योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननूक्तविशेषणविशेषिता तुरीयमन्त्ररूपिणीयं¹ किल्लक्षणेत्यत आह— तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥२०॥ “तन्मयीम्” (२।१८) इति पूर्वोक्तमेव । तेषां ब्रह्मादीनां भारत्यादीनां च सृष्ट्यादिसमष्टिरूपलक्षणेन लक्षिता पराशक्तिः । तुरवधारणे । पराशक्तिरेव, न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ (श्वे० उ० ६।८) इतिश्रुतिप्रतिपादिता परैव मातृका, अखिलमनाहतमूर्तिर्मात्युत्तीर्णस्वरूपिणी तरति । कायति नानानामप्रपञ्चरूपेण मातृका देवी ॥ (सौ० सु० १।६) उक्त विशेषणों से विभूषित तुरीय मन्त्ररूपिणी श्रीविद्या के स्वरूप का अब वर्णन करते हैं— ब्रह्मा-भारती आदि मिथुनों के सृष्टि आदि समस्त कार्यकलापों को अपने में समेटे हुए यह परा शक्ति ही मातृका (परा वाणी) है ॥२०॥ तुरीय मन्त्र का स्वरूप पहले (२।१८) बताया गया है । यह मन्त्रस्वरूपिणी तुरीय विद्या ब्रह्मा-भारती आदि तीन मिथुनों के सभी तीन कृत्यों को अपने में समेटे हुए है । इसलिये यही परा शक्ति है । 'तु' शब्द का प्रयोग होने से यह अर्थ निकलता है कि परा शक्ति में ही यह सामर्थ्य है कि उसमें ये तीनों कृत्य समष्टि रूप में स्थित हैं । श्वेताश्वतर उपनिषद् में— न वह किसी को पैदा करती है और न उसको कोई पैदा करता है । उसकी समानता करनेवाला जब कोई नहीं है तो भला उससे बढ़कर कौन दिखाई देगा । इस ब्रह्म की परा शक्ति ही ज्ञान, बल, क्रिया आदि विविध रूपों में सुनी जाती है ॥ इस प्रकार वर्णित यह परा शक्ति ही परा मातृका है । इसका स्वरूप स्वयं व्याख्या- कार ने अपने ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय में इस तरह से बताया है— यह परा मातृका देवी अपनी ¹अनाहत मूर्ति से सबको व्याप्त कर लेती है, अपने उत्तीर्ण स्वरूप से सबसे ऊपर उठ जाती है और इस जगत् में आकर नाना प्रकार के १. 'इयं' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । १. अनाहत, हत और उत्तीर्ण पद क्रमशः मध्यमा, वैखरी और पश्यन्ती वाणी के वाचक हैं । अतः अनाहत मूर्ति का अर्थ होगा मध्यमा वाणी, उत्तीर्णस्वरूपिणी पश्यन्ती तथा नाना नाम प्रपंचवाली होगी वैखरी वाणी । इस तरह से परा वाणी ही क्रमशः पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का रूप धारण करती हुई संसार में फैली हुई है।