भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९९ पदार्थान्तरेषु स्पृहा, तस्याः सर्वस्याः स्पृहायाः परिपूरकं नित्यपरिपूर्णतृप्तिलक्षण- परमशिवसामरस्यप्रतिपादनेन । १सर्वसंक्षोभणम् । सर्वस्य क्षित्यादेः शिवान्तस्यो- र्युपरि तत्त्वक्रमेण २संक्षोभः, तस्य संहारलक्षणस्य कारकम्, भेदप्रपञ्चलयरूप- त्वात् । सर्वसौभाग्यदायकम् । सर्वसौभाग्यं सर्वस्पृहणीयता, तस्या दायकम्, सर्वस्पृहणीयपरप्रेमास्पदपरशिवैक्यप्रतिपादनेन । सर्वार्थसाधकम् । सर्वेषां वैदिकानां तान्त्रियाणां ३क्रियाणामर्थः प्रयोजनं परशिवप्राप्तिः, तदुक्तं महाकविभिः— बहुधा ह्यागमैर्भिन्नाः पन्थानः सिद्धिहेतवः । त्वय्येव निपतन्त्योघा जाह्नवीया इवार्णवे ॥ (रघु० १०।२६) इति । तत्साधयति । सर्वरक्षाकरम् । रक्षा नाम प्रतिकूलपदार्थादुपहतिपरिहारः । षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं सर्वमेव प्रतिकूलपदार्थः, तस्मात् सर्वस्माद् रक्षां शिवाहमभाव- भावनालक्षणां करोति । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— मान आशा शब्द का अर्थ है अतृप्त मन का नाना प्रकार के पदार्थों की प्राप्ति के लिये टकटकी लगाये रखना । इस तरह की सभी अभिलाषाओं की पूर्ति यह चक्र कर देता है, क्योंकि यह अपने उपासक को नित्य परिपूर्णतृप्ति से ओतप्रोत परमशिव के साथ एकरस कर देता है । ३. संहार दशा में पृथिवी से शिवपर्यन्त तत्त्वों का एक दूसरे में लय हो जाता है । सब तत्त्वों के संहारात्मक क्षोभ को करने वाला यह सर्वसंक्षोभण चक्र अपने साधक की समस्त भेददृष्टि का विलय कर देता है । ४. सबके द्वारा स्पृहणीय वस्तु को सर्वसौभाग्य कहते हैं। यह सर्वसौभाग्यदायक चक्र सभी के द्वारा अभिलषणीय परम प्रेम के स्थान परम शिव के साथ साधक को एकता प्रदान कर देता है । ५. सभी वैदिक और तान्त्रिक क्रियाकलाप का एक ही प्रयोजन है—परमशिव की प्राप्ति । जैसा कि महाकवि कालिदास ने कहा है— नाना प्रकार के शास्त्रों में पुरुषार्थ के साधक अनेक उपाय बताये गये हैं । किन्तु जैसे सभी नदियों का जल लेकर गंगा अन्ततः समुद्र में मिल जाती है, उसी तरह से इन सब उपायों से व्यक्ति अन्ततः आपके पास ही पहुँचता है ॥ इस प्रयोजन की सिद्धि करने वाला है सर्वार्थसाधक चक्र । (६) सर्वरक्षाकर चक्र सभी प्रकार के प्रतिकूल पदार्थों के सम्पर्क से होने वाले कष्ट से साधक को बचाता है । ३६ तत्त्वात्मक यह सारा जगत् प्रतिकूल पदार्थ है । इन सब में शिवाहंभाव की भावना का प्रसार कर यह चक्र उनके विपरीत प्रभाव से साधक की रक्षा करता है । अर्थात् सभी पदार्थों में शिव विराजमान हैं और मैं भी उस शिव से भिन्न नहीं हूँ, इस प्रकार के ज्ञान का उदय हो जाने पर साधक जगत् में सभी प्रकार के प्रतिकूल पदार्थों से सुरक्षित हो जाता है । परापंचाशिका में बताया गया है— १. सर्वक्षोभकरं-ख. ग. ज. झ. उ. । २. क्षोभस्य सं-ख. ग. ज. झ. । ३. क्रियाणामर्थः-ग. ज. ।

१०० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः अहमि प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः । पराक्रमपरो भुङ्क्ते स्वभावमशिवापहम् ॥ (श्लो० ५०) इति । सर्वरोगहरम् । भेद‌लक्षणं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं सर्वमेव रोगः, तस्य हरम्, अभेदप्रतीतिहेतुत्वात् । अत्रैवोक्तम्- "विकल्परूपरोगाणां हारिणी खेचरी परा" (१।८६) इति । सर्वसिद्धिमयम् । सर्वस्य सिद्धिरुत्पत्तिः स्थितिः संहारश्च, तन्मयम्, त्रिकोणस्य सर्वसृष्टिस्थितिसंहारहेतुत्वात् । तदुक्तं¹ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये- "चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः" (सू० १) इति । सर्वानन्दमयम् । शिवशक्तिलक्षणप्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपत्वात् । अत्र सर्वत्र प्रवृत्तिनिमित्तभेदादद्वैतविश्रान्तिरेव परमार्थः ॥