योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०३ सार्थश्चक्रसंकेतकः स्वपरामर्शकस्य हठादेव सकलपाशविनाशनेन शिवाहमभाव- भावनां प्रवर्तयतीत्यर्थः ॥८६॥ इति श्रीपरमयोगीन्द्रपरमहंसपुण्यानन्दशिष्यपरमहंसामृतानन्द- योगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदयदीपिकायां चक्रसंकेतः प्रथमः ॥ ● अपने गुरु पर्यन्त चली आ रही परदेवतामय गुरुपरम्परा से इस चक्रसंकेत प्रकरण का वास्तविक अभिप्राय समझ कर और उस पर अमल कर साधक अनायास ही ऊपर बताए गये पाशों से मुक्त हो जाता है और अपने भीतर इस बात का अनुभव करने लगता है कि मैं तो शिव ही हूँ ॥८६॥ इस तरह से परमयोगीन्द्र परमहंस पुण्यानन्द के शिष्य परमहंस अमृतानन्द योगिप्रवर विरचित योगिनीहृदयदीपिका का यह पहला चक्रसंकेत प्रकरण पूरा हुआ ॥१॥ ●