भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१०२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः मयविश्वोत्तीर्णपरामयत्वाद् अजरामरकारकम् । अजरः कालत्रयातीतत्वात्, ^१अत एवामर उत्पत्तिविनाशरहितत्वात्, अजरामरः ^२परमशिवः । ^३कारकं स्वपूज- कस्य ^४कालत्रयातीतोत्पत्तिविनाशरहितनित्यपरशिवत्वप्राप्तिलक्षणं मोक्षं करोती- त्यर्थः ॥८५॥ चक्रसंकेतमुपसंहरति— एवमेष महाचक्रसंकेतः परमेश्वरि । कथितस्त्रिपुरादेव्या जीवन्मुक्तिप्रवर्तकैः^५ ॥८६॥ एवम् उक्तप्रकारेण । त्रिपुरादेव्याः पूर्वोक्त(१।६)लक्षणायाः । महाचक्रसंकेतः षट्-त्रिंशत्तत्त्वचक्ररूपत्वान्महाचक्रम्। जीवतो मुक्तिः जीवन्मुक्तिः । मुक्तिर्हि बन्धना- ^६दुद्धन्धनं घृणादिपाशाष्टकेन । ^७कोऽर्थः ? परशिवादित्वगुरुपरदेवताधिगतपर- के सामरस्य स्वरूप के परम तेजोमय प्रभापटल से अन्य सभी चक्रों और आवरण- देवताओं का प्रकाश चारों तरफ़ फैलता है। इस तरह से यह महाचक्र मूलदेवता और आवरण देवताओं के प्रकाश से परिपूर्ण हो जाता है। विश्वमय और विश्वोत्तीर्ण दोनों स्वरूपों से संयुक्त होने से यह पराशक्तिमय चक्र अजरता और अमरता को प्रदान करने वाला है। तीनों कालों से अतीत होने से अजर और उत्पत्ति तथा विनाश से रहित होने से अमर वस्तुतः परम शिव ही है। यह चक्र अपनी पूजा करने वाले साधक को तीनों कालों से अतीत और उत्पत्ति-विनाश से रहित नित्य परमशिव पद (मोक्ष) को प्राप्त करा देता है ॥८५॥ अब चक्रसंकेत प्रकरण का उपसंहार करते हैं— हे परमेश्वरि ! इस तरह से मैंने तुमको जीवन्मुक्ति प्रदान करने वाले इस चक्रसंकेत प्रकरण का उपदेश किया है ॥८६॥ ऊपर बताई गई विधि से पूर्वोक्त लक्षण वाली त्रिपुरा देवी का यह महाचक्रसंकेत साधक को इसी जीवन में मुक्ति प्रदान कर देता है। श्रीचक्र को महाचक्र यहाँ इसलिये कहा गया है कि यह चक्र ही ३६ तत्त्वों के महाचक्र का स्वरूप धारण करता है। मनुष्य घृणा आदि पूर्व वर्णित (१।७२) आठ पाशों से बँधा रहता है। यह महाचक्र साधक को इन बन्धनों से छुड़ा देता है। इसका अभिप्राय यह है कि परम शिव से लेकर १. अमरः, अत एवोत्पत्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'परम' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. 'कारकं' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. कालातीतनित्यपरशिवप्राप्ति- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. प्रदायकः-क. उ. । ६. नादामोचनं-उ. । ७. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.