८२-८४॥ पूर्वोक्तवासनाचक्रस्य प्रयोजनमाह— अत्र पूज्या महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी । इदन्तारूपी प्रतियोगी (शत्रु) का अहन्ता में विलय करने के प्रयास में लगा साधक अन्ततः सभी प्रकार के अमंगल का नाश कर देने वाले अपने शिवस्वभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ (७) परस्पर भिन्न ३६ तत्त्व वाला यह सारा संसार ही एक रोग है । सर्वरोगहर चक्र परस्पर की भेद दृष्टि को मिटाकर सबमें अभेद प्रतीति को जगाकर सभी रोगों के निदानभूत इस मूल रोग को ही मिटा देता है । अभी (१।६८) मुद्रा के प्रकरण में भी बताया गया है कि "खेचरी मुद्रा सारे विकल्पात्मक रोगों का नाश करने वाली है।" (८) सर्वसिद्धिमय का अर्थ है सारे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाला । त्रिकोण चक्र ही सबकी सृष्टि आदि का कारण है । प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है कि "चिति शक्ति ही विश्व की सिद्धि में कारण है"। (९) शिव और शक्ति की, प्रकाश और विमर्श की समरसभाव से स्थिति सर्वानन्दमय चक्र में रहती है । इस तरह से यह चक्र सभी प्रकार के आनन्दों से ओतप्रोत है । ऊपर सभी नौ चक्रों के नामों की वासना बताई गई है । इन सबमें शब्दों की भिन्नता भले ही हो, किन्तु सबका वास्तविक अर्थ अद्वय शिवतत्त्व में विश्रान्ति प्राप्त करना ही है ॥८२-८४॥ ऊपर चक्र की जो त्रिविध और नवविध वासना बताई गई है, अब उसका प्रयोजन बताते हैं— इस तरह से त्रिविध और नवविध वासना के द्वारा भावित श्रीचक्र में महा- देवी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा करनी चाहिये ॥८५॥ १. क्तमीश्वरप्रत्यभिज्ञीयम्—ख.। विहार्थं सर्वत्र

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०१ महादेवी। महती देशकालाकारैरनाकलितत्वात्, द्योतनादिति देवी, देवी- पदाभिधेया विमर्शरूपा। अत्र "त्रिधा च नवधा च" (१।७२) इति पूर्वोक्तवासना- चक्रे। महात्रिपुरसुन्दरी। महती अनावरणा चिद्रूपिणी, त्रिपुरा १तुर्यरूपत्वात्, सुन्दरी स्वस्वात्मतया २सर्वस्य स्पृहणीयत्वात्। एवं विद्या स्वसंविद्देवता पूज्या वक्ष्यमाण(३।२-४)परादित्रिविधरूपया पूजया भावनीया। त्रैलोक्यमोहनादिनवचक्राणां स्वस्वनामानु३रूपार्थवासनालक्षणफलान्युक्त्वे- दानीं समष्टिचक्रस्य फलमाह— परिपूर्णं महाचक्रमजरामरकारकम् ॥८५॥ परिपूर्णं ४नवचक्रसमष्टिरूपं महायोनि५मध्यमहाबिन्दु६चक्रस्फुरत्प्रकाशविमर्श- सामरस्यरूपपराप्रभापटलमयसर्वानन्दमयं ७सर्वावरणसमग्रं च महाचक्रम्। विश्व- महात्रिपुरसुन्दरी महादेवी इसलिये है कि यह देश, काल और आकार से अनाकलित है, अस्पृष्ट होने से महान् है और प्रकाशमान होने से विमर्शस्वरूपिणी देवी है। "त्रिधा च नवधा च" (१।७२) इत्यादि श्लोकों के द्वारा जिस चक्र की त्रिधा और नवधा भावना विधि का वर्णन किया गया है, उसी चक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा करनी चाहिये। यह देवी निरावरण चित्स्वरूपिणी है, इसका चित्स्वरूप सदा प्रकाशमान है, इसको कोई आवृत नहीं कर सकता, इसलिये यह महान् है। यह तुरीयस्वरूप वाली है, अतः त्रिपुरा है, तीन-तीन संख्या वाली सभी वस्तुओं को पैदा करने वाली होने से उनसे पहले विद्यमान है। यह सुन्दरी इसलिये है कि अपनी आत्मा के समान इसका स्वरूप सबको स्पृहणीय है, सभी साधक इस स्वरूप को प्राप्त करना चाहते हैं। इन विशेषणों वाली अपनी ही संवित्ति (ज्ञान) में भासित हो रही इस देवता की आगे (३।