योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११९ अक्षरार्थमेवाह— योगिनीभिस्तथा वीरैर्वीरेन्द्रैः सर्वदा प्रिये । शिवशक्तिसमायोगाज्जनितो मन्त्रराजकः ॥१७॥ योगिन्यः, योगः शिवसंबन्धो नित्यं विद्यते आसामिति योगिन्यो विमर्शशक्त्यं- शभूतेच्छाज्ञानक्रियात्मकभारतीपृथ्वीरुद्राण्यः । वीरा उक्तार्थाः (१।६५), तद्योगिनी- नित्यसंबन्धभूताः प्रकाशांशभूता वामाज्येष्ठारौद्र्यात्मकब्रह्मविष्णुरुद्राः सृष्टिस्थिति- संहारकर्तारः । वीरेन्द्राः सृष्टिस्थितिसंहारपदातीताऽनाख्याधिकारिणस्ते शान्ताऽ- म्बिकात्मानः शिवशक्तिमिथुनत्रयसमष्टिरूपास्त्रिबीजशिखरवर्तिकामकलात्रया- भिधेयाः । एतैर्विद्याक्षराभिधेयमयैर्मिथुनचतुष्टयैः । शिवशक्तिसमायोगात् शिव- शक्त्योः समायोगः सम्पर्कस्तस्मात् । मन्त्रराजकः सौभाग्यविद्यारूपः, सकल- मन्त्रोत्तमत्वात् । जनितः जातः । आदिकर्मणि क्तः, जातो भावित इति यावत्, तस्यार्थस्य नित्यत्वात् । अयमेवार्थो मया सौभाग्यसुधोदये प्रपञ्चितः । यथा— इन अक्षरों के अर्थ को ही बताया जा रहा है— हे प्रिये ! योगिनियों, वीरों और वीरेन्द्रों के सदा रहने वाले संपर्क से तथा शिव और शक्ति के समायोग से मन्त्रराज की उत्पत्ति मानी जाती है ॥१७॥ जिनका शिव के साथ योग, नित्य संपर्क बना रहता है, वे योगिनियां कहलाती हैं । ये हैं विमर्श शक्ति की अंशभूत इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों से अभिव्यक्त हुई भारती पृथ्वी और रुद्राणी नामक शक्तियां । वीर पद का अर्थ पहले (१।६५) बता दिया गया है । प्रकाश की अंशभूत वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों से अभिव्यक्त ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक वीरों का उक्त भारती, पृथ्वी और रुद्राणी नामक योगिनियों से सदा संपर्क बना रहता है । ये क्रमशः सृष्टि, स्थिति और संहार पद से अतीत तुरीय (चतुर्थ) अनाख्या पद के अधिकारी वीरेन्द्र कहलाते हैं । इनका स्वरूप शान्ता और अम्बिका शक्ति से अभिव्यक्त होता है और शिव एवं शक्ति से अभिव्यक्त अभी बताये गये तीनों मिथुनों का समवेत स्वरूप इनमें छिपा हुआ है । वाग्भव आदि तीन बीजों के शिखर पर विराजमान तीन १कामकलाक्षर इनके बोधक हैं । इस तरह से सौभाग्यविद्या में विद्यमान १५ अक्षरों से चार मिथुनों का बोध होता है । शिव और शक्ति का जो निरन्तर प्रवर्त्तमान सम्पर्क है, उसी से सभी मन्त्रों में उत्तम सौभाग्यविद्या नामक इस मन्त्रराज की निष्पत्ति होती है । 'जनितः' पद में आदि कर्म में क्त प्रत्यय होता है । इसका तात्पर्य यह है कि यह तत्त्व तो नित्य है, किन्तु इसमें उक्त प्रकार से इसकी उत्पत्ति हुई है, ऐसी भावना की १. सम्पर्कस्तन्मिथुनीकृत-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । १. कामकलाक्षर का परिचय हम पृ० १६-१७ की टिप्पणी में ले चुके हैं ।