भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १११ मूलं विश्वस्य शिवादेर्भूम्यन्तस्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपं १परं तेजो वेदयतीति मूलविद्या तथा प्रोक्ता भैरवी कथिता नान्या। अस्या- स्तत्रैवोद्धृतत्वान्नात्रोद्धारः। अन्यथा सप्तमचक्रेश्वरीवदत्रोद्धरेत्। वक्ष्यति— “मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि” (२।७) इति। त्रैलोक्यमुक्त (१।८२) लक्षणं वशीकरोति २सर्जने संहारे च स्वायत्तं करोतीति ॥५॥ वक्ष्यमाणपूजासंकेते वक्तुं योग्यमपि न्यासं नवचक्रेश्वरीविद्यानां प्रसङ्गा- न्मण्डूकप्लुतिन्यायेनाह— एवं नवप्रकारास्तु पूजाकाले प्रयत्नतः ॥५॥ एताः क्रमेण न्यस्तव्याः साधकेन कुलेश्वरि । एवमुक्तप्रकारेण। नवप्रकारा एताश्चक्रेश्वरीविद्याः। साधकेन एतद्विद्योपा- सकेन मोक्षमात्मनः साधयितुमिच्छता। कुलेश्वरी। कुलं मेयमानमातृरूपम्। शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों का मूल कारण प्रकाश और विमर्श का सामरस्यमय परम तेज ही है, इस विषय का ज्ञान कराने वाली होने से यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या के नाम से चतुःशती शास्त्र में वर्णित है। यहाँ वर्णित भैरवी मूल- विद्या ही है, कोई दूसरी नहीं। इस मूलविद्या का उद्धार वहाँ कर दिया गया है। यदि ऐसा न होता तो सप्तम चक्रेश्वरी विद्या के समान यहाँ इसका भी उद्धार बताया जाता। आगे (२।७) बताया गया है—“हे परमेश्वरि ! मूलविद्या से व्यापक न्यास करना चाहिये”। यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या है। त्रैलोक्य पद की व्याख्या कर दी गई है (१।८२)। इस त्रैलोक्य को यह मूलविद्या सृष्टि और संहार दोनों अवस्थाओं में अपने ही अधीन रखती है ॥५॥ आगे कहे जाने वाले तृतीय पूजासंकेत के न्यास-प्रकरण में ही न्यास का वर्णन करना उचित था, किन्तु नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का प्रसंग होने से १मण्डूकप्लुति न्याय से उनसे संबद्ध न्यासों का वर्णन यहीं किया जा रहा है— हे कुलेश्वरि ! साधक को चाहिये कि वह पूजा करते समय प्रयत्नपूर्वक क्रम से ऊपर बताई गई नौ प्रकार की विद्याओं का न्यास करे ॥५-६॥ इस तरह से इन नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का यहाँ वर्णन किया गया है। साधक का अर्थ यहाँ मुक्ति की कामना वाला श्रीविद्या का उपासक है। कुलेश्वरि ! यह संबोधन १. ‘परं’ नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. सर्जनसंहारैः स्वा-ने. झ. उ. । १. मण्डूक-प्लुति न्याय का विवरण हमने विज्ञानभैरव भाषानुवाद, पृ. ३७ की टिप्पणी में दे दिया है। यहाँ विशेषता यह है कि यह मण्डूक-प्लुति आगे की ओर न बढ़कर उलटी हुई है, अर्थात् तृतीय संकेत में वर्णित न्यास प्रकरण का कुछ अंश प्रसंगवश यहाँ आ गया है।