योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०१ महादेवी। महती देशकालाकारैरनाकलितत्वात्, द्योतनादिति देवी, देवी- पदाभिधेया विमर्शरूपा। अत्र "त्रिधा च नवधा च" (१।७२) इति पूर्वोक्तवासना- चक्रे। महात्रिपुरसुन्दरी। महती अनावरणा चिद्रूपिणी, त्रिपुरा १तुर्यरूपत्वात्, सुन्दरी स्वस्वात्मतया २सर्वस्य स्पृहणीयत्वात्। एवं विद्या स्वसंविद्देवता पूज्या वक्ष्यमाण(३।२-४)परादित्रिविधरूपया पूजया भावनीया। त्रैलोक्यमोहनादिनवचक्राणां स्वस्वनामानु३रूपार्थवासनालक्षणफलान्युक्त्वे- दानीं समष्टिचक्रस्य फलमाह— परिपूर्णं महाचक्रमजरामरकारकम् ॥८५॥ परिपूर्णं ४नवचक्रसमष्टिरूपं महायोनि५मध्यमहाबिन्दु६चक्रस्फुरत्प्रकाशविमर्श- सामरस्यरूपपराप्रभापटलमयसर्वानन्दमयं ७सर्वावरणसमग्रं च महाचक्रम्। विश्व- महात्रिपुरसुन्दरी महादेवी इसलिये है कि यह देश, काल और आकार से अनाकलित है, अस्पृष्ट होने से महान् है और प्रकाशमान होने से विमर्शस्वरूपिणी देवी है। "त्रिधा च नवधा च" (१।७२) इत्यादि श्लोकों के द्वारा जिस चक्र की त्रिधा और नवधा भावना विधि का वर्णन किया गया है, उसी चक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा करनी चाहिये। यह देवी निरावरण चित्स्वरूपिणी है, इसका चित्स्वरूप सदा प्रकाशमान है, इसको कोई आवृत नहीं कर सकता, इसलिये यह महान् है। यह तुरीयस्वरूप वाली है, अतः त्रिपुरा है, तीन-तीन संख्या वाली सभी वस्तुओं को पैदा करने वाली होने से उनसे पहले विद्यमान है। यह सुन्दरी इसलिये है कि अपनी आत्मा के समान इसका स्वरूप सबको स्पृहणीय है, सभी साधक इस स्वरूप को प्राप्त करना चाहते हैं। इन विशेषणों वाली अपनी ही संवित्ति (ज्ञान) में भासित हो रही इस देवता की आगे (३।२-४) बताई गई परा, अपरा, परापरा नामक पूजा के त्रिविध प्रकारों से उपासना करनी चाहिये। त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों का अपने नाम के अनुरूप अर्थ बताने से उनकी भावना का फल भी बता दिया गया है। अब समष्टि (सम्पूर्ण) चक्र की भावना का फल बताते हैं— नवचक्रसमष्टिस्वरूप इस परिपूर्ण चक्र की भावना करने से साधक अजर और अमर हो जाता है ॥८५॥ परिपूर्ण महाचक्र का अर्थ है नवचक्रसमष्टि स्वरूप महायोनि (मध्यत्रिकोण) के मध्य में विराजमान बिन्दुचक्र। इसी सर्वानन्दमय चक्र में विराजमान प्रकाश और विमर्श १. तुरीय-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. सर्वस्पृह-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ३. रूप- लक्षणफला-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ४. 'नवचक्रसमष्टिरूपं' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ५. 'मध्य' नास्ति-ख. ने.। ६. 'चक्र' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. 'सर्वा- वरणसमग्रं च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.।