योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः मूर्तिविद्या च सा देवी सप्तमी परिकीर्तिता । अष्टम्यावाहिनी विद्या नवमी भैरवी परा ॥४॥ करशुद्धिकरी— आत्मतत्त्वगतयोरशुद्धयोरत्र कर्मकरणात्मनोर्द्वयोः । शुद्धतत्त्वलयभावनामयी शुद्धिरात्मकरयोः परा मता ॥ (चि० ११) इत्यस्मदुक्तरीत्या कर्मेन्द्रियान्तःपातिनोः करयोरशुद्धतत्त्वान्तर्गतयोरशुद्धयोः शुद्धतत्त्वलयभावना शुद्धिः, तत्करीयं विद्या, पराहन्ताप्रतिपादनपरत्वात् । अत्रैव वक्ष्यति—"कर्मेन्द्रियाणां वैमल्यात् करशुद्धिकरी स्मृता" (३।१२५) इति । आद्या त्रैलोक्यमोहनचक्रेश्वरी १विद्येत्यर्थः । नन्वत्र करशुद्ध्यादिमन्त्राणां संख्यामेव करोति, किमिति नोद्धरति ? उच्यते, वामकेश्वरशास्त्र एवासामुद्धारः२, अत्र त्वज्ञातार्थप्रतिपादनपरत्वादस्य शास्त्रस्येति न मन्त्रोद्धारः क्रियत इति । द्वितीया पाँचवीं, साध्यसिद्धासना छठी और मूर्तिविद्या सातवीं है। माया, लक्ष्मी और पराबीज से इसका स्वरूप बनता है। आठवीं विद्या आवाहिनी और परा भैरवी नवीं विद्या है ॥ २-४॥ करशुद्धिकरी विद्या का स्वरूप स्वयं ग्रन्थकार ने अपने चिद्विलास स्तव में इस तरह से बताया है— साधक के अपने दोनों हाथों की गिनती कर्मेन्द्रिय में होती है, जो कि अशुद्ध आत्म- तत्त्व के अन्तर्गत आते हैं। इनकी शुद्ध शिवस्वरूप में लीन होने की भावना ही उत्कृष्ट शुद्धि मानी जाती है ॥ इस तरह से कर्मेन्द्रिय में गिने जाने वाले, अशुद्ध तत्त्व के अन्तर्गत स्थित होने से अशुद्ध हाथों की शुद्ध तत्त्व में लय की भावना को यहाँ शुद्धि कहा गया है । यह कर- शुद्धिकरी विद्या पराहन्ता का प्रतिपादन करके इस शुद्धि का संपादन करती है । आगे (३।१२५) यहीं बताया जायगा कि "कर्मेन्द्रियों की पवित्रता की संपादिनी यह विद्या करशुद्धिकरी नाम से जानी जाती है"। यह पहली विद्या पहले त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी है। यहाँ करशुद्धिकरी आदि विद्याओं की संख्या ही बताई गई है, उद्धार नहीं किया गया । इसका कारण यह है कि इनका उद्धार वामकेश्वर शास्त्र में ही कर दिया गया है । योगिनीहृदय शास्त्र का आरम्भ वामकेश्वर शास्त्र में अज्ञात विषयों के प्रति- पादन के लिये ही हुआ है, अतः पुनः उन विद्याओं के उद्धार की यहाँ आवश्यकता नहीं है । दूसरी विद्या आत्मरक्षिका है । चिद्विलास स्तव में स्वयं ग्रन्थकार ने बताया है— १. 'विद्या' नास्ति क. ख. ग. घ. पु.। २. 'उक्तः' इत्यधिकः ख.।