२-४) बताई गई परा, अपरा, परापरा नामक पूजा के त्रिविध प्रकारों से उपासना करनी चाहिये। त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों का अपने नाम के अनुरूप अर्थ बताने से उनकी भावना का फल भी बता दिया गया है। अब समष्टि (सम्पूर्ण) चक्र की भावना का फल बताते हैं— नवचक्रसमष्टिस्वरूप इस परिपूर्ण चक्र की भावना करने से साधक अजर और अमर हो जाता है ॥८५॥ परिपूर्ण महाचक्र का अर्थ है नवचक्रसमष्टि स्वरूप महायोनि (मध्यत्रिकोण) के मध्य में विराजमान बिन्दुचक्र। इसी सर्वानन्दमय चक्र में विराजमान प्रकाश और विमर्श १. तुरीय-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. सर्वस्पृह-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ३. रूप- लक्षणफला-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ४. 'नवचक्रसमष्टिरूपं' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ५. 'मध्य' नास्ति-ख. ने.। ६. 'चक्र' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. 'सर्वा- वरणसमग्रं च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.।

१०२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः मयविश्वोत्तीर्णपरामयत्वाद् अजरामरकारकम् । अजरः कालत्रयातीतत्वात्, ^१अत एवामर उत्पत्तिविनाशरहितत्वात्, अजरामरः ^२परमशिवः । ^३कारकं स्वपूज- कस्य ^४कालत्रयातीतोत्पत्तिविनाशरहितनित्यपरशिवत्वप्राप्तिलक्षणं मोक्षं करोती- त्यर्थः ॥८५॥ चक्रसंकेतमुपसंहरति— एवमेष महाचक्रसंकेतः परमेश्वरि । कथितस्त्रिपुरादेव्या जीवन्मुक्तिप्रवर्तकैः^५ ॥८६॥ एवम् उक्तप्रकारेण । त्रिपुरादेव्याः पूर्वोक्त(१।६)लक्षणायाः । महाचक्रसंकेतः षट्-त्रिंशत्तत्त्वचक्ररूपत्वान्महाचक्रम्। जीवतो मुक्तिः जीवन्मुक्तिः । मुक्तिर्हि बन्धना- ^६दुद्धन्धनं घृणादिपाशाष्टकेन । ^७कोऽर्थः ? परशिवादित्वगुरुपरदेवताधिगतपर- के सामरस्य स्वरूप के परम तेजोमय प्रभापटल से अन्य सभी चक्रों और आवरण- देवताओं का प्रकाश चारों तरफ़ फैलता है। इस तरह से यह महाचक्र मूलदेवता और आवरण देवताओं के प्रकाश से परिपूर्ण हो जाता है। विश्वमय और विश्वोत्तीर्ण दोनों स्वरूपों से संयुक्त होने से यह पराशक्तिमय चक्र अजरता और अमरता को प्रदान करने वाला है। तीनों कालों से अतीत होने से अजर और उत्पत्ति तथा विनाश से रहित होने से अमर वस्तुतः परम शिव ही है। यह चक्र अपनी पूजा करने वाले साधक को तीनों कालों से अतीत और उत्पत्ति-विनाश से रहित नित्य परमशिव पद (मोक्ष) को प्राप्त करा देता है ॥८५॥ अब चक्रसंकेत प्रकरण का उपसंहार करते हैं— हे परमेश्वरि ! इस तरह से मैंने तुमको जीवन्मुक्ति प्रदान करने वाले इस चक्रसंकेत प्रकरण का उपदेश किया है ॥८६॥ ऊपर बताई गई विधि से पूर्वोक्त लक्षण वाली त्रिपुरा देवी का यह महाचक्रसंकेत साधक को इसी जीवन में मुक्ति प्रदान कर देता है। श्रीचक्र को महाचक्र यहाँ इसलिये कहा गया है कि यह चक्र ही ३६ तत्त्वों के महाचक्र का स्वरूप धारण करता है। मनुष्य घृणा आदि पूर्व वर्णित (१।७२) आठ पाशों से बँधा रहता है। यह महाचक्र साधक को इन बन्धनों से छुड़ा देता है। इसका अभिप्राय यह है कि परम शिव से लेकर १. अमरः, अत एवोत्पत्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'परम' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. 'कारकं' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. कालातीतनित्यपरशिवप्राप्ति- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. प्रदायकः-क. उ. । ६. नादामोचनं-उ. । ७. