योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
१०६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः मूर्तिविद्या च सा देवी सप्तमी परिकीर्तिता । अष्टम्यावाहिनी विद्या नवमी भैरवी परा ॥४॥ करशुद्धिकरी— आत्मतत्त्वगतयोरशुद्धयोरत्र कर्मकरणात्मनोर्द्वयोः । शुद्धतत्त्वलयभावनामयी शुद्धिरात्मकरयोः परा मता ॥ (चि० ११) इत्यस्मदुक्तरीत्या कर्मेन्द्रियान्तःपातिनोः करयोरशुद्धतत्त्वान्तर्गतयोरशुद्धयोः शुद्धतत्त्वलयभावना शुद्धिः, तत्करीयं विद्या, पराहन्ताप्रतिपादनपरत्वात् । अत्रैव वक्ष्यति—"कर्मेन्द्रियाणां वैमल्यात् करशुद्धिकरी स्मृता" (३।१२५) इति । आद्या त्रैलोक्यमोहनचक्रेश्वरी १विद्येत्यर्थः । नन्वत्र करशुद्ध्यादिमन्त्राणां संख्यामेव करोति, किमिति नोद्धरति ? उच्यते, वामकेश्वरशास्त्र एवासामुद्धारः२, अत्र त्वज्ञातार्थप्रतिपादनपरत्वादस्य शास्त्रस्येति न मन्त्रोद्धारः क्रियत इति । द्वितीया पाँचवीं, साध्यसिद्धासना छठी और मूर्तिविद्या सातवीं है। माया, लक्ष्मी और पराबीज से इसका स्वरूप बनता है। आठवीं विद्या आवाहिनी और परा भैरवी नवीं विद्या है ॥ २-४॥ करशुद्धिकरी विद्या का स्वरूप स्वयं ग्रन्थकार ने अपने चिद्विलास स्तव में इस तरह से बताया है— साधक के अपने दोनों हाथों की गिनती कर्मेन्द्रिय में होती है, जो कि अशुद्ध आत्म- तत्त्व के अन्तर्गत आते हैं। इनकी शुद्ध शिवस्वरूप में लीन होने की भावना ही उत्कृष्ट शुद्धि मानी जाती है ॥ इस तरह से कर्मेन्द्रिय में गिने जाने वाले, अशुद्ध तत्त्व के अन्तर्गत स्थित होने से अशुद्ध हाथों की शुद्ध तत्त्व में लय की भावना को यहाँ शुद्धि कहा गया है । यह कर- शुद्धिकरी विद्या पराहन्ता का प्रतिपादन करके इस शुद्धि का संपादन करती है । आगे (३।१२५) यहीं बताया जायगा कि "कर्मेन्द्रियों की पवित्रता की संपादिनी यह विद्या करशुद्धिकरी नाम से जानी जाती है"। यह पहली विद्या पहले त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी है। यहाँ करशुद्धिकरी आदि विद्याओं की संख्या ही बताई गई है, उद्धार नहीं किया गया । इसका कारण यह है कि इनका उद्धार वामकेश्वर शास्त्र में ही कर दिया गया है । योगिनीहृदय शास्त्र का आरम्भ वामकेश्वर शास्त्र में अज्ञात विषयों के प्रति- पादन के लिये ही हुआ है, अतः पुनः उन विद्याओं के उद्धार की यहाँ आवश्यकता नहीं है । दूसरी विद्या आत्मरक्षिका है । चिद्विलास स्तव में स्वयं ग्रन्थकार ने बताया है— १. 'विद्या' नास्ति क. ख. ग. घ. पु.। २. 'उक्तः' इत्यधिकः ख.।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०७ चात्मरक्षिका। "भेदलक्षणविपक्षसंकटोत्तारणं परमिहात्मरक्षणम्” (चि० ७) इत्यस्मदुक्तरीत्या भेदप्रपञ्चलक्षणप्रतिपक्ष²पराभवरूपसंकटाद् रक्षामभेदप्रतीतिरूपां पराहन्ताप्रतिपाद³नेनात्मनः करोतीत्यात्मरक्षिका द्वितीया सर्वाशापरिपूरकाख्य- द्वितीयचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। आत्मासनगता देवी⁴ तृतीया। "⁵आत्मचक्रमनुदेवता- त्मनामासनं शिवमयतवभासनम्” (चि० ४५) इत्यस्मदुक्तरीत्या साधकचक्रमन्त्र- देवतानां स्वसंविद्रूपतयाऽनुसन्धानलक्षणासनचतुष्टयविद्यानामादिभूताऽऽत्मासन- गता विद्या तृतीया सर्वसंक्षोभकर⁶लक्षणतृतीयचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। ⁷तदनन्तरं चक्रासनगता। तदनन्तरोक्तचक्रासनगता चतुर्थी विद्या सर्वसौभाग्यदायक लक्षण- चतुर्थचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। पश्चात् सर्वमन्त्रासनस्थिता। अनन्तरोक्त⁸वासना- पूर्वोक्त(२।१ )लक्षणमननत्राणलक्षणचिन्मरीचिप्रसरेणाखिलावरणदेवतामन्त्रासन- "भेददृष्टि ही विपक्ष का संकट उपस्थित करती है, शत्रु का काम करती है। उस संकट से उबारना ही सबसे बड़ी आत्मरक्षा है”। इस तरह से भेददृष्टि-प्रधान इस संसाररूपी प्रपंच से, जो कि साधक के सामने पराजय का संकट उपस्थित कर देता है, अभेद प्रतीति रूप अद्वयदृष्टि प्रदान कर पराहन्ता का स्वरूप समझा कर यह विद्या उसकी रक्षा करती है। इसलिये यह दूसरी विद्या आत्मरक्षाकारी कहलाती है और दूसरे सर्वाशापरि- पूरक नामक चक्र की स्वामिनी है। आत्मासनगता देवी तीसरी विद्या है। चिद्विलास स्तव में ही बताया गया है-“आत्मा, चक्र, मनु (मन्त्र) और देवता इनकी आसन के रूप में भावना का अर्थ इनमें शिवमयंता की भावना करना है, अर्थात् ये चारों शिवमयं ही हैं”। इस तरह से साधक, चक्र, मन्त्र और देवता ये सभी आसन के रूप में भगवती संवित् के ही स्वरूप हैं। अतः इन चारों आसनों की विद्याओं में पहली और ऊपर बताए गये क्रम से तीसरी यह आत्मासनगता विद्या सर्वसंक्षोभकर नामक तीसरे चक्र की अधिष्ठात्री है। इसके आगे चक्रासनगता विद्या है। अभी बताये गये चार आसनों में से दूसरे चक्रासन में विराजमान यह चौथी विद्या सर्वसौभाग्यदायक नामक चतुर्थ चक्र की स्वामिनी है। इसके बाद सर्वमन्त्रासनस्थिता विद्या है। अभी मन्त्रासन की भावना चिद्विलास स्तव के प्रमाण से बताई है और पहले (२।१) मनन और त्राण करने वाली मन्त्रशक्ति की किरणों का उल्लेख किया गया है। इन किरणों का फैलाव समस्त १ संकटात्-मु.। २. 'पराभवरूप' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ३. नेन तथा-ने. ज., मेन वा-झ. उ. । ४. देवि-ज. झ. । ५. अष्ट'...'सा विमर्शमनयत् स्वभास-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. 'कर' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ७. अनन्तरं चक्रसंकेतोक्तचक्रासनयुक्ता विद्या-ख. ग. ने. उ. । ८. वासनामननत्राणचिन्म-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ९. प्रसरा-
१०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः स्थिता पञ्चमी विद्या, सर्वार्थ^१साधकाभिधानलक्षणपञ्चमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः । साध्यसिद्धासना षष्ठी । सर्वपीठनिवासिन्यः सर्वगाश्चिन्मरीचयः । भैरव्यो^२ भरिताकारा रक्षन्तु कुलमातरः ॥ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या ^३चिन्मरीचिमयपरिणतावरणदेवताः साध्याः ^४सृष्टिस्थाः सप्तसंख्याकत्रिकोणादिषोडशदलान्तचक्रपदगताश्चतुरस्रत्रयपदगताश्च देवताः सृष्टिक्रमरूपत्वात् साध्याः । तदुक्तमत्रैव—"सृष्टिः ^५स्यान्नवयोन्यादि- पृथ्व्यन्तम्" (१।७७) इति । साध्यास्ता एव संहृतिकाले सिद्धाश्चतुरस्रादिबेन्दवान्त- क्रमेणोपसंहृताः। तदुक्तमत्रैव—"संहृतिः पुनः पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तम्" (१।७७-७८) इति । अत्र सिद्धिः संहारः । तदुक्तं^६ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये—"चितिः स्वतन्त्रा विश्व- सिद्धिहेतुः" (सू० १) इति । एवं सृष्टिसंहारक्रमेणानुसन्धीयमानानां साध्य- आवरण देवताओं के मन्त्रासन तक हैं। इस तरह से यह पाँचवीं विद्या समस्त मन्त्रासनों में विराजमान है और सर्वार्थसाधक नाम के पाँचवें चक्र की अधिष्ठात्री देवी है। साध्य- सिद्धासना छठी विद्या है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति की उक्ति है— सभी पीठों में निवास करने वाली, सर्वत्र विचरण करने वाली, चिति शक्ति की किरणों से अभिव्यक्त परिपूर्ण स्वरूप वाली भैरवियाँ कुलदेवियाँ मेरी रक्षा करें ॥ इस तरह से चिति शक्ति की किरणें ही आवरण देवताओं का स्वरूप धारण कर लेती हैं। इन्हीं को यहाँ 'साध्य' नाम से कहा गया है। सृष्टि क्रम से त्रिकोण, वसुकोण, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, मनुकोण, अष्टदल और षोडश दल इन सात चक्रों में और चतुरस्रत्रय में विद्यमान देवता सृष्टिक्रम का प्रतिनिधित्व करने के कारण साध्य कहे जाते हैं। नवयोनि से पृथ्वी पर्यन्त चक्रक्रम की सृष्टि संज्ञा है, यह बात यहाँ पहले (१।७७) ही बता दी गई है। ये साध्य देवता ही संहार क्रम से चतुरस्र से बैन्दव पर्यन्त चक्र में स्थित होकर 'सिद्ध' कहलाते हैं। पृथ्वी से नवयोनि पर्यन्त चक्र-क्रम की संहार संज्ञा है, यह भी पहले (१।७७-७८) ही बता दिया गया है। यहाँ सिद्धि का अर्थ संहार है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है—"चितिशक्ति स्वतन्त्र रूप से विश्व की सिद्धि (सृष्टि और संहार) करती रहती है"। इस तरह से सृष्टि और संहार के क्रम से जिनका अनु- १. साधनलक्षण-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. रम्यास्ता वाक्पराकारा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. चिन्मरीच्यावरण-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. साधकदशायां सप्तषष्टि- संख्यात्रिको-क. ग. ज. उ. । ५. सृष्टिस्थं-ज. झ. उ. । ६. 'कमीश्वरप्रत्यभिज्ञायाम्' इत्येव ग. विद्वान् सर्वत्र.
