भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०५ चक्रं समूहः, तस्येश्वरः परशिवः । कोऽर्थः ? एतन्मन्त्रसंकेतप्रतिपादितश्रीविद्यादि- मन्त्ररहस्यभूतपरभावनाप्रणाशितमायाजालः परशिव एव भवेदित्यर्थः ॥१॥ ^२पूर्वोक्तत्रैलोक्यमोहनादिनवचक्रेश्वरीमन्त्रानेवोपक्रम्य मन्त्रसंकेतमारभते— करशुद्धिकरी त्वाद्या द्वितीया चात्मरक्षिका । आत्मासनगता ^३देवी तृतीया तदनन्तरम् ॥२॥ चक्रासनगता पश्चात् सर्वमन्त्रासनस्थिता । साध्यसिद्धासना षष्ठी मायालक्ष्मोमयी परा ॥३॥ हो जाता है, परशिवभावापन्न हो जाता है। इसका भाव यह है कि इस मन्त्रसंकेत प्रकरण में प्रतिपादित श्रीविद्या नामक मन्त्र के रहस्य को ठीक तरह से जानकर और उसकी उपासना कर साधक परशिव-स्वरूप हो जाता है, क्योंकि इस मन्त्र का मनन करने से उस पर छाया माया का जाल छिन्न-भिन्न हो जाता है ॥१॥ त्रैलोक्यमोहन प्रभृति नौ चक्रों का उल्लेख पहले (१।८२-८४) हो चुका है । इन नौ चक्रों की अधिष्ठात्री देवियों के मन्त्रों के उपक्रम के साथ अब मन्त्रसंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है— ^१करशुद्धिकरी विद्या पहली, आत्मरक्षिका दूसरी और उसके बाद आत्मा- सनगता देवी तीसरी विद्या है। बाद में चक्रासनगता चौथी, सर्वमन्त्रासनस्थिता १. विद्यामन्त्रार्थभूतपरभावनाप्राशस्त्यशाली परशिव-ख. ग. ने. उ. । २. पूर्व- मनन्तरोक्तत्रैलोक्य-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. देवि-च. छ. ज. झ. । १. नित्याषोडशिकार्णव (१।९७-११८) में करशुद्धिकरी से लेकर मूलविद्या पर्यन्त आठ विद्याओं (मन्त्रों) का उद्धार बताया गया है। वहाँ उनका विनियोग साधक की कर- शुद्धि, आत्मरक्षा, स्वात्मासनशुद्धि, चक्रासनशुद्धि, मन्त्रासनशुद्धि, साध्यसिद्धासन(आवरण- देवतासन)शुद्धि तथा मूलदेवी के आवाहन एवं आराधन (पूजन) के लिये किया गया है । इन आठ विद्याओं का वहाँ उद्धार बता दिया गया है, अतः यहाँ (योगिनीहृदय में) केवल एक (सातवीं) विद्या का उद्धार किया गया है और इन नौ विद्याओं का विनियोग नौ चक्रों की अधिष्ठात्री त्रिपुरा प्रभृति नौ नित्याओं के विन्यास के लिये किया गया है। यहाँ यह स्मरणीय है कि नित्या. षो. की व्याख्या अर्थरत्नावली (पृ० १०७) में संकेतपद्धति के वचन के प्रमाण से आठ नित्याओं की ही चर्चा की गई है। नव नित्याओं का उल्लेख नित्या. षो. में कहीं नहीं मिलता। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि संकेतपद्धति की रचनाकार का दृष्टिकोण योगिनीहृदय के प्रभाव से बदल गया

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