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०३ सार्थश्चक्रसंकेतकः स्वपरामर्शकस्य हठादेव सकलपाशविनाशनेन शिवाहमभाव- भावनां प्रवर्तयतीत्यर्थः ॥८६॥ इति श्रीपरमयोगीन्द्रपरमहंसपुण्यानन्दशिष्यपरमहंसामृतानन्द- योगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदयदीपिकायां चक्रसंकेतः प्रथमः ॥ ● अपने गुरु पर्यन्त चली आ रही परदेवतामय गुरुपरम्परा से इस चक्रसंकेत प्रकरण का वास्तविक अभिप्राय समझ कर और उस पर अमल कर साधक अनायास ही ऊपर बताए गये पाशों से मुक्त हो जाता है और अपने भीतर इस बात का अनुभव करने लगता है कि मैं तो शिव ही हूँ ॥८६॥ इस तरह से परमयोगीन्द्र परमहंस पुण्यानन्द के शिष्य परमहंस अमृतानन्द योगिप्रवर विरचित योगिनीहृदयदीपिका का यह पहला चक्रसंकेत प्रकरण पूरा हुआ ॥१॥ ●

मन्त्रसंकेतो द्वितीयः १अथ द्वितीयं मन्त्रसंकेतं श्रोतॄजनप्रवृत्तये फलप्रतिपादनपूर्वकं वक्तुं प्रतिजानीते— मन्त्रसंकेतं दिव्यमधुना कथयामि ते । यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत् ॥१॥ दिव्यं प्रकाशविमर्शरूपपरशिवपराशक्तिप्रतिपादनपरत्वात् । मन्त्रसंकेतकम् । मननात् त्रायन्ते साधकमिति मन्त्राश्चिन्मरीचयः । तद्वाचकत्वाद् वैखरीवर्णविलास- भूतानां सौभाग्यविद्यादीनां मननत्राणता । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"मननात् त्राण- धर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः" इति । संकेतकं२ पूर्वोक्त(१।६)लक्षणम् । ३अधुना कथयामीति । प्रकाशात्मकोऽहं ते विमर्शरूपिण्याः कथयामि, हृदयङ्गमतां नयामी- त्यर्थः । यद्वेत्ता यस्य मन्त्रसंकेतस्य४ वेत्ता ज्ञाता । त्रिपुराकारो वेदनसपरि- स्फुरत्परशिवभट्टारकः । वीरचक्रेश्वरो भवेत् । वीराः पूर्वोक्त(१।६५)लक्षणाः, तेषां अब द्वितीय मन्त्रसंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है । श्रोतागण इस ओर प्रवृत्त हों, इसके लिये इसकी फलश्रुति भी यहाँ दी जा रही है— अब मैं दिव्य मन्त्रसंकेत प्रकरण का तुम्हें उपदेश कर रहा हूँ । इसको जानने वाला वीरचक्र का स्वामी त्रिपुरास्वरूप हो जाता है ॥१॥ मन्त्रसंकेत दिव्य इसलिये है कि यहाँ प्रकाश-विमर्श स्वरूप परमशिव और पराशक्ति का प्रतिपादन किया गया है । मन्त्र शब्द का अर्थ है अपना मनन करने वाले साधक की रक्षा करने वाली चिच्छक्ति की किरणें । सौभाग्यविद्या प्रभृति मन्त्रों के वाचक वैखरी वाणी के विलास स्वरूप वर्णों में भी चिच्छक्ति का स्फुरण विद्यमान है । अतः इनमें भी मनन करने वाले का त्राण करने की शक्ति विद्यमान होने से ये मन्त्र कहलाते हैं । संकेत- पद्धति में कहा गया है—"मनन करने से त्राण (रक्षा) करता है, इसलिये इसको मन्त्र कहते हैं" । संकेतक शब्द का अर्थ पहले (१।६) बता दिया गया है । अब मैं मन्त्रसंकेत को कह रहा हूँ, मैं प्रकाशात्मक शिव तुम जैसी विमर्शरूपिणी देवी के हृदय में बैठा रहा हूँ । इस मन्त्रसंकेत का जानकार त्रिपुराकार हो जाता है, उसको सदा अपने परशिव- भट्टारक स्वरूप का भान होने लगता है । वह वीरचक्रेश्वर हो जाता है । वीर का लक्षण पहले (१।६५) बताया जा चुका है, उनका चक्र हुआ समूह । इस समूह का वह स्वामी १. 'अथ' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ. । २. संकेतं-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'अधुना कथयामि' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ. । ४. संकेतस्य-ख. ने. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०५ चक्रं समूहः, तस्येश्वरः परशिवः । कोऽर्थः ? एतन्मन्त्रसंकेतप्रतिपादितश्रीविद्यादि- मन्त्ररहस्यभूतपरभावनाप्रणाशितमायाजालः परशिव एव भवेदित्यर्थः ॥