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०९ सिद्धानामावरणदेवतानामासने स्थिता विद्या साध्यसिद्धासना षष्ठी, सर्वरक्षाकर- नामधेयषष्ठचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। मायालक्ष्मीमयी परा मूर्तिविद्या च सा देवी१ सप्तमी परिकीर्तितेति। अस्या विद्यायाश्चतुःशतीशास्त्रेऽनुद्धृतत्वादत्रोद्धारः क्रियते। माया २भुवनेश्वरीबीजम्, लक्ष्मीः श्रीबीजम्, तन्मयी तत्प्रचुरा। ३तयो- रूर्ध्वगता परा— चतुर्दशयुतं भद्रे तिथीशान्तसमन्वितम्। तृतीयं ब्रह्म सुश्रोणि हृदयं भैरवात्मनः॥ (श्लो० ९) इति श्रीपरात्रिंशिकोक्त४बीजं परा५, परावाचकत्वात्। तद्बीजत्रयात्मिका [६ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मकत्वाच्च सा विद्या श्रीमहात्रिपुरसुन्दरीमूर्तिकल्पनायां विनियुक्ता] सप्तमी सर्वरोगहराभिधानसप्तमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। अष्टम्यावाहिनी विद्या। सन्धान (भावना) किया जाता है, उन सभी साध्य और सिद्ध देवताओं के आसन पर विराजमान यह छठी विद्या साध्यसिद्धासना कहलाती है। यह सर्वरक्षाकर नामक छठे चक्र की स्वामिनी है। सातवीं मूर्तिविद्या है। माया, लक्ष्मी और परा बीज से इसका उद्धार होता है। चतुःशती शास्त्र में इस विद्या का उद्धार नहीं बताया गया है, अतः यहाँ इसका उद्धार किया गया है। माया भुवनेश्वरी बीज को और लक्ष्मी श्रीबीज को बताते हैं। इस विद्या में इनकी प्रधानता है। इन दोनों के ऊपर परा बीज का उद्धार करने पर इस विद्या का स्वरूप बनता है। परा बीज का उद्धार परात्रिंशिका में बताया गया है— हे भद्रे, हे सुश्रोणि, तृतीय ब्रह्म सकार को चतुर्दश स्वर (औ) से संयुक्त कर और उसके अन्त में तिथीशान्त (विसर्ग) को लगा कर जो बीज बनता है, वह भगवान् भैरव का हृदय है॥ इस तरह में माया, लक्ष्मी और परा बीज को मिलाकर इस विद्या का स्वरूप बनता है। यह विद्या तीन बीजों वाली है तथा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिये इसका उपयोग श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी की मूर्ति की कल्पना में किया जाता है। यह सातवीं विद्या सर्वरोगहर नाम के सातवें चक्र की अधिष्ठात्री है। आठवीं विद्या है आवाहिनी। आवाहन का आन्तर स्वरूप चिद्विलास में वर्णित है— १. देवि—ज. झ.। २. भुवनेशी—क. ख. ने. ज. उ.। ३. तद्द्वयोर्ध्वगता—ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ४. ॠतीत्या—क. ने. उ.। ५. 'परा' नास्ति—ज. झ. उ.। ६. 'मूर्तिविद्या च सा' इत्येव पाठः—ज. ग. ने. ज. झ. उ.।
११० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः आन्तरस्य निजसंविदात्मनो मातुरक्षकरणाध्वना बहिः । मेयसंविदि समर्पणं तदावाहनं समरसत्वलक्षणम् ॥ (चि० २०) इत्यस्मदुक्तरीत्या स्वहृदयकमलकर्णिकामध्ये स्फुरन्त्याः संवित्कलायाः “आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन” (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रान्त- रोक्तपरिपाट्या बहिरर्थप्रसेरणलक्षणावाहिनी विद्या सर्वसिद्धि²प्रदाऽष्टमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः । नवमी भैरवी परा । भैरवी विश्वस्य भरणात् स्थितिहेतुतया, रक्षणात् परचिन्मात्रपर्यवसानलक्षणसंहारकारणतया, वमनात् सृष्टिहेतुतया च ॥२-४॥ ननु भैरवी चतुःशतीशास्त्रे नोक्ता, किमित्यत्र नोद्धृता, सप्तमचक्रेश्वरी विद्या चोद्धृतेत्यत आह— मूलविद्या तथा प्रोक्ता त्रैलोक्यवशकारिणी । निज संवित्ति स्वरूप आन्तर प्रमाता का अन्तःकरण और बहिरिन्द्रियों के माध्यम से प्रमेय पदार्थों के रूप में अपने को समर्पित कर देना ही, उनसे समरसता प्राप्त कर लेना ही आवाहन है । इसका अभिप्राय यह है कि साधक के आवाहन पर संवित्स्वरूपिणी भगवती चक्र, मूर्ति इत्यादि बाह्य प्रमेय पदार्थों में प्रतिष्ठित हो जाती है । इस तरह से अपने हृदयकमल की कर्णिका में स्फुरित हो रही संवित्कला, न्याय- भाष्यकार वात्स्यायन की पद्धति से—“आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय बाह्य विषय से संयुक्त होती है” इस क्रम से बाह्य अर्थों में अपना प्रसार कर लेती है । आठवीं आवाहिनी विद्या के प्रभाव से यह कार्य सम्पन्न होता है। यह विद्या सर्वसिद्धिप्रद नामक आठवें चक्र की स्वामिनी है । आगे की नवीं विद्या भैरवी है । विश्व का भरण, रक्षण और वमन करने से यह भैरवी कहलाती है । यह देवी स्थितिकाल में विश्व का भरण करती है, संहारकाल में अपने परचित् स्वरूप में विश्राम देकर विश्व की रक्षा करती है और सृष्टिकाल में अपने स्वरूप में से इसको फिर निकाल देती है । इस तरह से भरण, रक्षण और वमन क्रियाओं के प्रथम अक्षरों को ग्रहण कर भैरवी का स्वरूप बनता है ॥२-४॥ प्रश्न उठता है कि यह नवीं भैरवी विद्या भी चतुःशती शास्त्र में उपदिष्ट नहीं है, तब इसका उद्धार यहाँ क्यों नहीं किया गया । यहाँ तो केवल सप्तम चक्रेश्वरी मूर्तिविद्या का ही उद्धार बताया गया है । इसका समाधान देते हैं— यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या कही गई है, जो सारे त्रैलोक्य को अपने वश में करने वाली है । १. प्रसारलक्षणावाहने विहिताऽष्टमी-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. प्रदाभिधाना- ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १११ मूलं विश्वस्य शिवादेर्भूम्यन्तस्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपं १परं तेजो वेदयतीति मूलविद्या तथा प्रोक्ता भैरवी कथिता नान्या। अस्या- स्तत्रैवोद्धृतत्वान्नात्रोद्धारः। अन्यथा सप्तमचक्रेश्वरीवदत्रोद्धरेत्। वक्ष्यति— “मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि” (२।७) इति। त्रैलोक्यमुक्त (१।८२) लक्षणं वशीकरोति २सर्जने संहारे च स्वायत्तं करोतीति ॥५॥ वक्ष्यमाणपूजासंकेते वक्तुं योग्यमपि न्यासं नवचक्रेश्वरीविद्यानां प्रसङ्गा- न्मण्डूकप्लुतिन्यायेनाह— एवं नवप्रकारास्तु पूजाकाले प्रयत्नतः ॥५॥ एताः क्रमेण न्यस्तव्याः साधकेन कुलेश्वरि । एवमुक्तप्रकारेण। नवप्रकारा एताश्चक्रेश्वरीविद्याः। साधकेन एतद्विद्योपा- सकेन मोक्षमात्मनः साधयितुमिच्छता। कुलेश्वरी। कुलं मेयमानमातृरूपम्। शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों का मूल कारण प्रकाश और विमर्श का सामरस्यमय परम तेज ही है, इस विषय का ज्ञान कराने वाली होने से यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या के नाम से चतुःशती शास्त्र में वर्णित है। यहाँ वर्णित भैरवी मूल- विद्या ही है, कोई दूसरी नहीं। इस मूलविद्या का उद्धार वहाँ कर दिया गया है। यदि ऐसा न होता तो सप्तम चक्रेश्वरी विद्या के समान यहाँ इसका भी उद्धार बताया जाता। आगे (२।