योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः अत्र तु शक्त्यर्णस्य प्राथम्यं शक्तिबीजभूतत्वात् । अधिवसतः शिवशक्ती १संज्ञानाख्या तयोस्तु त्रित्वमयी ॥ कामकला कलयित्री तुर्यमयी रक्तशुक्लमिश्रतनुः । रक्तो बिन्दुः शक्तिः शुक्लः शम्भुः परस्तदैकात्म्यम्२ ॥ एवं द्वितीयबीजं स्थितिरूपं दक्षिणान्वयात्म स्यात् । स्थितिसृष्ट्यादिविभेदाद् वसन्ति ता एव देवतास्तत्र ॥ अत्र कलवर्णमध्यस्थितो हकारः स्थितिस্বরূপत्वम् । अस्य द्योतयति परं३ स्थितिरूपं संविदम्बिकाकारः ॥ संहारात्मकपश्चिमसमयमये तद्वदेव तार्तीये । संहृतिसृष्ट्यादिवशाद्४ वसन्ति ता एव देवतास्तत्र ॥ सृष्टौ शक्तेर्नियतप्राधान्या५दस्य शक्तिबीजत्वात् । स्वात्मनि संहृतिसृष्टौ शिवमन्तर्भाव्य भासते शक्तिः ॥ बीज है। इसमें शक्ति की प्रधानता होती है, अतः शक्तिबीजात्मक सृष्टिसंहार विभाग में शक्ति के वर्ण हकार को प्राथमिकता दी गई है और शिव वाचक रकार की स्थिति बाद में है ॥ अनाख्या नामक तुरीय (चतुर्थ) विभाग में शिव और शक्ति का आधिपत्य है। यह युगलस्वरूप त्रिधा विभक्त होकर त्रिविध कामकलाओं का स्वरूप धारण कर लेता है। यह कामकला ही काल को कलन व्यापार सिखाती है। यह तुरीयस्वरूपा है तथा रक्त, शुक्ल और मिश्र बिन्दुओं से इसका स्वरूप बनता है। रक्त बिन्दु शक्ति का, शुक्ल बिन्दु शिव का और मिश्र बिन्दु शिव एवं शक्ति के सामरस्य स्वरूप का सूचक है ॥ इसी तरह से द्वितीय कामराज बीज स्थितिदशा और दक्षिणान्वय (दक्षिणाम्नाय) का सूचक है। स्थितिसृष्टि, स्थितिस्थिति, स्थितिसंहार और अनाख्या के भेद से इस बीज में भी पूर्वोक्त सभी देवता निवास करते हैं। यहाँ क और ल वर्णों के मध्य में विद्य- मान हकार इस कामराज बीज की स्थिति-दशा को उजागर करता है, क्योंकि यह हकार सबका पालन करने वाली संवित्-स्वरूपिणी अम्बिका की प्रतिमूर्ति है ॥ इसी तरह से तृतीय शक्तिबीज संहारदशा और पश्चिमसमय (पश्चिमाम्नाय) का सूचक है। संहारसृष्टि, संहारस्थिति, संहारसंहार और अनाख्या के भेद से इस बीज में भी वे सभी देवता निवास करते हैं। सृष्टिदशा में शिव की अपेक्षा शक्ति की निश्चित ही प्रधानता रहती है और यह शक्तिबीज के नाम से प्रसिद्ध है। अतः संहारसृष्टि दशा में यह शक्ति शिव को तिरोहित कर स्वयं भासित होती है ॥ १. सर्गानाख्या-ग. ने. ज. झ. उ. । २. र्थ्यम्-ज. झ. उ. । ३. परध्वनिरूपः संविदम्बराकारः-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. तु ता एवात्रापि देवता न्यवसन्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. न्तः-ख. ग. ज. झ. उ. ।