योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु किमासां नवधात्वं स्वाभाविकम् ? नेत्याह- एवं नवप्रकाराद्या पूजाकाले तु पार्वति । एकाकारा ह्याद्यशक्तिरजरामरकारिणी ॥१३॥ आद्या शिवादिक्षित्यन्तस्य जगतो निदानत्वात् । आद्या शक्तिराद्यशक्तिः । आद्यस्य सकलवर्णादिभूतस्य प्रकाशात्मनः परशिवस्य शक्तिर्विमर्शरूपिणी । एका- कारा परापूजाकाले तेन निरन्तरं सामरस्यमापन्ना । अपरापूजाकाले तु तथा न भवति । एवमुक्तप्रकारेण । नवप्रकारा नवविधा भिन्ना । एवंविधपूजकस्य अज- रामरकारिणी । अजमरामर उक्तलक्षणः (१।८५) शिवः, तत्त्वमस्य करोति । अत्रैव वक्ष्यति- "तव नित्योदिता पूजा त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता" (३।२) इति ॥१३॥ प्रासङ्गिकमुपसंहृत्य प्रकृतमेव प्रधानं मन्त्रसंकेतमुद्दिशति- मन्त्रसंकेतकतस्तस्या नानाकारो व्यवस्थितः । नानामन्त्रक्रमेणैव पारम्पर्येण लभ्यते ॥१४॥ परस्पर संयुक्त रूप से विभावित इन नौ चक्रों में, त्रैलोक्यमोहन चक्र से लेकर सर्वानन्दमय पर्यन्त चक्रों में, क्रमशः एक-एक देवी का पूजन भी करे ॥१२॥ क्या चक्रेश्वरों के ये नौ भेद स्वाभाविक हैं? नहीं- हे पार्वति ! यह आद्या शक्ति पूजा के समय ही ये नौ रूप धारण करती है। वस्तुतः यह शक्ति एक ही है और यही साधक को अजरामर शिव स्वरूप बना देती है ॥१३॥ शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त जगत् का मूलकारण होने से यह शक्ति आद्या कहलाती है। जो आद्या है और शक्ति भी है, वह है आद्यशक्ति। यह आद्यशक्ति सकल मातृका वर्णों में प्रथम आने वाले अनुत्तर अकार स्वरूप प्रकाशात्मक परशिव के साथ विमर्शरुपि हकार के रूप में मिली रहती है, साधक जब परा पूजा में निरत रहता है, तो यह शक्ति शिव के साथ निरन्तर यामलभाव में विद्यमान रहती है। किन्तु अपरा पूजा में उसकी यह स्थिति नहीं रहती। उस समय तो यह ऊपर बताए नौ स्वरूप धारण कर लेती है। इस तरह की पूजा करने वाले साधक को यह शक्ति अजरामर बना देती है। अजरामर शब्द की व्याख्या हम पहले (१।८५) कर चुके हैं। तदनुसार परमशिव ही अजरामर हैं। जो साधक ऊपर बताई गई परा और अपरा पूजा का अनुष्ठान करता है, उसको यह देवी अजरामर शिवस्वरूप बना देती है। पूजा के इन प्रकारों का वर्णन आगे (३-२) किया जायेगा ॥१३॥ प्रसंगवश आई इन बातों का उपसंहार कर अब प्रस्तुत प्रधान विषय मन्त्रसंकेत का विवरण उपस्थित करते हैं- उस परा भगवती का मन्त्रसंकेत अनेक रूपों में विभक्त है। अनेक मन्त्रों के क्रम से इसका ज्ञान गुरुपरम्परा से ही प्राप्त हो सकता है ॥१४॥