भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

द्वितीयः ] दीपकाभाषानुवादसहितम् १२७ "इदि१ परमैश्वर्ये" (६३ भ्वा०), परमैश्वर्यवानिन्द्रः । अत्र श्रुतिः—"इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" (ऋ० ४।७।३३) इति । तत्संबन्धि ऐन्द्रं कर्म, तेनोपलक्षिते । काक- वद् देवदत्तगृहमितिवद् विश्वसर्जनादिव्यवहारोऽस्योपलक्षणम्, न तु स्वरूपधर्म इति यावत् । प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपे नित्ये विश्वसृष्टिस्थितिसंहारकारिणि २साक्षिणि तत्प्रकृत्यात्मक३महदैश्वर्यपरामृष्टे परमात्मनि विषये ४ज्ञातृज्ञानमया- कारमननाद् ज्ञातुरादरनैरन्तर्यपाटवाभ्याससद्भाव५तत्प्रकर्षलक्षणमननात् तन्मया- कार६भावणालक्षणत्राणान्मन्त्ररूपिणी७ । कोऽर्थः ? उक्तविशेषण८विशिष्टपरप्रकाश- विषयमननात् स्वसाधकं तन्मयरूपताप्रतिपादनेन त्रायत इति निरुक्त्या तुरीय- लक्षणमहामन्त्ररूपिणीयमित्यर्थः ॥१९-२०॥

'इदि' धातु का अर्थ परम ऐश्वर्य होता है । इन्द्र शब्द इसी धातु से बना है । इन्द्र परम ऐश्वर्य सम्पन्न होता है । ऋग्वेद में वर्णन आया है कि "इन्द्र अपनी माया से अनेक रूप धारण कर लेता है" । यह ब्रह्म भी इन्द्र के समान सभी शक्तियों से सम्पन्न है "कौवा वाला घर देवदत्त का है" इस वाक्य से देवदत्त के घर की पहचान मात्र कराई जाती है, उस घर से कौए का कोई नित्य संबन्ध नहीं है; उसी तरह से विश्व की सृष्टि आदि व्यापारों से ब्रह्म का परिचय मात्र कराया जाता है, ब्रह्म का यह शाश्वत स्वरूपधर्म नहीं है । संक्षेप में इसका अर्थ यह होगा कि प्रकाशविमर्शसामरस्यस्वरूप, नित्य, विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार के कर्ता और उसके साक्षी, अपनी शक्ति (प्रकृति) के रूप में महान् ऐश्वर्य से संपन्न इस परमात्मा के स्वरूप में जो ज्ञाता (साधक) आदर पूर्वक सावधानी से निरन्तर अपने चित्त को लगाता है और तन्मय होकर उसी में अपनी भावना को केन्द्रित किये रहता है, तो इस अवस्था में यह शक्ति उसकी रक्षा भी करती है । मनन करने वाले साधक की रक्षा करने वाली यह शक्ति उस समय मन्त्ररूपिणी हो जाती है, मन्त्र (श्रीविद्या) का स्वरूप धारण कर लेती है । इसका भाव यह है कि ऊपर बताये गये विशे- षणों से विभूषित ब्रह्म के परम प्रकाशमय स्वरूप का मनन करने वाले साधक को ब्रह्म- मयता प्रदान कर उसकी रक्षा करने वाली यह तुरीया स्वरूप महाविद्या मननत्राणरूप मन्त्र के धर्मों को धारण करती है, अतः मन्त्ररूपिणी कहलाती है ॥ १९-२० ॥

१. 'इदि परमैश्वर्ये' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. 'साक्षिणि' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. माहैश्वर्य-ने. ज. झ. उ. । ४. 'ज्ञातृज्ञानमयाकारमननाद्' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. मननवत्तस्त-ख. ने. झ. उ. । ६. करण-ख. ने. ज. झ. । ७. णीमित्यर्थः-ने. । ८. 'विशिष्ट' नास्ति-ख. ज. झ. उ. ।