भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०९ सिद्धानामावरणदेवतानामासने स्थिता विद्या साध्यसिद्धासना षष्ठी, सर्वरक्षाकर- नामधेयषष्ठचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। मायालक्ष्मीमयी परा मूर्तिविद्या च सा देवी१ सप्तमी परिकीर्तितेति। अस्या विद्यायाश्चतुःशतीशास्त्रेऽनुद्धृतत्वादत्रोद्धारः क्रियते। माया २भुवनेश्वरीबीजम्, लक्ष्मीः श्रीबीजम्, तन्मयी तत्प्रचुरा। ३तयो- रूर्ध्वगता परा— चतुर्दशयुतं भद्रे तिथीशान्तसमन्वितम्। तृतीयं ब्रह्म सुश्रोणि हृदयं भैरवात्मनः॥ (श्लो० ९) इति श्रीपरात्रिंशिकोक्त४बीजं परा५, परावाचकत्वात्। तद्बीजत्रयात्मिका [६ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मकत्वाच्च सा विद्या श्रीमहात्रिपुरसुन्दरीमूर्तिकल्पनायां विनियुक्ता] सप्तमी सर्वरोगहराभिधानसप्तमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। अष्टम्यावाहिनी विद्या। सन्धान (भावना) किया जाता है, उन सभी साध्य और सिद्ध देवताओं के आसन पर विराजमान यह छठी विद्या साध्यसिद्धासना कहलाती है। यह सर्वरक्षाकर नामक छठे चक्र की स्वामिनी है। सातवीं मूर्तिविद्या है। माया, लक्ष्मी और परा बीज से इसका उद्धार होता है। चतुःशती शास्त्र में इस विद्या का उद्धार नहीं बताया गया है, अतः यहाँ इसका उद्धार किया गया है। माया भुवनेश्वरी बीज को और लक्ष्मी श्रीबीज को बताते हैं। इस विद्या में इनकी प्रधानता है। इन दोनों के ऊपर परा बीज का उद्धार करने पर इस विद्या का स्वरूप बनता है। परा बीज का उद्धार परात्रिंशिका में बताया गया है— हे भद्रे, हे सुश्रोणि, तृतीय ब्रह्म सकार को चतुर्दश स्वर (औ) से संयुक्त कर और उसके अन्त में तिथीशान्त (विसर्ग) को लगा कर जो बीज बनता है, वह भगवान् भैरव का हृदय है॥ इस तरह में माया, लक्ष्मी और परा बीज को मिलाकर इस विद्या का स्वरूप बनता है। यह विद्या तीन बीजों वाली है तथा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिये इसका उपयोग श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी की मूर्ति की कल्पना में किया जाता है। यह सातवीं विद्या सर्वरोगहर नाम के सातवें चक्र की अधिष्ठात्री है। आठवीं विद्या है आवाहिनी। आवाहन का आन्तर स्वरूप चिद्विलास में वर्णित है— १. देवि—ज. झ.। २. भुवनेशी—क. ख. ने. ज. उ.। ३. तद्द्वयोर्ध्वगता—ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ४. ॠतीत्या—क. ने. उ.। ५. 'परा' नास्ति—ज. झ. उ.। ६. 'मूर्तिविद्या च सा' इत्येव पाठः—ज. ग. ने. ज. झ. उ.।