७) बताया गया है—“हे परमेश्वरि ! मूलविद्या से व्यापक न्यास करना चाहिये”। यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या है। त्रैलोक्य पद की व्याख्या कर दी गई है (१।८२)। इस त्रैलोक्य को यह मूलविद्या सृष्टि और संहार दोनों अवस्थाओं में अपने ही अधीन रखती है ॥५॥ आगे कहे जाने वाले तृतीय पूजासंकेत के न्यास-प्रकरण में ही न्यास का वर्णन करना उचित था, किन्तु नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का प्रसंग होने से १मण्डूकप्लुति न्याय से उनसे संबद्ध न्यासों का वर्णन यहीं किया जा रहा है— हे कुलेश्वरि ! साधक को चाहिये कि वह पूजा करते समय प्रयत्नपूर्वक क्रम से ऊपर बताई गई नौ प्रकार की विद्याओं का न्यास करे ॥५-६॥ इस तरह से इन नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का यहाँ वर्णन किया गया है। साधक का अर्थ यहाँ मुक्ति की कामना वाला श्रीविद्या का उपासक है। कुलेश्वरि ! यह संबोधन १. ‘परं’ नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. सर्जनसंहारैः स्वा-ने. झ. उ. । १. मण्डूक-प्लुति न्याय का विवरण हमने विज्ञानभैरव भाषानुवाद, पृ. ३७ की टिप्पणी में दे दिया है। यहाँ विशेषता यह है कि यह मण्डूक-प्लुति आगे की ओर न बढ़कर उलटी हुई है, अर्थात् तृतीय संकेत में वर्णित न्यास प्रकरण का कुछ अंश प्रसंगवश यहाँ आ गया है।
११२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्—"मेयै¹मातृमितिलक्षणं कुलं प्रान्ततो व्रजति यत्र विश्रमम्" (श्लो० ७२) इति । तस्य सर्जने संहारे च ईश्वरि । अत्र श्रुतिः—"यथो- र्णनाभिः सृजते गृह्णते च" (मु० उ० १।१।७) इति । आज्ञावतारेऽप्युक्तम्— "स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इति । पूजाकाले वक्ष्यमाणसंकेतोक्त- सपर्यासमये२ । प्रयत्नतः "प्रयत्न³स्तदवाप्तौ तु व्यापारोऽतित्वरान्वितः" (द० रू० १।२०) इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या ⁴श्रद्धावेशितया क्रमेण न्यस्तव्याः ॥५-६॥ तत्स्थानान्याह— पादाग्रजङ्घाजानूरुगुदलिङ्गाग्रकेषु च ॥६॥ स्पष्टम्५ ॥६॥ आधारे विन्यसेन्मूर्तिं तस्यामावाहिनीं न्यसेत् । मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि ॥७॥ पद है । कुल का अर्थ है मेय, मान और माता का समूह । चिद्गगनचन्द्रिका में बताया गया है—"यह मेय, मान और मिति लक्षण वाला कुल इस भगवती के एक अंश में विश्राम प्राप्त करता है"। इस कुल की सृष्टि और संहार में समर्थ भगवती यहाँ कुलेश्वरी कही गई है । यहाँ मुण्डक श्रुति का प्रमाण दिया गया है कि जैसे मकड़ी जाला बनाती है और उसको निगल लेती है, उसी तरह से यह भगवती सृष्टि और संहार व्यापार में स्वतन्त्र है । आज्ञावतार में भी कहा गया है—"अपनी इच्छा से ही यह सारे जगत् को निगलती और उगलती रहती है" । "अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिये आतुरतापूर्ण व्यापार ही प्रयत्न है" दशरूपक के इस कथन के अनुसार साधक को चाहिये कि वह पूरी श्रद्धा के साथ आगे पूजासंकेत प्रकरण में बताई जाने वाली विधि से पूजा करते समय प्रयत्नपूर्वक क्रमशः इन विद्याओं का न्यास करे ॥५-६॥ न्यास के स्थानों का वर्णन आगे किया जा रहा है— पादाग्र, जंघा, जानु, ऊरु, गुदा और लिंगाग्र—इन छः स्थानों में क्रमशः प्रथम छः विद्याओं का न्यास करे ॥६॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥६॥ आधार में मूर्तिविद्या का और इस मूर्तिविद्या में आवाहिनी विद्या का विन्यास करे । हे परमेश्वरि ! मूलविद्या से व्यापक न्यास करना चाहिये ॥७॥ १. मान-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. संकेते । क्रमः पर्यायक्रमः-ख. ग. ने. झ. उ. । ३. स्तु तदप्राप्तौ-म. । ४. श्रद्धा-झ. । ५. नास्ति-ने. ज. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११३ आधारे विन्यसेन्मूर्तिम् । पादाग्रादीनां बाह्यत्वेन प्रसिद्धत्वात् पृथक्करण- माधारमूर्त्योरान्तरत्वद्योतनार्थम् । आधारे पूर्वोक्ते (१।२५) चतुर्दले ²कमले । मूर्ति मूर्तिविद्यां ³सप्तमीं न्यसेत्⁴ । तस्यां मूर्तावेवावाहिनीं न्यसेत् । मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि । मूलेन नवमचक्रेश्वरीविद्यया, सौभाग्यविद्ययेति यावत् । स्पष्टमन्यत् ।।७।। नवचक्रेश्वरीविद्यानां न्यासमुक्त्वा तदाधार⁵भूतनवचक्राणामपि⁶ चिन्ता- लक्षणमान्तरन्यासमाह— अकुलादिषु पूर्वोक्तस्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरीसमायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥८॥ अकुलादिषु “अकुले विषुसंज्ञे च” (१।२५) इत्यत्र पूर्वोक्तस्थानेषु । आदिशब्दे- नाष्टौ वह्नि-शाक्त-नाभि-अनाहत-विशुद्ध-लम्बिकाग्रभ्रुवोरन्तर-इन्दवो⁷ गृह्यन्ते । पादाग्र आदि छः पूर्वोक्त स्थान बाह्य अंग के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस श्लोक में आधार और मूर्ति का वर्णन किया गया है। इन दो स्थानों का यहाँ अलग से वर्णन इनकी आन्तरता का द्योतक है। आधार का अर्थ है पूर्व वर्णित (१।२५) मूलाधारस्थानीय चतुर्दल कमल। इसमें सप्तमी मूर्तिविद्या का विन्यास करना चाहिये। इस मूर्तिविद्या में आठवीं आवाहिनी विद्या का विन्यास करे। हे परमेश्वरि ! मूलविद्या, अर्थात् नवम चक्र- श्वरी विद्या, सौभाग्यविद्या से व्यापक न्यास सम्पन्न करना चाहिये। बाकी शब्दावली का अर्थ स्पष्ट है ॥७॥ नौ चक्रेश्वरी विद्याओं के न्यास के बाद अब इन विद्याओं के आधारभूत नौ चक्रों के भी भावनात्मक आन्तर न्यास का वर्णन करते हैं— पूर्वोक्त अकुल आदि स्थानों में चक्रेश्वरी सहित पूर्व वर्णित नौ चक्रों की भावना करनी चाहिये ॥८॥ अकुल आदि शब्द से पूर्व वर्णित (१-२५) ¹अकुल, वह्नि, शाक्त, नाभि, अनाहत, विशुद्ध, लम्बिकाग्र, भ्रूमध्य और बिन्दु का ग्रहण किया जाता है। पहले चक्रसंकेत प्रकरण १. पृथग् ग्रहणम्–ज. । २. 'कमले मूर्ति' नास्ति–ख. ज. झ. । ३. 'सप्तमी' नास्ति– ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. न्यसेत् स्मरेत्–ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. 'भूत' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'अपि' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ७. बिन्दवो–क. ख. ने. ज. झ. उ. ।
