योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 167, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें[ द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११७ तस्याः परशिवसामरस्यरूपायाः पराया यो मन्त्रः सौभाग्यविद्यारूपः, तस्य संकेतो गूढार्थप्रदर्शनम्। नानाकारः अनन्तरवक्ष्यमाणषड्विधरूपः। नानामन्त्र- क्रमेणैव अनन्तरपूर्वोक्तकरशुद्ध्यादिनानाप्रपञ्चपरिपाट्यैव। पारम्पर्येण लभ्यते सोपानावरोहरीत्या शिवादिस्वगुरुपर्यन्तपरम्परोपदेशकमेण लभ्यते, नान्यथा। पारम्पर्यविहीनानामसम्प्रदायवतां चुम्बकवृत्त्या चौर्याविगताक्षरपाठमात्रपर्यवसि- तानामनर्थायैव केवलमित्यर्थः। अत्रैव वक्ष्यति— पारम्पर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः। तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥ (२।८१) इति ॥१४॥ उद्दिष्टस्य मन्त्रसंकेतस्य विभागं प्रतिजानीते— षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे। परशिव के साथ समरसभाव में स्थित उस परा भगवती के सौभाग्यविद्या के नाम से प्रसिद्ध मन्त्र का संकेत (स्वरूप) अत्यन्त निगूढ, रहस्यमय अर्थों से भरा हुआ है। इनके छः प्रकारों का वर्णन अभी आगे किया जायेगा। इन अर्थों का ज्ञान अभी बताए गये करशुद्धिविद्या प्रभृति मन्त्रों की क्रमशः गुरुपरम्परा से प्राप्त विधि से उपासना करने पर ही हो सकता है। जैसे हम सीढियों की सहायता से प्रासाद से नीचे उतरते हैं, उसी तरह से शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आई परम्परा से ही ज्ञान हमारे पास पहुँचता है। ज्ञान प्राप्ति का इसके सिवाय दूसरा कोई मार्ग नहीं है। जो व्यक्ति इस गुरुपरम्परा से ज्ञान प्राप्त नहीं करते, जिनका कोई सम्प्रदाय नहीं है और जो चुम्बक वृत्ति से, चोरी से कुछ अक्षरों का ज्ञान प्राप्त करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, ऐसे व्यक्ति को इनसे कोई लाभ नहीं मिलता, उलटे ऐसा करने वाले को इससे हानि ही उठानी पड़ती है। यहीं आगे (२।८१) बताया जायेगा— जिनको परम्परा से कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है और जो अपने स्वयंभू ज्ञान पर गर्व कर पारम्परिक ज्ञान को प्राप्त करना भी नहीं चाहते, समय (साम्प्रदायिक परम्परा) का लोप करने वाले, शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करने वाले ऐसे व्यक्तियों को डाकिनी प्रभृति देवियां विद्रूप बना देती हैं ॥१४॥ नाम मात्र से उपदिष्ट मन्त्रसंकेत का अब विभाग बताते हैं— हे अनघे देवेशि! वह मन्त्रसंकेत छः प्रकार का है। उसे मैं तुम्हें कह रहा हूँ ॥१५॥