योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्रसंकेतो द्वितीयः १अथ द्वितीयं मन्त्रसंकेतं श्रोतॄजनप्रवृत्तये फलप्रतिपादनपूर्वकं वक्तुं प्रतिजानीते— मन्त्रसंकेतं दिव्यमधुना कथयामि ते । यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत् ॥१॥ दिव्यं प्रकाशविमर्शरूपपरशिवपराशक्तिप्रतिपादनपरत्वात् । मन्त्रसंकेतकम् । मननात् त्रायन्ते साधकमिति मन्त्राश्चिन्मरीचयः । तद्वाचकत्वाद् वैखरीवर्णविलास- भूतानां सौभाग्यविद्यादीनां मननत्राणता । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"मननात् त्राण- धर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः" इति । संकेतकं२ पूर्वोक्त(१।६)लक्षणम् । ३अधुना कथयामीति । प्रकाशात्मकोऽहं ते विमर्शरूपिण्याः कथयामि, हृदयङ्गमतां नयामी- त्यर्थः । यद्वेत्ता यस्य मन्त्रसंकेतस्य४ वेत्ता ज्ञाता । त्रिपुराकारो वेदनसपरि- स्फुरत्परशिवभट्टारकः । वीरचक्रेश्वरो भवेत् । वीराः पूर्वोक्त(१।६५)लक्षणाः, तेषां अब द्वितीय मन्त्रसंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है । श्रोतागण इस ओर प्रवृत्त हों, इसके लिये इसकी फलश्रुति भी यहाँ दी जा रही है— अब मैं दिव्य मन्त्रसंकेत प्रकरण का तुम्हें उपदेश कर रहा हूँ । इसको जानने वाला वीरचक्र का स्वामी त्रिपुरास्वरूप हो जाता है ॥१॥ मन्त्रसंकेत दिव्य इसलिये है कि यहाँ प्रकाश-विमर्श स्वरूप परमशिव और पराशक्ति का प्रतिपादन किया गया है । मन्त्र शब्द का अर्थ है अपना मनन करने वाले साधक की रक्षा करने वाली चिच्छक्ति की किरणें । सौभाग्यविद्या प्रभृति मन्त्रों के वाचक वैखरी वाणी के विलास स्वरूप वर्णों में भी चिच्छक्ति का स्फुरण विद्यमान है । अतः इनमें भी मनन करने वाले का त्राण करने की शक्ति विद्यमान होने से ये मन्त्र कहलाते हैं । संकेत- पद्धति में कहा गया है—"मनन करने से त्राण (रक्षा) करता है, इसलिये इसको मन्त्र कहते हैं" । संकेतक शब्द का अर्थ पहले (१।६) बता दिया गया है । अब मैं मन्त्रसंकेत को कह रहा हूँ, मैं प्रकाशात्मक शिव तुम जैसी विमर्शरूपिणी देवी के हृदय में बैठा रहा हूँ । इस मन्त्रसंकेत का जानकार त्रिपुराकार हो जाता है, उसको सदा अपने परशिव- भट्टारक स्वरूप का भान होने लगता है । वह वीरचक्रेश्वर हो जाता है । वीर का लक्षण पहले (१।६५) बताया जा चुका है, उनका चक्र हुआ समूह । इस समूह का वह स्वामी १. 'अथ' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ. । २. संकेतं-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'अधुना कथयामि' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ. । ४. संकेतस्य-ख. ने. ज. झ. उ. ।