योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११३ आधारे विन्यसेन्मूर्तिम् । पादाग्रादीनां बाह्यत्वेन प्रसिद्धत्वात् पृथक्करण- माधारमूर्त्योरान्तरत्वद्योतनार्थम् । आधारे पूर्वोक्ते (१।२५) चतुर्दले ²कमले । मूर्ति मूर्तिविद्यां ³सप्तमीं न्यसेत्⁴ । तस्यां मूर्तावेवावाहिनीं न्यसेत् । मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि । मूलेन नवमचक्रेश्वरीविद्यया, सौभाग्यविद्ययेति यावत् । स्पष्टमन्यत् ।।७।। नवचक्रेश्वरीविद्यानां न्यासमुक्त्वा तदाधार⁵भूतनवचक्राणामपि⁶ चिन्ता- लक्षणमान्तरन्यासमाह— अकुलादिषु पूर्वोक्तस्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरीसमायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥८॥ अकुलादिषु “अकुले विषुसंज्ञे च” (१।२५) इत्यत्र पूर्वोक्तस्थानेषु । आदिशब्दे- नाष्टौ वह्नि-शाक्त-नाभि-अनाहत-विशुद्ध-लम्बिकाग्रभ्रुवोरन्तर-इन्दवो⁷ गृह्यन्ते । पादाग्र आदि छः पूर्वोक्त स्थान बाह्य अंग के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस श्लोक में आधार और मूर्ति का वर्णन किया गया है। इन दो स्थानों का यहाँ अलग से वर्णन इनकी आन्तरता का द्योतक है। आधार का अर्थ है पूर्व वर्णित (१।२५) मूलाधारस्थानीय चतुर्दल कमल। इसमें सप्तमी मूर्तिविद्या का विन्यास करना चाहिये। इस मूर्तिविद्या में आठवीं आवाहिनी विद्या का विन्यास करे। हे परमेश्वरि ! मूलविद्या, अर्थात् नवम चक्र- श्वरी विद्या, सौभाग्यविद्या से व्यापक न्यास सम्पन्न करना चाहिये। बाकी शब्दावली का अर्थ स्पष्ट है ॥७॥ नौ चक्रेश्वरी विद्याओं के न्यास के बाद अब इन विद्याओं के आधारभूत नौ चक्रों के भी भावनात्मक आन्तर न्यास का वर्णन करते हैं— पूर्वोक्त अकुल आदि स्थानों में चक्रेश्वरी सहित पूर्व वर्णित नौ चक्रों की भावना करनी चाहिये ॥८॥ अकुल आदि शब्द से पूर्व वर्णित (१-२५) ¹अकुल, वह्नि, शाक्त, नाभि, अनाहत, विशुद्ध, लम्बिकाग्र, भ्रूमध्य और बिन्दु का ग्रहण किया जाता है। पहले चक्रसंकेत प्रकरण १. पृथग् ग्रहणम्–ज. । २. 'कमले मूर्ति' नास्ति–ख. ज. झ. । ३. 'सप्तमी' नास्ति– ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. न्यसेत् स्मरेत्–ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. 'भूत' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'अपि' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ७. बिन्दवो–क. ख. ने. ज. झ. उ. ।
- पृ० ३६-३७ की टिप्पणी का अवलोकन कीजिये। यहाँ व्याख्याकार ने नौ संख्या पूरी करने के लिये बिन्दु का अलग से ग्रहण किया है। यह उचित नहीं लगता। वस्तुतः अकुल के बाद विषु स्थान का ग्रहण होना चाहिये। भास्करराय ने ऐसा ही किया है। तब भ्रूमध्य के अतिरिक्त ललाटस्थ बिन्दुस्थान की आधार के रूप में कल्पना नहीं करनी पड़ेगी। ८