्रतीतिहेतुत्वात् । अत्रैवोक्तम्- "विकल्परूपरोगाणां हारिणी खेचरी परा" (१।८६) इति । सर्वसिद्धिमयम् । सर्वस्य सिद्धिरुत्पत्तिः स्थितिः संहारश्च, तन्मयम्, त्रिकोणस्य सर्वसृष्टिस्थितिसंहारहेतुत्वात् । तदुक्तं¹ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये- "चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः" (सू० १) इति । सर्वानन्दमयम् । शिवशक्तिलक्षणप्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपत्वात् । अत्र सर्वत्र प्रवृत्तिनिमित्तभेदादद्वैतविश्रान्तिरेव परमार्थः ॥८२-८४॥ पूर्वोक्तवासनाचक्रस्य प्रयोजनमाह— अत्र पूज्या महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी । इदन्तारूपी प्रतियोगी (शत्रु) का अहन्ता में विलय करने के प्रयास में लगा साधक अन्ततः सभी प्रकार के अमंगल का नाश कर देने वाले अपने शिवस्वभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ (७) परस्पर भिन्न ३६ तत्त्व वाला यह सारा संसार ही एक रोग है । सर्वरोगहर चक्र परस्पर की भेद दृष्टि को मिटाकर सबमें अभेद प्रतीति को जगाकर सभी रोगों के निदानभूत इस मूल रोग को ही मिटा देता है । अभी (१।६८) मुद्रा के प्रकरण में भी बताया गया है कि "खेचरी मुद्रा सारे विकल्पात्मक रोगों का नाश करने वाली है।" (८) सर्वसिद्धिमय का अर्थ है सारे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाला । त्रिकोण चक्र ही सबकी सृष्टि आदि का कारण है । प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है कि "चिति शक्ति ही विश्व की सिद्धि में कारण है"। (९) शिव और शक्ति की, प्रकाश और विमर्श की समरसभाव से स्थिति सर्वानन्दमय चक्र में रहती है । इस तरह से यह चक्र सभी प्रकार के आनन्दों से ओतप्रोत है । ऊपर सभी नौ चक्रों के नामों की वासना बताई गई है । इन सबमें शब्दों की भिन्नता भले ही हो, किन्तु सबका वास्तविक अर्थ अद्वय शिवतत्त्व में विश्रान्ति प्राप्त करना ही है ॥८२-८४॥ ऊपर चक्र की जो त्रिविध और नवविध वासना बताई गई है, अब उसका प्रयोजन बताते हैं— इस तरह से त्रिविध और नवविध वासना के द्वारा भावित श्रीचक्र में महा- देवी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा करनी चाहिये ॥८५॥ १. क्तमीश्वरप्रत्यभिज्ञीयम्—ख.। विहार्थं सर्वत्र