भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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मन्त्रसंकेतो द्वितीयः १अथ द्वितीयं मन्त्रसंकेतं श्रोतॄजनप्रवृत्तये फलप्रतिपादनपूर्वकं वक्तुं प्रतिजानीते— मन्त्रसंकेतं दिव्यमधुना कथयामि ते । यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत् ॥१॥ दिव्यं प्रकाशविमर्शरूपपरशिवपराशक्तिप्रतिपादनपरत्वात् । मन्त्रसंकेतकम् । मननात् त्रायन्ते साधकमिति मन्त्राश्चिन्मरीचयः । तद्वाचकत्वाद् वैखरीवर्णविलास- भूतानां सौभाग्यविद्यादीनां मननत्राणता । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"मननात् त्राण- धर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः" इति । संकेतकं२ पूर्वोक्त(१।६)लक्षणम् । ३अधुना कथयामीति । प्रकाशात्मकोऽहं ते विमर्शरूपिण्याः कथयामि, हृदयङ्गमतां नयामी- त्यर्थः । यद्वेत्ता यस्य मन्त्रसंकेतस्य४ वेत्ता ज्ञाता । त्रिपुराकारो वेदनसपरि- स्फुरत्परशिवभट्टारकः । वीरचक्रेश्वरो भवेत् । वीराः पूर्वोक्त(१।६५)लक्षणाः, तेषां अब द्वितीय मन्त्रसंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है । श्रोतागण इस ओर प्रवृत्त हों, इसके लिये इसकी फलश्रुति भी यहाँ दी जा रही है— अब मैं दिव्य मन्त्रसंकेत प्रकरण का तुम्हें उपदेश कर रहा हूँ । इसको जानने वाला वीरचक्र का स्वामी त्रिपुरास्वरूप हो जाता है ॥१॥ मन्त्रसंकेत दिव्य इसलिये है कि यहाँ प्रकाश-विमर्श स्वरूप परमशिव और पराशक्ति का प्रतिपादन किया गया है । मन्त्र शब्द का अर्थ है अपना मनन करने वाले साधक की रक्षा करने वाली चिच्छक्ति की किरणें । सौभाग्यविद्या प्रभृति मन्त्रों के वाचक वैखरी वाणी के विलास स्वरूप वर्णों में भी चिच्छक्ति का स्फुरण विद्यमान है । अतः इनमें भी मनन करने वाले का त्राण करने की शक्ति विद्यमान होने से ये मन्त्र कहलाते हैं । संकेत- पद्धति में कहा गया है—"मनन करने से त्राण (रक्षा) करता है, इसलिये इसको मन्त्र कहते हैं" । संकेतक शब्द का अर्थ पहले (१।६) बता दिया गया है । अब मैं मन्त्रसंकेत को कह रहा हूँ, मैं प्रकाशात्मक शिव तुम जैसी विमर्शरूपिणी देवी के हृदय में बैठा रहा हूँ । इस मन्त्रसंकेत का जानकार त्रिपुराकार हो जाता है, उसको सदा अपने परशिव- भट्टारक स्वरूप का भान होने लगता है । वह वीरचक्रेश्वर हो जाता है । वीर का लक्षण पहले (१।६५) बताया जा चुका है, उनका चक्र हुआ समूह । इस समूह का वह स्वामी १. 'अथ' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ. । २. संकेतं-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'अधुना कथयामि' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ. । ४. संकेतस्य-ख. ने. ज. झ. उ. ।