भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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११२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्—"मेयै¹मातृमितिलक्षणं कुलं प्रान्ततो व्रजति यत्र विश्रमम्" (श्लो० ७२) इति । तस्य सर्जने संहारे च ईश्वरि । अत्र श्रुतिः—"यथो- र्णनाभिः सृजते गृह्णते च" (मु० उ० १।१।७) इति । आज्ञावतारेऽप्युक्तम्— "स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इति । पूजाकाले वक्ष्यमाणसंकेतोक्त- सपर्यासमये२ । प्रयत्नतः "प्रयत्न³स्तदवाप्तौ तु व्यापारोऽतित्वरान्वितः" (द० रू० १।२०) इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या ⁴श्रद्धावेशितया क्रमेण न्यस्तव्याः ॥५-६॥ तत्स्थानान्याह— पादाग्रजङ्घाजानूरुगुदलिङ्गाग्रकेषु च ॥६॥ स्पष्टम्५ ॥६॥ आधारे विन्यसेन्मूर्तिं तस्यामावाहिनीं न्यसेत् । मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि ॥७॥ पद है । कुल का अर्थ है मेय, मान और माता का समूह । चिद्गगनचन्द्रिका में बताया गया है—"यह मेय, मान और मिति लक्षण वाला कुल इस भगवती के एक अंश में विश्राम प्राप्त करता है"। इस कुल की सृष्टि और संहार में समर्थ भगवती यहाँ कुलेश्वरी कही गई है । यहाँ मुण्डक श्रुति का प्रमाण दिया गया है कि जैसे मकड़ी जाला बनाती है और उसको निगल लेती है, उसी तरह से यह भगवती सृष्टि और संहार व्यापार में स्वतन्त्र है । आज्ञावतार में भी कहा गया है—"अपनी इच्छा से ही यह सारे जगत् को निगलती और उगलती रहती है" । "अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिये आतुरतापूर्ण व्यापार ही प्रयत्न है" दशरूपक के इस कथन के अनुसार साधक को चाहिये कि वह पूरी श्रद्धा के साथ आगे पूजासंकेत प्रकरण में बताई जाने वाली विधि से पूजा करते समय प्रयत्नपूर्वक क्रमशः इन विद्याओं का न्यास करे ॥५-६॥ न्यास के स्थानों का वर्णन आगे किया जा रहा है— पादाग्र, जंघा, जानु, ऊरु, गुदा और लिंगाग्र—इन छः स्थानों में क्रमशः प्रथम छः विद्याओं का न्यास करे ॥६॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥६॥ आधार में मूर्तिविद्या का और इस मूर्तिविद्या में आवाहिनी विद्या का विन्यास करे । हे परमेश्वरि ! मूलविद्या से व्यापक न्यास करना चाहिये ॥७॥ १. मान-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. संकेते । क्रमः पर्यायक्रमः-ख. ग. ने. झ. उ. । ३. स्तु तदप्राप्तौ-म. । ४. श्रद्धा-झ. । ५. नास्ति-ने. ज. ।