योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १२५ तन्मयीं भारत्यादिब्रह्मादि१मिथुनत्रयवाचक२बीजत्रयसमष्टिरूपां ३तुरीयमन्त्र- वाच्याम् । परमानन्दनन्दितां परमशिवसामरस्यपरिस्फुरत्परमानन्दनिर्भराम् । स्पन्दरूपिणीं शिवादिक्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्त्वस्पन्दरूपेण व्यक्तनिजविभवाम् । निसर्गसुन्दरीं सर्वप्राणिष्वात्मतया ४परप्रेमास्पदीभूताम् । देवीं महात्रिपुरसुन्दरीं प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपिणीं५ पराम् । ज्ञात्वा स्वात्मतया । स्वैरमुपासते स्वात- न्त्र्येण विहरन्ति, स्वैराचारपरा भवन्तीत्यर्थः । अत्रैव वक्ष्यति—"स्वैराचारेण सम्पूज्या त्वहन्तेदन्तयोः समा” (३।१६४) इति ॥१८॥ मन्त्रशब्दार्थमाह— शिवशक्त्याख्यसंघट्टरूपे ब्रह्मणि शाश्वते । तत्प्रथाप्रसराश्लेषभुवि त्वैन्द्रोपलक्षिते ॥१९॥ प्रोत स्पन्दस्वरूपा निसर्गसुन्दरी देवी को जान लेने के बाद साधक उसकी स्वच्छन्द उपासना करते हैं ॥१८॥ तन्मयी का अर्थ है भारती-ब्रह्मा आदि के तीन मिथुनों के वाचक तीन बीजों की समष्टिस्वरूपिणी चौथी सम्पूर्ण श्रीविद्या। यह श्रीविद्या परमानन्दनन्दिता है, परमशिव के सामरस्य से समुद्भूत परमानन्द से भरी हुई है। स्पन्दरूपिणी है, शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों के स्पन्दन के रूप में यह अपने ही वैभव का विस्तार करती है। निसर्ग- सुन्दरी है, सभी प्राणियों की अपनी आत्मा के रूप में यह सर्वत्र परम प्रेम का विस्तार करती है। यह देवी प्रकाश और विमर्श के सामरस्यमय स्वरूप में महात्रिपुरसुन्दरी के नाम से प्रकाशमान है। भगवती के इस तुरीय स्वरूप का, श्रीविद्या के इस चतुर्थ अर्थ का अपनी ही आत्मा के रूप में साक्षात्कार कर लेने के बाद साधक स्वतन्त्र रूप से आहार- विहार करने लगते हैं, अर्थात् यथेष्ट आचरण करने लगते हैं। यहीं आगे (३।१६४) बताया गया है—"अहन्ता और इदन्ता में समान रूप से विद्यमान भगवती त्रिपुरसुन्दरी की उपासना अपने मनोन्कूल पदार्थों से करनी चाहिये” ॥१८॥ मन्त्रशब्द का अर्थ बताते हैं— प्रकाशविमर्श नामक संघट्ट (सामरस्य) के रूप में विराजमान, नित्य, विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार के साक्षी, महान् ऐश्वर्य सम्पन्न ब्रह्म (परमात्मा) १. चतुर्मिथुन-क. ग. ने. ज. झ. उ. । २. पीठ-ने. । ३. 'तुरीयमन्त्रवाच्यां' नास्ति-ख. ने. ज. । ४. बिभेदिनीं-ने. ज. झ. उ., शालिनीं-ख. । ५. 'पर' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. रूपां-ने. ज. झ. उ. । स्थिति और संहार के प्रतीक वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक व्यष्टि बीजों के अति- रिक्त सौभाग्यविद्या का एक समष्टि स्वरूप भी है। इसी को यहाँ समष्टि बीज कहा गया है। और उस विद्या के स्वरूप को जान लेने के बाद साधक स्वच्छन्द रूप से