भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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११८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः षड्विधः अनन्तरवक्ष्यमाणभावार्थादिप्रकारेण षड्विधः । अनघे परशिष्य- त्वादिदोषरहिते । तेव१ मदंशभूताया विमर्शशक्तेः । प्रकाशात्मकोऽहं तं२ तु षड्विधं कथयामि ॥ तद्विभागमाह— भावार्थः सम्प्रदायर्थो निगर्भार्थश्च कौलिकः ॥१५॥ तथा सर्वरहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च । वक्ष्यमाणलक्षणत्वात् स्पष्टोऽर्थः ॥१५-१६॥ ३षोढा प्रकारेण लक्षणानि कथयिष्यन्नादौ भावार्थमाह— अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ॥१६॥ न क्षरन्तीत्यक्षराणि नित्यपरशिववाचकत्वात् । किञ्च, ताल्वोष्ठव्यापारोऽ- भिव्यञ्जकस्तेषाम् । अत एवाक्षराण्याक्षराणि । तेषामर्थोऽभिधेयः । श्रीसौभाग्य- विद्याऽवयवपञ्चदशाक्षराणामर्थो भावार्थः ॥१६॥ इसके भावार्थ आदि छः भेदों का वर्णन अभी आगे किया जा रहा है । 'अनघे' यह संबोधनात्मक विशेषण देवी में परशिष्यत्व आदि दोषों के अभाव का सूचक है । मैं प्रकाशात्मक शिव मेरी ही अंशभूत विमर्श शक्ति का नाम धारण करने वाली तुमको उन छः भेदों का वर्णन कर रहा हूँ ॥१५॥ उसी विभाग को अब बताते हैं— भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ और कौलिकार्थ, सर्वरहस्यार्थ तथा महा- तत्त्वार्थ ये ही छः भेद हैं ॥१५-१६॥ इन सबके लक्षण आगे बताये जायंगे, श्लोक का अर्थ स्पष्ट ही है ॥१५-१६॥ इन छः अर्थों का लक्षण आगे बताया जा रहा है । इनमें से सबसे पहले १भावार्थ का स्वरूप बताते हैं— हे परमेश्वरि ! केवल मन्त्र के अक्षरों का अर्थ ही यहाँ भावार्थ कहा गया है ॥१६॥ अक्षर नित्य परशिव के वाचक हैं, अतः इनका भी स्वरूप अक्षर, अविनाश्र्वर है । तालु, ओष्ठ आदि के व्यापार से इनकी अभिव्यक्ति मात्र होती है, उत्पत्ति नहीं । इस तरह से ये अक्षर अविश्वर हैं, इनकी उत्पत्ति नहीं होती । इन अक्षरों का जो अर्थ है, श्रीसौभाग्यविद्या नामक मन्त्र के अवयवभूत पन्द्रह अक्षरों का जो अभिधेय है, उसे ही भावार्थ कहते हैं ॥१६॥ १. तेन तव—ख, ने. ज. झ. । २. 'तं तु षड्विधं' नास्ति—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. षोढा दिन्यासक्रमेण—ग. ने. ज. झ. उ. । ४. यहाँ '...' पाठ...