योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तिथयश्च कला नित्यास्तदात्मिकाः स्युस्तथैव तत्संख्यैः । वर्णैः समष्टिरेषा विद्या व्याप्नोति तानि सर्वाणि ॥ सर्गादि१समष्टिरूपैः२ स्वांशै३रेभिस्तदात्मना विततैः४ । सर्गेण कादिवर्णैरपि षट्त्रिंशद्भि रात्मनोऽवयवैः ॥ पुनरज्व्यञ्जनबिन्दुप्रभेदभिन्नांस्तदक्षरावयवान् । षट्त्रिंशत्संख्याकांस्तत्त्वमयानश्नुते हि सा माता ॥ व्यष्टिसमष्टिविभेदैश्चतुरात्मा तत्त्वबीजपीठमयी । चतुरन्वयात्मनाऽपि च माताऽष्टकमातृकामयी विद्या ॥ इति ॥१७॥ तुरीयमन्त्रस्यार्थमाह— (२।१-२५) तन्मयीं परमानन्दनन्दितां स्पन्दरूपिणीम् । निसर्गसुन्दरीं देवीं ज्ञात्वा स्वैरमुपासते ॥१८॥ और पन्द्रह वैखरी स्वरों में परिणत हो जाती हैं। इन सबकी समष्टिस्वरूपिणी, षोडशी नित्या कला इन सबमें व्याप्त रहती है, क्योंकि सृष्टि का आरम्भ होने से पहले समष्टि रूप में स्थित अपने अंशों का ही वह सृष्टि करते समय इन रूपों में विस्तार कर देती है। विसर्गस्वरूपिणी यह षोडशी नित्या कला जब पुनः सृष्टि व्यापार में प्रवृत्त होती है, तो वह ककार आदि वर्णों से बने अपने छत्तीस१ अवयवों वाले रूप का विस्तार करती है। इस तरह से यह माता भगवती स्वर, व्यंजन, बिन्दु आदि के भेद-प्रभेद वाले इन अक्षरों रूपी अवयवों से छत्तीस तत्त्वों वाले अपने नये रूप में व्याप्त हो जाती है। तब व्यष्टि और समष्टि के भेद से चार प्रकार से विभक्त हुई सबकी जननी यह मूलविद्या चार- तत्त्व, चार बीज, चार पीठ, चार अन्वय (आम्नाय) आदि का भी स्वरूप धारण कर लेती है ॥१७॥ अब २तुरीय मन्त्र का अर्थ बताते हैं— तन्मयी, अर्थात् मिथुनत्रय समष्टिरूपिणी तुरीयस्वरूपा परमानन्द से ओत- १. स्थिति-ख. ग. ज. झ. उ. । २. 'रूपः' इत्येव सार्वत्रिकः पाठः । ३. रणुभि- ख. ग. ने. ज. झ. । ४. 'विततः' ख. विहाय सर्वत्र । गुण की स्थिति मानी गई है। वेदान्त अथवा न्याय दृष्टि का अनुसरण करने पर यह नहीं हो सकता, क्योंकि वेदान्त दर्शन में पंचीकरण प्रक्रिया के अनुसार सभी भूत पाँचों गुणों से संयुक्त हैं और न्याय-वैशेषिक दृष्टि में ये पाँच गुण क्रमशः पाँच भूतों के विशेष गुण हैं, अतः उनकी अन्यत्र स्थिति नहीं मानी जा सकती । १. सम्प्रदायार्थ का निरूपण करते समय यह सारा विषय मूल ग्रन्थ में भी आगे (२।३२-३५) विवेचित है। २. तुरीय मन्त्र का अभिप्राय यहाँ सौभाग्यविद्या के तुरीय स्वरूप से है। समष्टि