१॥ ^२पूर्वोक्तत्रैलोक्यमोहनादिनवचक्रेश्वरीमन्त्रानेवोपक्रम्य मन्त्रसंकेतमारभते— करशुद्धिकरी त्वाद्या द्वितीया चात्मरक्षिका । आत्मासनगता ^३देवी तृतीया तदनन्तरम् ॥२॥ चक्रासनगता पश्चात् सर्वमन्त्रासनस्थिता । साध्यसिद्धासना षष्ठी मायालक्ष्मोमयी परा ॥३॥ हो जाता है, परशिवभावापन्न हो जाता है। इसका भाव यह है कि इस मन्त्रसंकेत प्रकरण में प्रतिपादित श्रीविद्या नामक मन्त्र के रहस्य को ठीक तरह से जानकर और उसकी उपासना कर साधक परशिव-स्वरूप हो जाता है, क्योंकि इस मन्त्र का मनन करने से उस पर छाया माया का जाल छिन्न-भिन्न हो जाता है ॥१॥ त्रैलोक्यमोहन प्रभृति नौ चक्रों का उल्लेख पहले (१।८२-८४) हो चुका है । इन नौ चक्रों की अधिष्ठात्री देवियों के मन्त्रों के उपक्रम के साथ अब मन्त्रसंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है— ^१करशुद्धिकरी विद्या पहली, आत्मरक्षिका दूसरी और उसके बाद आत्मा- सनगता देवी तीसरी विद्या है। बाद में चक्रासनगता चौथी, सर्वमन्त्रासनस्थिता १. विद्यामन्त्रार्थभूतपरभावनाप्राशस्त्यशाली परशिव-ख. ग. ने. उ. । २. पूर्व- मनन्तरोक्तत्रैलोक्य-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. देवि-च. छ. ज. झ. । १. नित्याषोडशिकार्णव (१।९७-११८) में करशुद्धिकरी से लेकर मूलविद्या पर्यन्त आठ विद्याओं (मन्त्रों) का उद्धार बताया गया है। वहाँ उनका विनियोग साधक की कर- शुद्धि, आत्मरक्षा, स्वात्मासनशुद्धि, चक्रासनशुद्धि, मन्त्रासनशुद्धि, साध्यसिद्धासन(आवरण- देवतासन)शुद्धि तथा मूलदेवी के आवाहन एवं आराधन (पूजन) के लिये किया गया है । इन आठ विद्याओं का वहाँ उद्धार बता दिया गया है, अतः यहाँ (योगिनीहृदय में) केवल एक (सातवीं) विद्या का उद्धार किया गया है और इन नौ विद्याओं का विनियोग नौ चक्रों की अधिष्ठात्री त्रिपुरा प्रभृति नौ नित्याओं के विन्यास के लिये किया गया है। यहाँ यह स्मरणीय है कि नित्या. षो. की व्याख्या अर्थरत्नावली (पृ० १०७) में संकेतपद्धति के वचन के प्रमाण से आठ नित्याओं की ही चर्चा की गई है। नव नित्याओं का उल्लेख नित्या. षो. में कहीं नहीं मिलता। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि संकेतपद्धति की रचनाकार का दृष्टिकोण योगिनीहृदय के प्रभाव से बदल गया

१०६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः मूर्तिविद्या च सा देवी सप्तमी परिकीर्तिता । अष्टम्यावाहिनी विद्या नवमी भैरवी परा ॥४॥ करशुद्धिकरी— आत्मतत्त्वगतयोरशुद्धयोरत्र कर्मकरणात्मनोर्द्वयोः । शुद्धतत्त्वलयभावनामयी शुद्धिरात्मकरयोः परा मता ॥ (चि० ११) इत्यस्मदुक्तरीत्या कर्मेन्द्रियान्तःपातिनोः करयोरशुद्धतत्त्वान्तर्गतयोरशुद्धयोः शुद्धतत्त्वलयभावना शुद्धिः, तत्करीयं विद्या, पराहन्ताप्रतिपादनपरत्वात् । अत्रैव वक्ष्यति—"कर्मेन्द्रियाणां वैमल्यात् करशुद्धिकरी स्मृता" (३।१२५) इति । आद्या त्रैलोक्यमोहनचक्रेश्वरी १विद्येत्यर्थः । नन्वत्र करशुद्ध्यादिमन्त्राणां संख्यामेव करोति, किमिति नोद्धरति ? उच्यते, वामकेश्वरशास्त्र एवासामुद्धारः२, अत्र त्वज्ञातार्थप्रतिपादनपरत्वादस्य शास्त्रस्येति न मन्त्रोद्धारः क्रियत इति । द्वितीया पाँचवीं, साध्यसिद्धासना छठी और मूर्तिविद्या सातवीं है। माया, लक्ष्मी और पराबीज से इसका स्वरूप बनता है। आठवीं विद्या आवाहिनी और परा भैरवी नवीं विद्या है ॥ २-४॥ करशुद्धिकरी विद्या का स्वरूप स्वयं ग्रन्थकार ने अपने चिद्विलास स्तव में इस तरह से बताया है— साधक के अपने दोनों हाथों की गिनती कर्मेन्द्रिय में होती है, जो कि अशुद्ध आत्म- तत्त्व के अन्तर्गत आते हैं। इनकी शुद्ध शिवस्वरूप में लीन होने की भावना ही उत्कृष्ट शुद्धि मानी जाती है ॥ इस तरह से कर्मेन्द्रिय में गिने जाने वाले, अशुद्ध तत्त्व के अन्तर्गत स्थित होने से अशुद्ध हाथों की शुद्ध तत्त्व में लय की भावना को यहाँ शुद्धि कहा गया है । यह कर- शुद्धिकरी विद्या पराहन्ता का प्रतिपादन करके इस शुद्धि का संपादन करती है । आगे (३।१२५) यहीं बताया जायगा कि "कर्मेन्द्रियों की पवित्रता की संपादिनी यह विद्या करशुद्धिकरी नाम से जानी जाती है"। यह पहली विद्या पहले त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी है। यहाँ करशुद्धिकरी आदि विद्याओं की संख्या ही बताई गई है, उद्धार नहीं किया गया । इसका कारण यह है कि इनका उद्धार वामकेश्वर शास्त्र में ही कर दिया गया है । योगिनीहृदय शास्त्र का आरम्भ वामकेश्वर शास्त्र में अज्ञात विषयों के प्रति- पादन के लिये ही हुआ है, अतः पुनः उन विद्याओं के उद्धार की यहाँ आवश्यकता नहीं है । दूसरी विद्या आत्मरक्षिका है । चिद्विलास स्तव में स्वयं ग्रन्थकार ने बताया है— १. 'विद्या' नास्ति क. ख. ग. घ. पु.। २. 'उक्तः' इत्यधिकः ख.।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०७ चात्मरक्षिका। "भेदलक्षणविपक्षसंकटोत्तारणं परमिहात्मरक्षणम्” (चि० ७) इत्यस्मदुक्तरीत्या भेदप्रपञ्चलक्षणप्रतिपक्ष²पराभवरूपसंकटाद् रक्षामभेदप्रतीतिरूपां पराहन्ताप्रतिपाद³नेनात्मनः करोतीत्यात्मरक्षिका द्वितीया सर्वाशापरिपूरकाख्य- द्वितीयचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। आत्मासनगता देवी⁴ तृतीया। "⁵आत्मचक्रमनुदेवता- त्मनामासनं शिवमयतवभासनम्” (चि० ४५) इत्यस्मदुक्तरीत्या साधकचक्रमन्त्र- देवतानां स्वसंविद्रूपतयाऽनुसन्धानलक्षणासनचतुष्टयविद्यानामादिभूताऽऽत्मासन- गता विद्या तृतीया सर्वसंक्षोभकर⁶लक्षणतृतीयचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। ⁷तदनन्तरं चक्रासनगता। तदनन्तरोक्तचक्रासनगता चतुर्थी विद्या सर्वसौभाग्यदायक लक्षण- चतुर्थचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। पश्चात् सर्वमन्त्रासनस्थिता। अनन्तरोक्त⁸वासना- पूर्वोक्त(२।१ )लक्षणमननत्राणलक्षणचिन्मरीचिप्रसरेणाखिलावरणदेवतामन्त्रासन- "भेददृष्टि ही विपक्ष का संकट उपस्थित करती है, शत्रु का काम करती है। उस संकट से उबारना ही सबसे बड़ी आत्मरक्षा है”। इस तरह से भेददृष्टि-प्रधान इस संसाररूपी प्रपंच से, जो कि साधक के सामने पराजय का संकट उपस्थित कर देता है, अभेद प्रतीति रूप अद्वयदृष्टि प्रदान कर पराहन्ता का स्वरूप समझा कर यह विद्या उसकी रक्षा करती है। इसलिये यह दूसरी विद्या आत्मरक्षाकारी कहलाती है और दूसरे सर्वाशापरि- पूरक नामक चक्र की स्वामिनी है। आत्मासनगता देवी तीसरी विद्या है। चिद्विलास स्तव में ही बताया गया है-“आत्मा, चक्र, मनु (मन्त्र) और देवता इनकी आसन के रूप में भावना का अर्थ इनमें शिवमयंता की भावना करना है, अर्थात् ये चारों शिवमयं ही हैं”। इस तरह से साधक, चक्र, मन्त्र और देवता ये सभी आसन के रूप में भगवती संवित् के ही स्वरूप हैं। अतः इन चारों आसनों की विद्याओं में पहली और ऊपर बताए गये क्रम से तीसरी यह आत्मासनगता विद्या सर्वसंक्षोभकर नामक तीसरे चक्र की अधिष्ठात्री है। इसके आगे चक्रासनगता विद्या है। अभी बताये गये चार आसनों में से दूसरे चक्रासन में विराजमान यह चौथी विद्या सर्वसौभाग्यदायक नामक चतुर्थ चक्र की स्वामिनी है। इसके बाद सर्वमन्त्रासनस्थिता विद्या है। अभी मन्त्रासन की भावना चिद्विलास स्तव के प्रमाण से बताई है और पहले (२।