योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः स्थिता पञ्चमी विद्या, सर्वार्थ^१साधकाभिधानलक्षणपञ्चमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः । साध्यसिद्धासना षष्ठी । सर्वपीठनिवासिन्यः सर्वगाश्चिन्मरीचयः । भैरव्यो^२ भरिताकारा रक्षन्तु कुलमातरः ॥ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या ^३चिन्मरीचिमयपरिणतावरणदेवताः साध्याः ^४सृष्टिस्थाः सप्तसंख्याकत्रिकोणादिषोडशदलान्तचक्रपदगताश्चतुरस्रत्रयपदगताश्च देवताः सृष्टिक्रमरूपत्वात् साध्याः । तदुक्तमत्रैव—"सृष्टिः ^५स्यान्नवयोन्यादि- पृथ्व्यन्तम्" (१।७७) इति । साध्यास्ता एव संहृतिकाले सिद्धाश्चतुरस्रादिबेन्दवान्त- क्रमेणोपसंहृताः। तदुक्तमत्रैव—"संहृतिः पुनः पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तम्" (१।७७-७८) इति । अत्र सिद्धिः संहारः । तदुक्तं^६ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये—"चितिः स्वतन्त्रा विश्व- सिद्धिहेतुः" (सू० १) इति । एवं सृष्टिसंहारक्रमेणानुसन्धीयमानानां साध्य- आवरण देवताओं के मन्त्रासन तक हैं। इस तरह से यह पाँचवीं विद्या समस्त मन्त्रासनों में विराजमान है और सर्वार्थसाधक नाम के पाँचवें चक्र की अधिष्ठात्री देवी है। साध्य- सिद्धासना छठी विद्या है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति की उक्ति है— सभी पीठों में निवास करने वाली, सर्वत्र विचरण करने वाली, चिति शक्ति की किरणों से अभिव्यक्त परिपूर्ण स्वरूप वाली भैरवियाँ कुलदेवियाँ मेरी रक्षा करें ॥ इस तरह से चिति शक्ति की किरणें ही आवरण देवताओं का स्वरूप धारण कर लेती हैं। इन्हीं को यहाँ 'साध्य' नाम से कहा गया है। सृष्टि क्रम से त्रिकोण, वसुकोण, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, मनुकोण, अष्टदल और षोडश दल इन सात चक्रों में और चतुरस्रत्रय में विद्यमान देवता सृष्टिक्रम का प्रतिनिधित्व करने के कारण साध्य कहे जाते हैं। नवयोनि से पृथ्वी पर्यन्त चक्रक्रम की सृष्टि संज्ञा है, यह बात यहाँ पहले (१।७७) ही बता दी गई है। ये साध्य देवता ही संहार क्रम से चतुरस्र से बैन्दव पर्यन्त चक्र में स्थित होकर 'सिद्ध' कहलाते हैं। पृथ्वी से नवयोनि पर्यन्त चक्र-क्रम की संहार संज्ञा है, यह भी पहले (१।७७-७८) ही बता दिया गया है। यहाँ सिद्धि का अर्थ संहार है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है—"चितिशक्ति स्वतन्त्र रूप से विश्व की सिद्धि (सृष्टि और संहार) करती रहती है"। इस तरह से सृष्टि और संहार के क्रम से जिनका अनु- १. साधनलक्षण-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. रम्यास्ता वाक्पराकारा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. चिन्मरीच्यावरण-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. साधकदशायां सप्तषष्टि- संख्यात्रिको-क. ग. ज. उ. । ५. सृष्टिस्थं-ज. झ. उ. । ६. 'कमीश्वरप्रत्यभिज्ञायाम्' इत्येव ग. विद्वान् सर्वत्र.