- पृ० ३६-३७ की टिप्पणी का अवलोकन कीजिये। यहाँ व्याख्याकार ने नौ संख्या पूरी करने के लिये बिन्दु का अलग से ग्रहण किया है। यह उचित नहीं लगता। वस्तुतः अकुल के बाद विषु स्थान का ग्रहण होना चाहिये। भास्करराय ने ऐसा ही किया है। तब भ्रूमध्य के अतिरिक्त ललाटस्थ बिन्दुस्थान की आधार के रूप में कल्पना नहीं करनी पड़ेगी। ८
११४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः पुरोदितं चक्रसंकेतोदितं नवचक्रं चक्रेश्वरोसमायुक्तं नवचक्रेश्वर्य्यधिष्ठितं परि- चिन्तयेत् । १कोऽर्थः ? अकुले सुषुम्ना २मूलारुणसहस्रदलकमले त्रिपुराधिष्ठितं त्रैलोक्यमोहनचक्रम्, वह्नावाधारे चतुर्दलकमले ३त्रिपुरेश्यधिष्ठितं सर्वाशापरि- पूरणं चक्रम्, शाक्ते स्वाधिष्ठानस्थितषड्दलकमले त्रिपुरसुन्दर्य्यधिष्ठितं सर्वसंक्षो४- भणं चक्रम्, नाभौ दशदलकमले त्रिपुरवासिन्यधिष्ठितं सर्वसौभाग्यदायक५- चक्रम्, अनाहते हृदि द्वादशदलकमले त्रिपुराश्रीसमधिष्ठितं सर्वार्थसाधकं चक्रम्, विशुद्धे षोडशदलकमले त्रिपुरमालिन्यधिष्ठितं सर्वरक्षाकरं चक्रम्, लम्बिकाग्रे ६तालुमूलेऽष्टदलकमले त्रिपुरासिद्धयधिष्ठितं सर्वरोगहरं चक्रम्, भ्रुवोरन्तरे द्विदल- कमले त्रिपुराम्बिकाधिष्ठितं सर्वसिद्धिप्रदं चक्रम्, इन्दौ ललाटे बिन्दौ महा- त्रिपुरसुन्दर्यधिष्ठतं सर्वानन्दमयं७ चक्रं भावयेदित्यर्थः ॥८॥ पूर्वोक्तविद्यानां नवचक्रेश्वरीणां नामान्याह— तासां नामानि वक्ष्यामि यथानुक्रमयोगतः । तत्राद्या त्रिपुरा देवी द्वितीया त्रिपुरेश्वरी ॥९॥ में वर्णित नौ चक्रों की, जो अभी हाल में वर्णित नौ चक्रेश्वरियों से अधिष्ठित हैं, इन नौ स्थानों में भावना करनी चाहिये । इसका अभिप्राय यह है—अकुल, अर्थात् सुषुम्ना के मूल में स्थित लाल वर्ण के सहस्रदल कमल में चक्रेश्वरी त्रिपुरा से अधिष्ठित त्रैलोक्यमोहन चक्र की, वह्नि अर्थात् चतुर्दल आधार कमल में त्रिपुरेशी से अधिष्ठित सर्वाशापरिपूरक चक्र की, शाक्त अर्थात् स्वाधिष्ठान में स्थित छः दल वाले कमल में त्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वसंक्षोभण चक्र की, नाभि स्थित दश दल वाले कमल में त्रिपुरवासिनी से अधिष्ठित सर्वसौभाग्यदायक चक्र को, अनाहत अर्थात् हृदय स्थित- द्वादशदल कमल में त्रिपुराश्री से अधिष्ठित सर्वार्थसाधक चक्र की, विशुद्ध नामक षोडश दल कमल में त्रिपुरमालिनी से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर चक्र की, लम्बिकाग्र अर्थात् तालु के मूल में स्थित अष्टदल कमल में त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित सर्वरोगहर चक्र की, भ्रूमध्य स्थित द्विदल कमल में त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रद चक्र को और इन्दु अर्थात् ललाट स्थित बिन्दु में चक्रेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी देवी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय चक्र की भावना करनी चाहिये ॥८॥ पूर्वोक्त नौ चक्रेश्वरी विद्याओं के नाम ये हैं— अब मैं यथोचित आनुपूर्वी से इनके नाम बताऊँगा । इनमें पहली त्रिपुरा १. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. मूलभागेऽरुण-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. त्रिपुरेश्वरीयुक्तं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. क्षोभकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. दायकं-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'तालुमूले' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. श्लोकार्थो नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११५ तृतीया च तथा प्रोक्ता देवी त्रिपुरसुन्दरी । चतुर्थी च महादेवि¹ देवी त्रिपुरवासिनी ॥१०॥ पञ्चमी त्रिपुराश्रीः स्यात् षष्ठी त्रिपुरमालिनी । सप्तमी त्रिपुरासिद्धिराष्टमी² त्रिपुराम्बिका ॥११॥ नवमी तु महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी । स्पष्टम् ॥९-१२॥ नन्वेताश्च विद्या नवचक्रेश्वर्यः पादाग्रादिष्वकुलादिस्थानेषु च भावनारूपेण क्रमेण न्यस्तव्या एव किम्³ ? नेत्याह— पूजयेच्च क्रमादेता नवचक्रे पुरोदिते ॥१२॥ एताः पुरोदितास्त्रिपुराद्या विद्या नवचक्रेश्वर्यः। पुरोदिते "त्रैलोक्यमोहनं चक्रम्" (१।८२-८४) इत्यादिपूर्वोक्ते । नवचक्रे इत्येकवचनमन्योन्याविश्लेषकथनार्थम् । अकुलादिनवस्थानेष्वन्योन्यसंयुक्ततयैव विभावितेषु नवचक्रेष्वित्यर्थः । क्रमात् पूजयेच्च त्रैलोक्यमोहनं चक्रमारभ्य प्रतिचक्रमेकैकां क्रमेण⁴ पूजयेदित्यर्थः ॥१२॥ देवी है। दूसरी त्रिपुरेश्वरी और तीसरी का नाम त्रिपुरसुन्दरी कहा गया है। हे महादेवि ! चौथी देवी त्रिपुरवासिनी, पांचवीं त्रिपुराश्री, छठी त्रिपुरमालिनी, सातवीं त्रिपुरासिद्धि, आठवीं त्रिपुराम्बिका और नवीं महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी है ॥९-१२॥ इन श्लोकों का अर्थ स्पष्ट है ॥९-१२॥ अब प्रश्न उठता है कि क्या इन नौ चक्रेश्वरी विद्याओं की पादाग्र आदि बाह्य और अकुल आदि आन्तर स्थानों में केवल न्यास और भावना ही क्रम से की जाती है ? इस प्रश्न का समाधान यह है— पूर्वोक्त नौ चक्रों में न्यास और भावना के साथ ही इन चक्रेश्वरियों की पूजा भी करनी चाहिये ॥१२॥ अभी त्रिपुरा आदि नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का वर्णन किया गया है। पहले (१।८२- ८४) बताये गये नौ चक्रों में इनकी पूजा करनी चाहिये। नवचक्र पद में एकवचन इस अभिप्राय को प्रकट करता है कि ये चक्र नौ होते हुए भी एक ही हैं, एक दूसरे से मिले हुए हैं, इनको एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। अकुल आदि स्थानों में इनके परस्पर मिले हुए स्वरूप की भावना की जाती है। इस तरह से अकुल आदि स्थानों में १. देवी—क. ख. ग. ज. । २. सिद्धा ष्टष्टमी—क. उ. । ३. 'किम्' नास्ति—ख. ग. घ. ज. । ४. 'क्रमेण' नास्ति—ख. घ. ते. ज. ।
