योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १२९ इत्यस्मदुक्तरीत्या ¹परा मातृका पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीरूपेण व्यापृता। अत्र श्रुतिः— चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥ इति। (ऋ० १।१६४।४५) नामों (शब्दों) का शरीर धारण कर लेती है। इस तरह से माति, तरति और कायति इन तीन धातुओं से मातृका का स्वरूप बनता है। परा मातृका ही इस तरह से पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का स्वरूप धारण कर सबमें व्याप्त रहती है। ऋग्वेद में भी इनका वर्णन है— ¹वाणी के चार प्रकार होते हैं। इनके स्वरूप को मनीषी ब्राह्मण ही जान पाते हैं। वाणी के तीन स्वरूप छिपे हुए हैं। इसके चतुर्थ वैखरीमय स्वरूप का ही मनुष्य उच्चारण करते हैं॥ १. 'परा' नास्ति-ख. ज. झ. उ. ।
- निरुक्त (१३।९) और महाभाष्य (पस्पशाह्निक) में इस मन्त्र की व्याख्या मिलती है। सायण ने प्रथमतः निरुक्त के अनुसार इसकी व्याख्या कर बाद में आगम- तन्त्रशास्त्र संमत व्याख्या की है। महाभाष्य के व्याख्याकार कैयट ने पूरी तरह से महा- भाष्य का अनुसरण किया है, किन्तु नागेश भट्ट व्याकरण संमत व्याख्या देने के बाद आगम- तन्त्रशास्त्र संमत व्याख्या भी करते हैं। निरुक्तकार ने यहां आर्ष (सायण के अनुसार वेदवादी), वैयाकरण, याज्ञिक, नैरुक्त, ऐतिहासिक (निरुक्त में इस मत को 'एके' शब्द से संबोधित किया गया है) और आत्मवादियों के मत के अनुसार चार पदों का अलग अलग विवरण दिया है। इस सभी मतों में पूरे मन्त्र की व्याख्या में खींचतान करनी पड़ती है। नागेश भट्ट का कहना है कि नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात इन चतुर्विध पदों में से, जो कि निरुक्त और व्याकरण में समान रूप से मान्य हैं, प्रत्येक के चार चार भेद होते हैं। वाणी के प्रथम तीन भेदों के समान इनके भी प्रथम तीन रूपों को विद्वान् ही जान सकते हैं। साधारण जन केवल चतुर्थ रूप से ही अपना व्यवहार चलाते हैं। वाणी के परा, पश्यन्ती और मध्यमा नामक तीन भेद जैसे छिपे हुए हैं और चतुर्थ वैखरी वाणी से ही सांसारिक व्यवहार चलता है, उसी तरह से नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातों के तीन छिपे हुए और एक प्रकट रूप का कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। अतः इस मन्त्र की सायणकृत आगम-तन्त्र संमत व्याख्या ही उचित लगती है, जिसको नागेश भट्ट ने भी स्वीकार किया है। ९