भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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११४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः पुरोदितं चक्रसंकेतोदितं नवचक्रं चक्रेश्वरोसमायुक्तं नवचक्रेश्वर्य्यधिष्ठितं परि- चिन्तयेत् । १कोऽर्थः ? अकुले सुषुम्ना २मूलारुणसहस्रदलकमले त्रिपुराधिष्ठितं त्रैलोक्यमोहनचक्रम्, वह्नावाधारे चतुर्दलकमले ३त्रिपुरेश्यधिष्ठितं सर्वाशापरि- पूरणं चक्रम्, शाक्ते स्वाधिष्ठानस्थितषड्दलकमले त्रिपुरसुन्दर्य्यधिष्ठितं सर्वसंक्षो४- भणं चक्रम्, नाभौ दशदलकमले त्रिपुरवासिन्यधिष्ठितं सर्वसौभाग्यदायक५- चक्रम्, अनाहते हृदि द्वादशदलकमले त्रिपुराश्रीसमधिष्ठितं सर्वार्थसाधकं चक्रम्, विशुद्धे षोडशदलकमले त्रिपुरमालिन्यधिष्ठितं सर्वरक्षाकरं चक्रम्, लम्बिकाग्रे ६तालुमूलेऽष्टदलकमले त्रिपुरासिद्धयधिष्ठितं सर्वरोगहरं चक्रम्, भ्रुवोरन्तरे द्विदल- कमले त्रिपुराम्बिकाधिष्ठितं सर्वसिद्धिप्रदं चक्रम्, इन्दौ ललाटे बिन्दौ महा- त्रिपुरसुन्दर्यधिष्ठतं सर्वानन्दमयं७ चक्रं भावयेदित्यर्थः ॥८॥ पूर्वोक्तविद्यानां नवचक्रेश्वरीणां नामान्याह— तासां नामानि वक्ष्यामि यथानुक्रमयोगतः । तत्राद्या त्रिपुरा देवी द्वितीया त्रिपुरेश्वरी ॥९॥ में वर्णित नौ चक्रों की, जो अभी हाल में वर्णित नौ चक्रेश्वरियों से अधिष्ठित हैं, इन नौ स्थानों में भावना करनी चाहिये । इसका अभिप्राय यह है—अकुल, अर्थात् सुषुम्ना के मूल में स्थित लाल वर्ण के सहस्रदल कमल में चक्रेश्वरी त्रिपुरा से अधिष्ठित त्रैलोक्यमोहन चक्र की, वह्नि अर्थात् चतुर्दल आधार कमल में त्रिपुरेशी से अधिष्ठित सर्वाशापरिपूरक चक्र की, शाक्त अर्थात् स्वाधिष्ठान में स्थित छः दल वाले कमल में त्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वसंक्षोभण चक्र की, नाभि स्थित दश दल वाले कमल में त्रिपुरवासिनी से अधिष्ठित सर्वसौभाग्यदायक चक्र को, अनाहत अर्थात् हृदय स्थित- द्वादशदल कमल में त्रिपुराश्री से अधिष्ठित सर्वार्थसाधक चक्र की, विशुद्ध नामक षोडश दल कमल में त्रिपुरमालिनी से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर चक्र की, लम्बिकाग्र अर्थात् तालु के मूल में स्थित अष्टदल कमल में त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित सर्वरोगहर चक्र की, भ्रूमध्य स्थित द्विदल कमल में त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रद चक्र को और इन्दु अर्थात् ललाट स्थित बिन्दु में चक्रेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी देवी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय चक्र की भावना करनी चाहिये ॥८॥ पूर्वोक्त नौ चक्रेश्वरी विद्याओं के नाम ये हैं— अब मैं यथोचित आनुपूर्वी से इनके नाम बताऊँगा । इनमें पहली त्रिपुरा १. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. मूलभागेऽरुण-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. त्रिपुरेश्वरीयुक्तं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. क्षोभकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. दायकं-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'तालुमूले' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. श्लोकार्थो नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।