११६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु किमासां नवधात्वं स्वाभाविकम् ? नेत्याह- एवं नवप्रकाराद्या पूजाकाले तु पार्वति । एकाकारा ह्याद्यशक्तिरजरामरकारिणी ॥१३॥ आद्या शिवादिक्षित्यन्तस्य जगतो निदानत्वात् । आद्या शक्तिराद्यशक्तिः । आद्यस्य सकलवर्णादिभूतस्य प्रकाशात्मनः परशिवस्य शक्तिर्विमर्शरूपिणी । एका- कारा परापूजाकाले तेन निरन्तरं सामरस्यमापन्ना । अपरापूजाकाले तु तथा न भवति । एवमुक्तप्रकारेण । नवप्रकारा नवविधा भिन्ना । एवंविधपूजकस्य अज- रामरकारिणी । अजमरामर उक्तलक्षणः (१।८५) शिवः, तत्त्वमस्य करोति । अत्रैव वक्ष्यति- "तव नित्योदिता पूजा त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता" (३।२) इति ॥१३॥ प्रासङ्गिकमुपसंहृत्य प्रकृतमेव प्रधानं मन्त्रसंकेतमुद्दिशति- मन्त्रसंकेतकतस्तस्या नानाकारो व्यवस्थितः । नानामन्त्रक्रमेणैव पारम्पर्येण लभ्यते ॥१४॥ परस्पर संयुक्त रूप से विभावित इन नौ चक्रों में, त्रैलोक्यमोहन चक्र से लेकर सर्वानन्दमय पर्यन्त चक्रों में, क्रमशः एक-एक देवी का पूजन भी करे ॥१२॥ क्या चक्रेश्वरों के ये नौ भेद स्वाभाविक हैं? नहीं- हे पार्वति ! यह आद्या शक्ति पूजा के समय ही ये नौ रूप धारण करती है। वस्तुतः यह शक्ति एक ही है और यही साधक को अजरामर शिव स्वरूप बना देती है ॥१३॥ शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त जगत् का मूलकारण होने से यह शक्ति आद्या कहलाती है। जो आद्या है और शक्ति भी है, वह है आद्यशक्ति। यह आद्यशक्ति सकल मातृका वर्णों में प्रथम आने वाले अनुत्तर अकार स्वरूप प्रकाशात्मक परशिव के साथ विमर्शरुपि हकार के रूप में मिली रहती है, साधक जब परा पूजा में निरत रहता है, तो यह शक्ति शिव के साथ निरन्तर यामलभाव में विद्यमान रहती है। किन्तु अपरा पूजा में उसकी यह स्थिति नहीं रहती। उस समय तो यह ऊपर बताए नौ स्वरूप धारण कर लेती है। इस तरह की पूजा करने वाले साधक को यह शक्ति अजरामर बना देती है। अजरामर शब्द की व्याख्या हम पहले (१।८५) कर चुके हैं। तदनुसार परमशिव ही अजरामर हैं। जो साधक ऊपर बताई गई परा और अपरा पूजा का अनुष्ठान करता है, उसको यह देवी अजरामर शिवस्वरूप बना देती है। पूजा के इन प्रकारों का वर्णन आगे (३-२) किया जायेगा ॥१३॥ प्रसंगवश आई इन बातों का उपसंहार कर अब प्रस्तुत प्रधान विषय मन्त्रसंकेत का विवरण उपस्थित करते हैं- उस परा भगवती का मन्त्रसंकेत अनेक रूपों में विभक्त है। अनेक मन्त्रों के क्रम से इसका ज्ञान गुरुपरम्परा से ही प्राप्त हो सकता है ॥१४॥
[ द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११७ तस्याः परशिवसामरस्यरूपायाः पराया यो मन्त्रः सौभाग्यविद्यारूपः, तस्य संकेतो गूढार्थप्रदर्शनम्। नानाकारः अनन्तरवक्ष्यमाणषड्विधरूपः। नानामन्त्र- क्रमेणैव अनन्तरपूर्वोक्तकरशुद्ध्यादिनानाप्रपञ्चपरिपाट्यैव। पारम्पर्येण लभ्यते सोपानावरोहरीत्या शिवादिस्वगुरुपर्यन्तपरम्परोपदेशकमेण लभ्यते, नान्यथा। पारम्पर्यविहीनानामसम्प्रदायवतां चुम्बकवृत्त्या चौर्याविगताक्षरपाठमात्रपर्यवसि- तानामनर्थायैव केवलमित्यर्थः। अत्रैव वक्ष्यति— पारम्पर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः। तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥ (२।८१) इति ॥१४॥ उद्दिष्टस्य मन्त्रसंकेतस्य विभागं प्रतिजानीते— षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे। परशिव के साथ समरसभाव में स्थित उस परा भगवती के सौभाग्यविद्या के नाम से प्रसिद्ध मन्त्र का संकेत (स्वरूप) अत्यन्त निगूढ, रहस्यमय अर्थों से भरा हुआ है। इनके छः प्रकारों का वर्णन अभी आगे किया जायेगा। इन अर्थों का ज्ञान अभी बताए गये करशुद्धिविद्या प्रभृति मन्त्रों की क्रमशः गुरुपरम्परा से प्राप्त विधि से उपासना करने पर ही हो सकता है। जैसे हम सीढियों की सहायता से प्रासाद से नीचे उतरते हैं, उसी तरह से शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आई परम्परा से ही ज्ञान हमारे पास पहुँचता है। ज्ञान प्राप्ति का इसके सिवाय दूसरा कोई मार्ग नहीं है। जो व्यक्ति इस गुरुपरम्परा से ज्ञान प्राप्त नहीं करते, जिनका कोई सम्प्रदाय नहीं है और जो चुम्बक वृत्ति से, चोरी से कुछ अक्षरों का ज्ञान प्राप्त करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, ऐसे व्यक्ति को इनसे कोई लाभ नहीं मिलता, उलटे ऐसा करने वाले को इससे हानि ही उठानी पड़ती है। यहीं आगे (२।८१) बताया जायेगा— जिनको परम्परा से कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है और जो अपने स्वयंभू ज्ञान पर गर्व कर पारम्परिक ज्ञान को प्राप्त करना भी नहीं चाहते, समय (साम्प्रदायिक परम्परा) का लोप करने वाले, शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करने वाले ऐसे व्यक्तियों को डाकिनी प्रभृति देवियां विद्रूप बना देती हैं ॥१४॥ नाम मात्र से उपदिष्ट मन्त्रसंकेत का अब विभाग बताते हैं— हे अनघे देवेशि! वह मन्त्रसंकेत छः प्रकार का है। उसे मैं तुम्हें कह रहा हूँ ॥१५॥
११८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः षड्विधः अनन्तरवक्ष्यमाणभावार्थादिप्रकारेण षड्विधः । अनघे परशिष्य- त्वादिदोषरहिते । तेव१ मदंशभूताया विमर्शशक्तेः । प्रकाशात्मकोऽहं तं२ तु षड्विधं कथयामि ॥ तद्विभागमाह— भावार्थः सम्प्रदायर्थो निगर्भार्थश्च कौलिकः ॥१५॥ तथा सर्वरहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च । वक्ष्यमाणलक्षणत्वात् स्पष्टोऽर्थः ॥१५-१६॥ ३षोढा प्रकारेण लक्षणानि कथयिष्यन्नादौ भावार्थमाह— अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ॥१६॥ न क्षरन्तीत्यक्षराणि नित्यपरशिववाचकत्वात् । किञ्च, ताल्वोष्ठव्यापारोऽ- भिव्यञ्जकस्तेषाम् । अत एवाक्षराण्याक्षराणि । तेषामर्थोऽभिधेयः । श्रीसौभाग्य- विद्याऽवयवपञ्चदशाक्षराणामर्थो भावार्थः ॥१६॥ इसके भावार्थ आदि छः भेदों का वर्णन अभी आगे किया जा रहा है । 'अनघे' यह संबोधनात्मक विशेषण देवी में परशिष्यत्व आदि दोषों के अभाव का सूचक है । मैं प्रकाशात्मक शिव मेरी ही अंशभूत विमर्श शक्ति का नाम धारण करने वाली तुमको उन छः भेदों का वर्णन कर रहा हूँ ॥१५॥ उसी विभाग को अब बताते हैं— भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ और कौलिकार्थ, सर्वरहस्यार्थ तथा महा- तत्त्वार्थ ये ही छः भेद हैं ॥१५-१६॥ इन सबके लक्षण आगे बताये जायंगे, श्लोक का अर्थ स्पष्ट ही है ॥१५-१६॥ इन छः अर्थों का लक्षण आगे बताया जा रहा है । इनमें से सबसे पहले १भावार्थ का स्वरूप बताते हैं— हे परमेश्वरि ! केवल मन्त्र के अक्षरों का अर्थ ही यहाँ भावार्थ कहा गया है ॥१६॥ अक्षर नित्य परशिव के वाचक हैं, अतः इनका भी स्वरूप अक्षर, अविनाश्र्वर है । तालु, ओष्ठ आदि के व्यापार से इनकी अभिव्यक्ति मात्र होती है, उत्पत्ति नहीं । इस तरह से ये अक्षर अविश्वर हैं, इनकी उत्पत्ति नहीं होती । इन अक्षरों का जो अर्थ है, श्रीसौभाग्यविद्या नामक मन्त्र के अवयवभूत पन्द्रह अक्षरों का जो अभिधेय है, उसे ही भावार्थ कहते हैं ॥१६॥ १. तेन तव—ख, ने. ज. झ. । २. 'तं तु षड्विधं' नास्ति—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. षोढा दिन्यासक्रमेण—ग. ने. ज. झ. उ. । ४. यहाँ '...' पाठ...
