भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१३० योगिनीहृदयम् [ मन्त्र संकेत: १अयमर्थः—ब्रह्मादिभारत्यादिसमष्टिरूपतालक्षणा २पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी- विस्तारप्रकाशविमर्शसामरस्यरूपा तुरीयमन्त्र३वाच्येति ॥२०॥ नन्वियमकारहकारसामरस्यरूपा परैव तुरीय४मन्त्रविशेषणविशेषिता तुरीय- पदवाच्येत्युक्तम्, तद्वर्णद्वयं मन्त्रे कुत्र निवसतौति (चेत्५), एतन्मन्त्रस्य तद्वर्ण- द्वयवाच्यायाः ६परायाश्च कः संबन्ध इत्यत आह— मध्यबिन्दुविसर्गन्तःसमास्थानमये परे। कुटिलारूपके तस्याः प्रतिरूपे वियत्कले ॥२१॥ तस्याः परायाः। मध्यबिन्दुविसर्गन्तःसमास्थानमये। मध्यबिन्दुरूध्वं बिन्दु- रकारहकारसामरस्यरूपः कामाख्यः। तदुक्तं कामकलाविलासे— “बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः। कामः कमनीयतया” (श्लो० ७) इति। विसर्ग७स्तन्निरासरूपो बिन्दुद्वयात्मकः अःकारः षोडशस्वरः। तदुक्तं तत्रैव— इसका भाव यह है कि ब्रह्मा-भारती आदि मिथुनों को समष्टि रूप में अपने में समेटे हुए यह प्रकाशविमर्शस्वरूपिणी परा वाणी ही पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी का भी स्वरूप धारण करती है और यही अपने तुरीय स्वरूप में श्रीविद्या नामक परम मन्त्र के रूप में प्रतिष्ठित है ॥ २० ॥ अकार (प्रकाश) और हकार (विमर्श) के सामरस्यमय स्वरूप वाली यह परा वाणी ही तुरीय मन्त्र के सभी विशेषणों से संयुक्त होने से तुरीय कही गई है। ये दो वर्ण विद्या में कहां हैं ? तथा इस मन्त्र और उक्त वर्णों से बोधित होने वाली परा वाणी का परस्पर क्या संबन्ध है ? इस विषय को अब समझाते हैं— अकार और हकार नामक ये दो अक्षर मध्यबिन्दु और विसर्ग के बीच में स्थित हैं। उस परा वाणी का कुटिल आकार वाली अकुल और कुलकुण्डलिनी में प्रतिबिम्बित स्वरूप ही बिन्दु और कला के नाम से जाना जाता है ॥ २१ ॥ मध्यबिन्दु का अर्थ है ऊर्ध्व बिन्दु, अकार और हकार का समरस स्वरूप काम नाम का बिन्दु। इसका वर्णन कामकलाविलास में इस तरह से किया गया है—“यह बिन्दु अहंकार स्वरूप है। इसका नाम रवि है। इसमें दोनों बिन्दु समरस भाव से रहते हैं। यह समरसभाव सबके लिये कमनीय है, अतः इसे काम भी कहते हैं”। बिन्दुद्वयात्मक विसर्ग १. एव-ख. ने. ज. उ. । २. परा-पश्यन्तो-ते. । ३. मन्त्रपद-ख. ने. ज. उ. । ४ 'तुरीयमन्त्रविशेषणविशेषिता' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ५. चेत्पदमनावश्यकम् । ६. 'परायाः' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. विसर्गश्च बिन्दुन्यासरूपं बिन्दुद्वयं न त्वकारः । तदुक्तं-खं. ग. ने. उ. ।