१) मनन और त्राण करने वाली मन्त्रशक्ति की किरणों का उल्लेख किया गया है। इन किरणों का फैलाव समस्त १ संकटात्-मु.। २. 'पराभवरूप' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ३. नेन तथा-ने. ज., मेन वा-झ. उ. । ४. देवि-ज. झ. । ५. अष्ट'...'सा विमर्शमनयत् स्वभास-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. 'कर' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ७. अनन्तरं चक्रसंकेतोक्तचक्रासनयुक्ता विद्या-ख. ग. ने. उ. । ८. वासनामननत्राणचिन्म-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ९. प्रसरा-

१०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः स्थिता पञ्चमी विद्या, सर्वार्थ^१साधकाभिधानलक्षणपञ्चमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः । साध्यसिद्धासना षष्ठी । सर्वपीठनिवासिन्यः सर्वगाश्चिन्मरीचयः । भैरव्यो^२ भरिताकारा रक्षन्तु कुलमातरः ॥ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या ^३चिन्मरीचिमयपरिणतावरणदेवताः साध्याः ^४सृष्टिस्थाः सप्तसंख्याकत्रिकोणादिषोडशदलान्तचक्रपदगताश्चतुरस्रत्रयपदगताश्च देवताः सृष्टिक्रमरूपत्वात् साध्याः । तदुक्तमत्रैव—"सृष्टिः ^५स्यान्नवयोन्यादि- पृथ्व्यन्तम्" (१।७७) इति । साध्यास्ता एव संहृतिकाले सिद्धाश्चतुरस्रादिबेन्दवान्त- क्रमेणोपसंहृताः। तदुक्तमत्रैव—"संहृतिः पुनः पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तम्" (१।७७-७८) इति । अत्र सिद्धिः संहारः । तदुक्तं^६ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये—"चितिः स्वतन्त्रा विश्व- सिद्धिहेतुः" (सू० १) इति । एवं सृष्टिसंहारक्रमेणानुसन्धीयमानानां साध्य- आवरण देवताओं के मन्त्रासन तक हैं। इस तरह से यह पाँचवीं विद्या समस्त मन्त्रासनों में विराजमान है और सर्वार्थसाधक नाम के पाँचवें चक्र की अधिष्ठात्री देवी है। साध्य- सिद्धासना छठी विद्या है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति की उक्ति है— सभी पीठों में निवास करने वाली, सर्वत्र विचरण करने वाली, चिति शक्ति की किरणों से अभिव्यक्त परिपूर्ण स्वरूप वाली भैरवियाँ कुलदेवियाँ मेरी रक्षा करें ॥ इस तरह से चिति शक्ति की किरणें ही आवरण देवताओं का स्वरूप धारण कर लेती हैं। इन्हीं को यहाँ 'साध्य' नाम से कहा गया है। सृष्टि क्रम से त्रिकोण, वसुकोण, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, मनुकोण, अष्टदल और षोडश दल इन सात चक्रों में और चतुरस्रत्रय में विद्यमान देवता सृष्टिक्रम का प्रतिनिधित्व करने के कारण साध्य कहे जाते हैं। नवयोनि से पृथ्वी पर्यन्त चक्रक्रम की सृष्टि संज्ञा है, यह बात यहाँ पहले (१।७७) ही बता दी गई है। ये साध्य देवता ही संहार क्रम से चतुरस्र से बैन्दव पर्यन्त चक्र में स्थित होकर 'सिद्ध' कहलाते हैं। पृथ्वी से नवयोनि पर्यन्त चक्र-क्रम की संहार संज्ञा है, यह भी पहले (१।७७-७८) ही बता दिया गया है। यहाँ सिद्धि का अर्थ संहार है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है—"चितिशक्ति स्वतन्त्र रूप से विश्व की सिद्धि (सृष्टि और संहार) करती रहती है"। इस तरह से सृष्टि और संहार के क्रम से जिनका अनु- १. साधनलक्षण-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. रम्यास्ता वाक्पराकारा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. चिन्मरीच्यावरण-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. साधकदशायां सप्तषष्टि- संख्यात्रिको-क. ग. ज. उ. । ५. सृष्टिस्थं-ज. झ. उ. । ६. 'कमीश्वरप्रत्यभिज्ञायाम्' इत्येव ग. विद्वान् सर्वत्र.