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११९ अक्षरार्थमेवाह— योगिनीभिस्तथा वीरैर्वीरेन्द्रैः सर्वदा प्रिये । शिवशक्तिसमायोगाज्जनितो मन्त्रराजकः ॥१७॥ योगिन्यः, योगः शिवसंबन्धो नित्यं विद्यते आसामिति योगिन्यो विमर्शशक्त्यं- शभूतेच्छाज्ञानक्रियात्मकभारतीपृथ्वीरुद्राण्यः । वीरा उक्तार्थाः (१।६५), तद्योगिनी- नित्यसंबन्धभूताः प्रकाशांशभूता वामाज्येष्ठारौद्र्यात्मकब्रह्मविष्णुरुद्राः सृष्टिस्थिति- संहारकर्तारः । वीरेन्द्राः सृष्टिस्थितिसंहारपदातीताऽनाख्याधिकारिणस्ते शान्ताऽ- म्बिकात्मानः शिवशक्तिमिथुनत्रयसमष्टिरूपास्त्रिबीजशिखरवर्तिकामकलात्रया- भिधेयाः । एतैर्विद्याक्षराभिधेयमयैर्मिथुनचतुष्टयैः । शिवशक्तिसमायोगात् शिव- शक्त्योः समायोगः सम्पर्कस्तस्मात् । मन्त्रराजकः सौभाग्यविद्यारूपः, सकल- मन्त्रोत्तमत्वात् । जनितः जातः । आदिकर्मणि क्तः, जातो भावित इति यावत्, तस्यार्थस्य नित्यत्वात् । अयमेवार्थो मया सौभाग्यसुधोदये प्रपञ्चितः । यथा— इन अक्षरों के अर्थ को ही बताया जा रहा है— हे प्रिये ! योगिनियों, वीरों और वीरेन्द्रों के सदा रहने वाले संपर्क से तथा शिव और शक्ति के समायोग से मन्त्रराज की उत्पत्ति मानी जाती है ॥१७॥ जिनका शिव के साथ योग, नित्य संपर्क बना रहता है, वे योगिनियां कहलाती हैं । ये हैं विमर्श शक्ति की अंशभूत इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों से अभिव्यक्त हुई भारती पृथ्वी और रुद्राणी नामक शक्तियां । वीर पद का अर्थ पहले (१।६५) बता दिया गया है । प्रकाश की अंशभूत वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों से अभिव्यक्त ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक वीरों का उक्त भारती, पृथ्वी और रुद्राणी नामक योगिनियों से सदा संपर्क बना रहता है । ये क्रमशः सृष्टि, स्थिति और संहार पद से अतीत तुरीय (चतुर्थ) अनाख्या पद के अधिकारी वीरेन्द्र कहलाते हैं । इनका स्वरूप शान्ता और अम्बिका शक्ति से अभिव्यक्त होता है और शिव एवं शक्ति से अभिव्यक्त अभी बताये गये तीनों मिथुनों का समवेत स्वरूप इनमें छिपा हुआ है । वाग्भव आदि तीन बीजों के शिखर पर विराजमान तीन १कामकलाक्षर इनके बोधक हैं । इस तरह से सौभाग्यविद्या में विद्यमान १५ अक्षरों से चार मिथुनों का बोध होता है । शिव और शक्ति का जो निरन्तर प्रवर्त्तमान सम्पर्क है, उसी से सभी मन्त्रों में उत्तम सौभाग्यविद्या नामक इस मन्त्रराज की निष्पत्ति होती है । 'जनितः' पद में आदि कर्म में क्त प्रत्यय होता है । इसका तात्पर्य यह है कि यह तत्त्व तो नित्य है, किन्तु इसमें उक्त प्रकार से इसकी उत्पत्ति हुई है, ऐसी भावना की १. सम्पर्कस्तन्मिथुनीकृत-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । १. कामकलाक्षर का परिचय हम पृ० १६-१७ की टिप्पणी में ले चुके हैं ।
१२० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः सैव महाविद्यात्मा माता चतुरन्वयैकविश्रान्तिः । चतुराननादिजननी जाता चतुरात्मवर्गफलदात्री ॥ अस्वरविमर्शरूपौ स्वांशौ १हित्वा चतुष्कलौ सैव । वामादोच्छादिमयान्यकरोद् द्वन्द्वान्यमूनि चत्वारि ॥ वामांशो ब्रह्मा स्यादिच्छैव तस्य भारती शक्तिः । अनयोरेतन्मिथुनं सृष्टिः प्रागन्वयात्म वाग्बीजम् ॥ ज्येष्ठांशो विष्णुः स्याज्ज्ञाना विश्वम्भरा तयोर्मिथुनम् । इदमेव दक्षिणान्वयरूपं श्रीकामराजमध्वास्ते ॥ रौद्र्यात्मकस्तु रुद्रः क्रियामयी शक्तिरस्य रुद्राणी । युगलमिदं तार्तीयं बीजं २पालयति पश्चिमाम्नायम् ॥ स्यादम्बिकास्वरूपः शम्भुः शान्तात्मिकाऽस्य शक्तिः स्यात् । मिथुनमिदं शिवशक्त्योरुत्तरसमयात्म तुर्यमधितिष्ठेत् ॥ जाती है। इस श्लोक में प्रदर्शित अर्थ का व्याख्याकार ने अपने १सौभाग्यसुधोदय नामक ग्रन्थ में विस्तार किया है, जैसे कि— वह परा शक्ति ही चारों प्रकार के अन्वयों ( आम्नायों ) की विश्रामस्थली, चतु- रानन ब्रह्मा आदि की जननी तथा चार प्रकार के वर्ग ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) का फल देने वाली माता महाविद्या का स्वरूप धारण कर लेती है ॥ वही परा शक्ति अस्वर (अकार लिपि) और विमर्श (हकार लिपि) स्वरूप चार-चार कलाओं वाले अपने अंशों को विभक्त कर वामा आदि के और इच्छा आदि के इन चार-चार मिथुनों की सृष्टि करती है ॥ ब्रह्मा वामा शक्ति के और भारती इच्छा शक्ति के अंश से उद्भूत हैं। वामा और इच्छा शक्ति से उत्पन्न यह ब्रह्मा और भारती का युगलस्वरूप सृष्टि, पूर्वाम्नाय और वाग्भव बीज का अधिपति है ॥ विष्णु ज्येष्ठा शक्ति के और विश्वम्भरा (पृथ्वी) ज्ञाना शक्ति के अंश से उद्भूत हैं। ज्येष्ठा और ज्ञाना शक्ति से उत्पन्न यह विष्णु और पृथ्वी का युगलस्वरूप स्थिति, दक्षिणान्वय और कामराज बीज का अधिपति है ॥ रुद्र रौद्री शक्ति के और रुद्राणी क्रिया शक्ति के अंश से उद्भूत हैं। रुद्र और रुद्राणी का यह युगल संहार, पश्चिमाम्नाय और तृतीय शक्ति बीज का अधिपति है ॥ शम्भु ( शिव ) अम्बिका शक्ति के और इसकी शक्ति शान्ता शक्ति के अंश से उद्भूत हैं। शिव और शक्ति का यह युगल उत्तराम्नाय तथा तुरीय अनाख्या तत्त्व का अधिपति है ॥ इस १. भित्त्वा-ख. ग. ज. झ. उ. । २. जनयति-ग. ने. ज. झ. उ. । १. नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट (पृ० ३०६-३२१) में प्रकाशित इस ग्रन्थ के द्वितीय प्रपंच में ये सभी श्लोक पाठान्तर के साथ देखे जा सकते हैं।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १२१ एवमनुत्तरशक्त्योश्चतुरंशद्वन्द्वरूपिणी परा जाता । चतुरन्वयात्मिकेयं पश्यन्ती मातृकामयी विद्या ॥ सृष्टिः पूर्वाम्नायो वाग्भवबीजं तदात्मकं त्रिविधम् । सृष्टिस्थितिसंहारैर्भिन्ना सृष्टिस्त्रिमूर्तिमूर्तिः स्यात् ॥ ब्रह्माऽत्र सृष्टिसृष्टावधिपतिरेतस्य भारती शक्तिः। सोऽयं हस्यार्थः स्यात् स एव शिव शक्तिवाचकश्चापि¹ ॥ ²हस्यार्थः स्यादत्र स्वशक्तिमयरूपसार्णसंयोगात् । सृष्टिस्थितौ तु विष्णुः कर्ता विश्वम्भराऽस्य शक्तिः स्यात् ॥ विष्णुः कलिपेरर्थो ललिपेरेतस्य शक्तिरर्थः स्यात् । रुद्रोऽधिपतिः शक्तौ रौद्री स्यात् तत्र सृष्टिसंहारे ॥ हरवर्णयुगलमनयोर्वाचकमर्थोऽत्र रस्य रुद्रः स्यात् । रुद्राक्षरसम्पर्काद् रौद्री तच्छक्तिरत्र हस्यार्थः ॥ तरह से पराशक्ति अनुत्तर (अकार) और शक्ति (हकार) के चार-चार अंशों के संयोग से जब चार युगलस्वरूपों का रूप धारण कर लेती है, तब परा वाणी ही चार अन्वयों वाली ¹पश्यन्ती वाणी के रूप में परिणत हो जाती है ॥ इसका वाग्भव बीज सृष्टि दशा और पूर्वाम्नाय का सूचक है । सृष्टि दशा सृष्टि, स्थिति और संहार के भेद से विभक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और और रुद्र रूप त्रिमूर्ति का स्वरूप धर लेती है ॥ यहां सृष्टि स्वरूप सृष्टि विभाग के अधिपति ब्रह्मा और उनकी शक्ति भारती है । मूलविद्या में स्थित हकार लिपि से इन्हीं का बोध होता है । यही अक्षर शिव और शक्ति का भी वाचक है। इस अर्थ की अभिव्यक्ति के लिये यह हकार लिपि सकार लिपि से संयुक्त हो जाती है, क्योंकि सकार लिपि हकार की शक्ति मानी जाती है ॥ सृष्टिस्थिति विभाग के अधिपति विष्णु और विश्वम्भरा (पृथ्वी) उनकी शक्ति है। मूलविद्या में स्थित क-लिपि विष्णु का और ल-लिपि इसकी शक्ति का बोध कराती है ॥ सृष्टिसंहार विभाग के अधिपति रुद्र और रुद्राणी उनकी शक्ति है। ह र वर्णयुगल इनके वाचक हैं। इनमें से रकार का अर्थ रुद्र और हकार का अर्थ रुद्राणी नामक उसकी शक्ति है। रुद्र (रकार) अक्षर के सम्पर्क के कारण ही यह शक्ति रौद्री कही जाती है। तृतीय बीज का नाम शक्ति- १. वाचकस्यापि-क. ज. झ. उ. । २. सस्यार्थः-ग. ने. ज. झ. उ. ।
- एकादशधा विभक्त पश्यन्ती वाणी का परिचय कामकलाविलास (श्लो० २३-२४) में तथा अर्थरत्नावली (पृ० ३५-३६) में दिया गया है। इस प्रसंग में अर्थरत्नावली में उद्धृत संकेतपद्धति के श्लोकों को यहाँ (२।६३-६४) दीपिकाकार ने भी उद्धृत किया है। सौभाग्यसुधोदय के इस लम्बे उद्धरण से इन सभी ग्रन्थों के प्रस्तुत विषय की भी व्याख्या हो जाती है।
१२२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः अत्र तु शक्त्यर्णस्य प्राथम्यं शक्तिबीजभूतत्वात् । अधिवसतः शिवशक्ती १संज्ञानाख्या तयोस्तु त्रित्वमयी ॥ कामकला कलयित्री तुर्यमयी रक्तशुक्लमिश्रतनुः । रक्तो बिन्दुः शक्तिः शुक्लः शम्भुः परस्तदैकात्म्यम्२ ॥ एवं द्वितीयबीजं स्थितिरूपं दक्षिणान्वयात्म स्यात् । स्थितिसृष्ट्यादिविभेदाद् वसन्ति ता एव देवतास्तत्र ॥ अत्र कलवर्णमध्यस्थितो हकारः स्थितिस্বরূপत्वम् । अस्य द्योतयति परं३ स्थितिरूपं संविदम्बिकाकारः ॥ संहारात्मकपश्चिमसमयमये तद्वदेव तार्तीये । संहृतिसृष्ट्यादिवशाद्४ वसन्ति ता एव देवतास्तत्र ॥ सृष्टौ शक्तेर्नियतप्राधान्या५दस्य शक्तिबीजत्वात् । स्वात्मनि संहृतिसृष्टौ शिवमन्तर्भाव्य भासते शक्तिः ॥ बीज है। इसमें शक्ति की प्रधानता होती है, अतः शक्तिबीजात्मक सृष्टिसंहार विभाग में शक्ति के वर्ण हकार को प्राथमिकता दी गई है और शिव वाचक रकार की स्थिति बाद में है ॥ अनाख्या नामक तुरीय (चतुर्थ) विभाग में शिव और शक्ति का आधिपत्य है। यह युगलस्वरूप त्रिधा विभक्त होकर त्रिविध कामकलाओं का स्वरूप धारण कर लेता है। यह कामकला ही काल को कलन व्यापार सिखाती है। यह तुरीयस्वरूपा है तथा रक्त, शुक्ल और मिश्र बिन्दुओं से इसका स्वरूप बनता है। रक्त बिन्दु शक्ति का, शुक्ल बिन्दु शिव का और मिश्र बिन्दु शिव एवं शक्ति के सामरस्य स्वरूप का सूचक है ॥ इसी तरह से द्वितीय कामराज बीज स्थितिदशा और दक्षिणान्वय (दक्षिणाम्नाय) का सूचक है। स्थितिसृष्टि, स्थितिस्थिति, स्थितिसंहार और अनाख्या के भेद से इस बीज में भी पूर्वोक्त सभी देवता निवास करते हैं। यहाँ क और ल वर्णों के मध्य में विद्य- मान हकार इस कामराज बीज की स्थिति-दशा को उजागर करता है, क्योंकि यह हकार सबका पालन करने वाली संवित्-स्वरूपिणी अम्बिका की प्रतिमूर्ति है ॥ इसी तरह से तृतीय शक्तिबीज संहारदशा और पश्चिमसमय (पश्चिमाम्नाय) का सूचक है। संहारसृष्टि, संहारस्थिति, संहारसंहार और अनाख्या के भेद से इस बीज में भी वे सभी देवता निवास करते हैं। सृष्टिदशा में शिव की अपेक्षा शक्ति की निश्चित ही प्रधानता रहती है और यह शक्तिबीज के नाम से प्रसिद्ध है। अतः संहारसृष्टि दशा में यह शक्ति शिव को तिरोहित कर स्वयं भासित होती है ॥ १. सर्गानाख्या-ग. ने. ज. झ. उ. । २. र्थ्यम्-ज. झ. उ. । ३. परध्वनिरूपः संविदम्बराकारः-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. तु ता एवात्रापि देवता न्यवसन्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. न्तः-ख. ग. ज. झ. उ. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १२३ त्रिमये तुरीयबीजेऽनाख्यारूपोत्तरान्वयात्मनि तौ । शक्तिशिवावधिवसतो निरन्तरं सामरस्यमापन्नौ ॥ सृष्ट्यादिभेदभिन्नश्रीविद्यावर्णयुगलनवकात्मा । नवनादवर्गरूपा माता सा मध्यमाऽभिधा वितता ॥ शब्दस्पर्शौ रूपं रसगन्धौ चेति भूतसूक्ष्माणि । व्याप्यव्यापकभावात् पञ्चदश स्युः क्रमेण तत्संख्याः ॥ सृष्टि, स्थिति और संहार दशा की समष्टिभूत तुरीय (चतुर्थ) अनाख्या नामक दशा में, जो कि उत्तरान्वय (उत्तरान्नाय) को सूचित करती है, तुरीय युगल के रूप में ऊपर वर्णित शक्ति और शिव सामरस्यभाव से सम्पन्न होकर निरन्तर निवास करते हैं। सृष्टि आदि चार-चार अवस्थाओं के भेद से श्रीविद्या के वर्णयुगल (अकार और हकार लिपि) आठ प्रकार के हो जाते हैं। अनाख्या नामक तुरीय दशा में इन्हीं आठ वर्णों के समष्टि स्वरूप से एक नया नवां वर्ण भी प्रकट हो जाता है। इस तरह से नौ नाद और नौ वर्गों वाली ¹मध्यमा नामक माता (वाणी) का स्वरूप बनता है ॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच तन्मात्राएँ ²व्याप्यव्यापकभाव से पाँच महाभूतों में १५ प्रकार से विभक्त हो जाती हैं। ये ही पन्द्रह तिथियों, पन्द्रह तिथिनित्याओं १. नवधा विभक्त मध्यमा वाणी और इसके स्थूल एवं सूक्ष्म रूपों का परिचय कामकलाविलास (श्लो० २६-२७) में दिया गया है। अर्थरत्नावलीकार (पृ० ३६) ने संकेतपद्धति और हंसनिर्णय के प्रमाण से सूक्ष्म मध्यमा का निरूपण किया है और संकेत- पद्धति के इस वचन को दीपिकाकार (पृ० २।६३-६४) ने भी उद्धृत किया है। भूतलिपि के रूप में स्थूल मध्यमा का परिचय दीपिकाकार ने पूजासंकेत (३।१३६-१३८) में दिया है। २. तन्त्रशास्त्र में सामान्यतः सांख्य प्रक्रिया का अनुसरण किया जाता है। प्रस्तुत प्रसंग में भी वेदान्त अथवा न्याय दृष्टि का अनुसरण न कर सांख्य दृष्टि को ही मान्यता दी गई है। तदनुसार शब्द(आकाश)तन्मात्रा अन्य सभी तन्मात्राओं में व्याप्त है, अर्थात् शब्दतन्मात्रा व्यापक तत्त्व तथा अन्य चार तन्मात्राएँ व्याप्य हैं। यही प्रक्रिया आगे भी चलती है। इस व्याप्य-व्यापकभाव प्रक्रिया का निष्कर्ष यह निकलता है कि आकाश- तन्मात्रा के अतिरिक्त अन्य चार तन्मात्राओं में भी शब्द की स्थिति रहती है। स्पर्श की चार में, रूप की तीन में, रस की दो में और गन्ध की केवल एक पृथिवी में स्थिति रहती है। इस तरह से ये पाँच तन्मात्राएँ व्याप्य-व्यापकभाव (५ + ४ + ३ + २ + १ = १५) से पाँच महाभूतों में पन्द्रह प्रकार से विभक्त हो जाती हैं। पाँच महाभूतों के इन पन्द्रह गुणों की चर्चा बौद्ध योग के ग्रन्थ सेकोद्देशटीका (पृ० ५१) में भी आई है। वहाँ नाभि, हृदय, कण्ठ, ललाट और उष्णीष चक्र में क्रमशः पाँच, चार, तीन, दो और एक
