योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ज्ञातृज्ञानमयाकारमेनेनान्मन्तरूपिणी² । शिवशक्त्यात्मसंघट्टर रूपे शिवशक्त्यात्मनोः प्रकाशविमर्शयोः संघट्टः सामर- स्यम्, तद्रूपे ब्रह्मणि, "³बृह वृद्धौ" (७३५ भ्वा०) इत्यस्माद् धातोर्बृंहणत्वादात्मैव ब्रह्मेति ⁴वैयाकरणोक्तरीत्या सर्वप्राणिष्वात्मनि । शाश्वते भूतभविष्यत्कालशा- लिनि । तत्प्रथाप्रसराश्लेषभुवि । तच्छब्देन प्रकाशात्मा परामृश्यते । श्रीभगवद्गी- तायाम्—"ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः” (१७।२३) इति । ⁵तस्य शिवस्य ⁶प्रकाशमयस्य प्रथा विमर्शशक्तिः, यथा दीपस्य⁷ प्रभा तद्वत्, तस्याः प्रसरः षट्त्रिंशत्तत्वात्मना परिणामः, तस्याश्लेषः ⁸शिवे तन्मात्रतया पर्यवसानम्, तस्य भुवि विश्रान्तिस्थाने । अत्र श्रुतिः—"सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत” (छा० उ० ३।१४।१) इति । ऐन्द्रोपलक्ष्ते, के रूप में ज्ञाता के ज्ञानमय आकार की चिन्ता करने वाले साधक की रक्षा करने वाली होने से यह विद्या मन्तरूपिणी है ॥१९-२०॥ शिवशक्त्यात्मसंघट्टरूप का अर्थ है शिव और शक्ति स्वरूप प्रकाश और विमर्श का सामरस्यमय आकार । यह आकार ही ब्रह्म कहलाता है । वृद्धि अर्थ वाली बृह धातु से यह शब्द बनता है । व्याकरण शास्त्र में ब्रह्म पद की यही व्युत्पत्ति दी गई है । अपने विस्तार के कारण यह ब्रह्म सभी प्राणियों की आत्मा के रूप में स्थित है । यह शाश्वत है, भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में विद्यमान है । तत्प्रथा इत्यादि समस्त पद में विद्यमान तत् शब्द से ब्रह्म का प्रकाशात्मक स्वरूप बोधित होता है । भगवद्गीता में बताया गया है—"ॐ, तत् और सत्—इन तीन शब्दों से ब्रह्म का बोध होता है" । उस प्रकाशात्मक ब्रह्मस्वरूप शिव की प्रथा है विमर्श शक्ति । दीपक की प्रभा के समान यह शक्ति प्रकाशात्मक शिव की प्रभा है । यह प्रभा ही ३६ तत्त्वों के रूप में परिणत हो जाती है और इसका आश्लेष अर्थात् विलय भी शिव में ही होता है । इसका भाव यह है कि विमर्श शक्ति सृष्टि दशा में ३६ तत्त्वों के रूप में परिणत होती है और वही संहार दशा में केवल शिवस्वरूप में पर्यवसित (विलीन) हो जाती है । इस तरह यह प्रकाशात्मक शिव शक्ति की विश्रामस्थली है । छान्दोग्य श्रुति इसमें प्रमाण है—"यह सब कुछ ब्रह्म है । संयत-चित्त साधक को चाहिये कि वह इस प्रकार की भावना करे कि ब्रह्म से ही सब कुछ पैदा हुआ है, उसी में लीन होने वाला है और उसी की सामर्थ्य से यह सांस ले रहा है" ॥ १. करणा-ख. ग. च. छ. ज. झ । २. णीम्-ख. ग. ने. च. छ. ज. झ. । ३. बृहि बृंहि-ने. ज. । ४. वैयासिकतन्त्रोक्त-ज. झ. उ. । ५. 'तस्य' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. प्रकाशस्य-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. दीपस्य तत्प्रथायाः प्रसरः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. शिवेस्तन्मात्रतया-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।