भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०७ चात्मरक्षिका। "भेदलक्षणविपक्षसंकटोत्तारणं परमिहात्मरक्षणम्” (चि० ७) इत्यस्मदुक्तरीत्या भेदप्रपञ्चलक्षणप्रतिपक्ष²पराभवरूपसंकटाद् रक्षामभेदप्रतीतिरूपां पराहन्ताप्रतिपाद³नेनात्मनः करोतीत्यात्मरक्षिका द्वितीया सर्वाशापरिपूरकाख्य- द्वितीयचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। आत्मासनगता देवी⁴ तृतीया। "⁵आत्मचक्रमनुदेवता- त्मनामासनं शिवमयतवभासनम्” (चि० ४५) इत्यस्मदुक्तरीत्या साधकचक्रमन्त्र- देवतानां स्वसंविद्रूपतयाऽनुसन्धानलक्षणासनचतुष्टयविद्यानामादिभूताऽऽत्मासन- गता विद्या तृतीया सर्वसंक्षोभकर⁶लक्षणतृतीयचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। ⁷तदनन्तरं चक्रासनगता। तदनन्तरोक्तचक्रासनगता चतुर्थी विद्या सर्वसौभाग्यदायक लक्षण- चतुर्थचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। पश्चात् सर्वमन्त्रासनस्थिता। अनन्तरोक्त⁸वासना- पूर्वोक्त(२।१ )लक्षणमननत्राणलक्षणचिन्मरीचिप्रसरेणाखिलावरणदेवतामन्त्रासन- "भेददृष्टि ही विपक्ष का संकट उपस्थित करती है, शत्रु का काम करती है। उस संकट से उबारना ही सबसे बड़ी आत्मरक्षा है”। इस तरह से भेददृष्टि-प्रधान इस संसाररूपी प्रपंच से, जो कि साधक के सामने पराजय का संकट उपस्थित कर देता है, अभेद प्रतीति रूप अद्वयदृष्टि प्रदान कर पराहन्ता का स्वरूप समझा कर यह विद्या उसकी रक्षा करती है। इसलिये यह दूसरी विद्या आत्मरक्षाकारी कहलाती है और दूसरे सर्वाशापरि- पूरक नामक चक्र की स्वामिनी है। आत्मासनगता देवी तीसरी विद्या है। चिद्विलास स्तव में ही बताया गया है-“आत्मा, चक्र, मनु (मन्त्र) और देवता इनकी आसन के रूप में भावना का अर्थ इनमें शिवमयंता की भावना करना है, अर्थात् ये चारों शिवमयं ही हैं”। इस तरह से साधक, चक्र, मन्त्र और देवता ये सभी आसन के रूप में भगवती संवित् के ही स्वरूप हैं। अतः इन चारों आसनों की विद्याओं में पहली और ऊपर बताए गये क्रम से तीसरी यह आत्मासनगता विद्या सर्वसंक्षोभकर नामक तीसरे चक्र की अधिष्ठात्री है। इसके आगे चक्रासनगता विद्या है। अभी बताये गये चार आसनों में से दूसरे चक्रासन में विराजमान यह चौथी विद्या सर्वसौभाग्यदायक नामक चतुर्थ चक्र की स्वामिनी है। इसके बाद सर्वमन्त्रासनस्थिता विद्या है। अभी मन्त्रासन की भावना चिद्विलास स्तव के प्रमाण से बताई है और पहले (२।१) मनन और त्राण करने वाली मन्त्रशक्ति की किरणों का उल्लेख किया गया है। इन किरणों का फैलाव समस्त १ संकटात्-मु.। २. 'पराभवरूप' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ३. नेन तथा-ने. ज., मेन वा-झ. उ. । ४. देवि-ज. झ. । ५. अष्ट'...'सा विमर्शमनयत् स्वभास-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. 'कर' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ७. अनन्तरं चक्रसंकेतोक्तचक्रासनयुक्ता विद्या-ख. ग. ने. उ. । ८. वासनामननत्राणचिन्म-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ९. प्रसरा-

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक) · पृष्ठ 157, कुल 485 में से · BharatKosha