१२४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तिथयश्च कला नित्यास्तदात्मिकाः स्युस्तथैव तत्संख्यैः । वर्णैः समष्टिरेषा विद्या व्याप्नोति तानि सर्वाणि ॥ सर्गादि१समष्टिरूपैः२ स्वांशै३रेभिस्तदात्मना विततैः४ । सर्गेण कादिवर्णैरपि षट्त्रिंशद्भि रात्मनोऽवयवैः ॥ पुनरज्व्यञ्जनबिन्दुप्रभेदभिन्नांस्तदक्षरावयवान् । षट्त्रिंशत्संख्याकांस्तत्त्वमयानश्नुते हि सा माता ॥ व्यष्टिसमष्टिविभेदैश्चतुरात्मा तत्त्वबीजपीठमयी । चतुरन्वयात्मनाऽपि च माताऽष्टकमातृकामयी विद्या ॥ इति ॥१७॥ तुरीयमन्त्रस्यार्थमाह— (२।१-२५) तन्मयीं परमानन्दनन्दितां स्पन्दरूपिणीम् । निसर्गसुन्दरीं देवीं ज्ञात्वा स्वैरमुपासते ॥१८॥ और पन्द्रह वैखरी स्वरों में परिणत हो जाती हैं। इन सबकी समष्टिस्वरूपिणी, षोडशी नित्या कला इन सबमें व्याप्त रहती है, क्योंकि सृष्टि का आरम्भ होने से पहले समष्टि रूप में स्थित अपने अंशों का ही वह सृष्टि करते समय इन रूपों में विस्तार कर देती है। विसर्गस्वरूपिणी यह षोडशी नित्या कला जब पुनः सृष्टि व्यापार में प्रवृत्त होती है, तो वह ककार आदि वर्णों से बने अपने छत्तीस१ अवयवों वाले रूप का विस्तार करती है। इस तरह से यह माता भगवती स्वर, व्यंजन, बिन्दु आदि के भेद-प्रभेद वाले इन अक्षरों रूपी अवयवों से छत्तीस तत्त्वों वाले अपने नये रूप में व्याप्त हो जाती है। तब व्यष्टि और समष्टि के भेद से चार प्रकार से विभक्त हुई सबकी जननी यह मूलविद्या चार- तत्त्व, चार बीज, चार पीठ, चार अन्वय (आम्नाय) आदि का भी स्वरूप धारण कर लेती है ॥१७॥ अब २तुरीय मन्त्र का अर्थ बताते हैं— तन्मयी, अर्थात् मिथुनत्रय समष्टिरूपिणी तुरीयस्वरूपा परमानन्द से ओत- १. स्थिति-ख. ग. ज. झ. उ. । २. 'रूपः' इत्येव सार्वत्रिकः पाठः । ३. रणुभि- ख. ग. ने. ज. झ. । ४. 'विततः' ख. विहाय सर्वत्र । गुण की स्थिति मानी गई है। वेदान्त अथवा न्याय दृष्टि का अनुसरण करने पर यह नहीं हो सकता, क्योंकि वेदान्त दर्शन में पंचीकरण प्रक्रिया के अनुसार सभी भूत पाँचों गुणों से संयुक्त हैं और न्याय-वैशेषिक दृष्टि में ये पाँच गुण क्रमशः पाँच भूतों के विशेष गुण हैं, अतः उनकी अन्यत्र स्थिति नहीं मानी जा सकती । १. सम्प्रदायार्थ का निरूपण करते समय यह सारा विषय मूल ग्रन्थ में भी आगे (२।३२-३५) विवेचित है। २. तुरीय मन्त्र का अभिप्राय यहाँ सौभाग्यविद्या के तुरीय स्वरूप से है। समष्टि
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १२५ तन्मयीं भारत्यादिब्रह्मादि१मिथुनत्रयवाचक२बीजत्रयसमष्टिरूपां ३तुरीयमन्त्र- वाच्याम् । परमानन्दनन्दितां परमशिवसामरस्यपरिस्फुरत्परमानन्दनिर्भराम् । स्पन्दरूपिणीं शिवादिक्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्त्वस्पन्दरूपेण व्यक्तनिजविभवाम् । निसर्गसुन्दरीं सर्वप्राणिष्वात्मतया ४परप्रेमास्पदीभूताम् । देवीं महात्रिपुरसुन्दरीं प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपिणीं५ पराम् । ज्ञात्वा स्वात्मतया । स्वैरमुपासते स्वात- न्त्र्येण विहरन्ति, स्वैराचारपरा भवन्तीत्यर्थः । अत्रैव वक्ष्यति—"स्वैराचारेण सम्पूज्या त्वहन्तेदन्तयोः समा” (३।१६४) इति ॥१८॥ मन्त्रशब्दार्थमाह— शिवशक्त्याख्यसंघट्टरूपे ब्रह्मणि शाश्वते । तत्प्रथाप्रसराश्लेषभुवि त्वैन्द्रोपलक्षिते ॥१९॥ प्रोत स्पन्दस्वरूपा निसर्गसुन्दरी देवी को जान लेने के बाद साधक उसकी स्वच्छन्द उपासना करते हैं ॥१८॥ तन्मयी का अर्थ है भारती-ब्रह्मा आदि के तीन मिथुनों के वाचक तीन बीजों की समष्टिस्वरूपिणी चौथी सम्पूर्ण श्रीविद्या। यह श्रीविद्या परमानन्दनन्दिता है, परमशिव के सामरस्य से समुद्भूत परमानन्द से भरी हुई है। स्पन्दरूपिणी है, शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों के स्पन्दन के रूप में यह अपने ही वैभव का विस्तार करती है। निसर्ग- सुन्दरी है, सभी प्राणियों की अपनी आत्मा के रूप में यह सर्वत्र परम प्रेम का विस्तार करती है। यह देवी प्रकाश और विमर्श के सामरस्यमय स्वरूप में महात्रिपुरसुन्दरी के नाम से प्रकाशमान है। भगवती के इस तुरीय स्वरूप का, श्रीविद्या के इस चतुर्थ अर्थ का अपनी ही आत्मा के रूप में साक्षात्कार कर लेने के बाद साधक स्वतन्त्र रूप से आहार- विहार करने लगते हैं, अर्थात् यथेष्ट आचरण करने लगते हैं। यहीं आगे (३।१६४) बताया गया है—"अहन्ता और इदन्ता में समान रूप से विद्यमान भगवती त्रिपुरसुन्दरी की उपासना अपने मनोन्कूल पदार्थों से करनी चाहिये” ॥१८॥ मन्त्रशब्द का अर्थ बताते हैं— प्रकाशविमर्श नामक संघट्ट (सामरस्य) के रूप में विराजमान, नित्य, विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार के साक्षी, महान् ऐश्वर्य सम्पन्न ब्रह्म (परमात्मा) १. चतुर्मिथुन-क. ग. ने. ज. झ. उ. । २. पीठ-ने. । ३. 'तुरीयमन्त्रवाच्यां' नास्ति-ख. ने. ज. । ४. बिभेदिनीं-ने. ज. झ. उ., शालिनीं-ख. । ५. 'पर' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. रूपां-ने. ज. झ. उ. । स्थिति और संहार के प्रतीक वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक व्यष्टि बीजों के अति- रिक्त सौभाग्यविद्या का एक समष्टि स्वरूप भी है। इसी को यहाँ समष्टि बीज कहा गया है। और उस विद्या के स्वरूप को जान लेने के बाद साधक स्वच्छन्द रूप से