योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः आन्तरस्य निजसंविदात्मनो मातुरक्षकरणाध्वना बहिः । मेयसंविदि समर्पणं तदावाहनं समरसत्वलक्षणम् ॥ (चि० २०) इत्यस्मदुक्तरीत्या स्वहृदयकमलकर्णिकामध्ये स्फुरन्त्याः संवित्कलायाः “आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन” (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रान्त- रोक्तपरिपाट्या बहिरर्थप्रसेरणलक्षणावाहिनी विद्या सर्वसिद्धि²प्रदाऽष्टमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः । नवमी भैरवी परा । भैरवी विश्वस्य भरणात् स्थितिहेतुतया, रक्षणात् परचिन्मात्रपर्यवसानलक्षणसंहारकारणतया, वमनात् सृष्टिहेतुतया च ॥२-४॥ ननु भैरवी चतुःशतीशास्त्रे नोक्ता, किमित्यत्र नोद्धृता, सप्तमचक्रेश्वरी विद्या चोद्धृतेत्यत आह— मूलविद्या तथा प्रोक्ता त्रैलोक्यवशकारिणी । निज संवित्ति स्वरूप आन्तर प्रमाता का अन्तःकरण और बहिरिन्द्रियों के माध्यम से प्रमेय पदार्थों के रूप में अपने को समर्पित कर देना ही, उनसे समरसता प्राप्त कर लेना ही आवाहन है । इसका अभिप्राय यह है कि साधक के आवाहन पर संवित्स्वरूपिणी भगवती चक्र, मूर्ति इत्यादि बाह्य प्रमेय पदार्थों में प्रतिष्ठित हो जाती है । इस तरह से अपने हृदयकमल की कर्णिका में स्फुरित हो रही संवित्कला, न्याय- भाष्यकार वात्स्यायन की पद्धति से—“आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय बाह्य विषय से संयुक्त होती है” इस क्रम से बाह्य अर्थों में अपना प्रसार कर लेती है । आठवीं आवाहिनी विद्या के प्रभाव से यह कार्य सम्पन्न होता है। यह विद्या सर्वसिद्धिप्रद नामक आठवें चक्र की स्वामिनी है । आगे की नवीं विद्या भैरवी है । विश्व का भरण, रक्षण और वमन करने से यह भैरवी कहलाती है । यह देवी स्थितिकाल में विश्व का भरण करती है, संहारकाल में अपने परचित् स्वरूप में विश्राम देकर विश्व की रक्षा करती है और सृष्टिकाल में अपने स्वरूप में से इसको फिर निकाल देती है । इस तरह से भरण, रक्षण और वमन क्रियाओं के प्रथम अक्षरों को ग्रहण कर भैरवी का स्वरूप बनता है ॥२-४॥ प्रश्न उठता है कि यह नवीं भैरवी विद्या भी चतुःशती शास्त्र में उपदिष्ट नहीं है, तब इसका उद्धार यहाँ क्यों नहीं किया गया । यहाँ तो केवल सप्तम चक्रेश्वरी मूर्तिविद्या का ही उद्धार बताया गया है । इसका समाधान देते हैं— यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या कही गई है, जो सारे त्रैलोक्य को अपने वश में करने वाली है । १. प्रसारलक्षणावाहने विहिताऽष्टमी-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. प्रदाभिधाना- ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।