भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १२३ त्रिमये तुरीयबीजेऽनाख्यारूपोत्तरान्वयात्मनि तौ । शक्तिशिवावधिवसतो निरन्तरं सामरस्यमापन्नौ ॥ सृष्ट्यादिभेदभिन्नश्रीविद्यावर्णयुगलनवकात्मा । नवनादवर्गरूपा माता सा मध्यमाऽभिधा वितता ॥ शब्दस्पर्शौ रूपं रसगन्धौ चेति भूतसूक्ष्माणि । व्याप्यव्यापकभावात् पञ्चदश स्युः क्रमेण तत्संख्याः ॥ सृष्टि, स्थिति और संहार दशा की समष्टिभूत तुरीय (चतुर्थ) अनाख्या नामक दशा में, जो कि उत्तरान्वय (उत्तरान्नाय) को सूचित करती है, तुरीय युगल के रूप में ऊपर वर्णित शक्ति और शिव सामरस्यभाव से सम्पन्न होकर निरन्तर निवास करते हैं। सृष्टि आदि चार-चार अवस्थाओं के भेद से श्रीविद्या के वर्णयुगल (अकार और हकार लिपि) आठ प्रकार के हो जाते हैं। अनाख्या नामक तुरीय दशा में इन्हीं आठ वर्णों के समष्टि स्वरूप से एक नया नवां वर्ण भी प्रकट हो जाता है। इस तरह से नौ नाद और नौ वर्गों वाली ¹मध्यमा नामक माता (वाणी) का स्वरूप बनता है ॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच तन्मात्राएँ ²व्याप्यव्यापकभाव से पाँच महाभूतों में १५ प्रकार से विभक्त हो जाती हैं। ये ही पन्द्रह तिथियों, पन्द्रह तिथिनित्याओं १. नवधा विभक्त मध्यमा वाणी और इसके स्थूल एवं सूक्ष्म रूपों का परिचय कामकलाविलास (श्लो० २६-२७) में दिया गया है। अर्थरत्नावलीकार (पृ० ३६) ने संकेतपद्धति और हंसनिर्णय के प्रमाण से सूक्ष्म मध्यमा का निरूपण किया है और संकेत- पद्धति के इस वचन को दीपिकाकार (पृ० २।६३-६४) ने भी उद्धृत किया है। भूतलिपि के रूप में स्थूल मध्यमा का परिचय दीपिकाकार ने पूजासंकेत (३।१३६-१३८) में दिया है। २. तन्त्रशास्त्र में सामान्यतः सांख्य प्रक्रिया का अनुसरण किया जाता है। प्रस्तुत प्रसंग में भी वेदान्त अथवा न्याय दृष्टि का अनुसरण न कर सांख्य दृष्टि को ही मान्यता दी गई है। तदनुसार शब्द(आकाश)तन्मात्रा अन्य सभी तन्मात्राओं में व्याप्त है, अर्थात् शब्दतन्मात्रा व्यापक तत्त्व तथा अन्य चार तन्मात्राएँ व्याप्य हैं। यही प्रक्रिया आगे भी चलती है। इस व्याप्य-व्यापकभाव प्रक्रिया का निष्कर्ष यह निकलता है कि आकाश- तन्मात्रा के अतिरिक्त अन्य चार तन्मात्राओं में भी शब्द की स्थिति रहती है। स्पर्श की चार में, रूप की तीन में, रस की दो में और गन्ध की केवल एक पृथिवी में स्थिति रहती है। इस तरह से ये पाँच तन्मात्राएँ व्याप्य-व्यापकभाव (५ + ४ + ३ + २ + १ = १५) से पाँच महाभूतों में पन्द्रह प्रकार से विभक्त हो जाती हैं। पाँच महाभूतों के इन पन्द्रह गुणों की चर्चा बौद्ध योग के ग्रन्थ सेकोद्देशटीका (पृ० ५१) में भी आई है। वहाँ नाभि, हृदय, कण्ठ, ललाट और उष्णीष चक्र में क्रमशः पाँच, चार, तीन, दो और एक