योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 165, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११५ तृतीया च तथा प्रोक्ता देवी त्रिपुरसुन्दरी । चतुर्थी च महादेवि¹ देवी त्रिपुरवासिनी ॥१०॥ पञ्चमी त्रिपुराश्रीः स्यात् षष्ठी त्रिपुरमालिनी । सप्तमी त्रिपुरासिद्धिराष्टमी² त्रिपुराम्बिका ॥११॥ नवमी तु महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी । स्पष्टम् ॥९-१२॥ नन्वेताश्च विद्या नवचक्रेश्वर्यः पादाग्रादिष्वकुलादिस्थानेषु च भावनारूपेण क्रमेण न्यस्तव्या एव किम्³ ? नेत्याह— पूजयेच्च क्रमादेता नवचक्रे पुरोदिते ॥१२॥ एताः पुरोदितास्त्रिपुराद्या विद्या नवचक्रेश्वर्यः। पुरोदिते "त्रैलोक्यमोहनं चक्रम्" (१।८२-८४) इत्यादिपूर्वोक्ते । नवचक्रे इत्येकवचनमन्योन्याविश्लेषकथनार्थम् । अकुलादिनवस्थानेष्वन्योन्यसंयुक्ततयैव विभावितेषु नवचक्रेष्वित्यर्थः । क्रमात् पूजयेच्च त्रैलोक्यमोहनं चक्रमारभ्य प्रतिचक्रमेकैकां क्रमेण⁴ पूजयेदित्यर्थः ॥१२॥ देवी है। दूसरी त्रिपुरेश्वरी और तीसरी का नाम त्रिपुरसुन्दरी कहा गया है। हे महादेवि ! चौथी देवी त्रिपुरवासिनी, पांचवीं त्रिपुराश्री, छठी त्रिपुरमालिनी, सातवीं त्रिपुरासिद्धि, आठवीं त्रिपुराम्बिका और नवीं महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी है ॥९-१२॥ इन श्लोकों का अर्थ स्पष्ट है ॥९-१२॥ अब प्रश्न उठता है कि क्या इन नौ चक्रेश्वरी विद्याओं की पादाग्र आदि बाह्य और अकुल आदि आन्तर स्थानों में केवल न्यास और भावना ही क्रम से की जाती है ? इस प्रश्न का समाधान यह है— पूर्वोक्त नौ चक्रों में न्यास और भावना के साथ ही इन चक्रेश्वरियों की पूजा भी करनी चाहिये ॥१२॥ अभी त्रिपुरा आदि नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का वर्णन किया गया है। पहले (१।८२- ८४) बताये गये नौ चक्रों में इनकी पूजा करनी चाहिये। नवचक्र पद में एकवचन इस अभिप्राय को प्रकट करता है कि ये चक्र नौ होते हुए भी एक ही हैं, एक दूसरे से मिले हुए हैं, इनको एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। अकुल आदि स्थानों में इनके परस्पर मिले हुए स्वरूप की भावना की जाती है। इस तरह से अकुल आदि स्थानों में १. देवी—क. ख. ग. ज. । २. सिद्धा ष्टष्टमी—क. उ. । ३. 'किम्' नास्ति—ख. ग. घ. ज. । ४. 'क्रमेण' नास्ति—ख. घ. ते. ज. ।