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०९ सिद्धानामावरणदेवतानामासने स्थिता विद्या साध्यसिद्धासना षष्ठी, सर्वरक्षाकर- नामधेयषष्ठचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। मायालक्ष्मीमयी परा मूर्तिविद्या च सा देवी१ सप्तमी परिकीर्तितेति। अस्या विद्यायाश्चतुःशतीशास्त्रेऽनुद्धृतत्वादत्रोद्धारः क्रियते। माया २भुवनेश्वरीबीजम्, लक्ष्मीः श्रीबीजम्, तन्मयी तत्प्रचुरा। ३तयो- रूर्ध्वगता परा— चतुर्दशयुतं भद्रे तिथीशान्तसमन्वितम्। तृतीयं ब्रह्म सुश्रोणि हृदयं भैरवात्मनः॥ (श्लो० ९) इति श्रीपरात्रिंशिकोक्त४बीजं परा५, परावाचकत्वात्। तद्बीजत्रयात्मिका [६ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मकत्वाच्च सा विद्या श्रीमहात्रिपुरसुन्दरीमूर्तिकल्पनायां विनियुक्ता] सप्तमी सर्वरोगहराभिधानसप्तमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। अष्टम्यावाहिनी विद्या। सन्धान (भावना) किया जाता है, उन सभी साध्य और सिद्ध देवताओं के आसन पर विराजमान यह छठी विद्या साध्यसिद्धासना कहलाती है। यह सर्वरक्षाकर नामक छठे चक्र की स्वामिनी है। सातवीं मूर्तिविद्या है। माया, लक्ष्मी और परा बीज से इसका उद्धार होता है। चतुःशती शास्त्र में इस विद्या का उद्धार नहीं बताया गया है, अतः यहाँ इसका उद्धार किया गया है। माया भुवनेश्वरी बीज को और लक्ष्मी श्रीबीज को बताते हैं। इस विद्या में इनकी प्रधानता है। इन दोनों के ऊपर परा बीज का उद्धार करने पर इस विद्या का स्वरूप बनता है। परा बीज का उद्धार परात्रिंशिका में बताया गया है— हे भद्रे, हे सुश्रोणि, तृतीय ब्रह्म सकार को चतुर्दश स्वर (औ) से संयुक्त कर और उसके अन्त में तिथीशान्त (विसर्ग) को लगा कर जो बीज बनता है, वह भगवान् भैरव का हृदय है॥ इस तरह में माया, लक्ष्मी और परा बीज को मिलाकर इस विद्या का स्वरूप बनता है। यह विद्या तीन बीजों वाली है तथा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिये इसका उपयोग श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी की मूर्ति की कल्पना में किया जाता है। यह सातवीं विद्या सर्वरोगहर नाम के सातवें चक्र की अधिष्ठात्री है। आठवीं विद्या है आवाहिनी। आवाहन का आन्तर स्वरूप चिद्विलास में वर्णित है— १. देवि—ज. झ.। २. भुवनेशी—क. ख. ने. ज. उ.। ३. तद्द्वयोर्ध्वगता—ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ४. ॠतीत्या—क. ने. उ.। ५. 'परा' नास्ति—ज. झ. उ.। ६. 'मूर्तिविद्या च सा' इत्येव पाठः—ज. ग. ने. ज. झ. उ.।

११० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः आन्तरस्य निजसंविदात्मनो मातुरक्षकरणाध्वना बहिः । मेयसंविदि समर्पणं तदावाहनं समरसत्वलक्षणम् ॥ (चि० २०) इत्यस्मदुक्तरीत्या स्वहृदयकमलकर्णिकामध्ये स्फुरन्त्याः संवित्कलायाः “आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन” (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रान्त- रोक्तपरिपाट्या बहिरर्थप्रसेरणलक्षणावाहिनी विद्या सर्वसिद्धि²प्रदाऽष्टमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः । नवमी भैरवी परा । भैरवी विश्वस्य भरणात् स्थितिहेतुतया, रक्षणात् परचिन्मात्रपर्यवसानलक्षणसंहारकारणतया, वमनात् सृष्टिहेतुतया च ॥२-४॥ ननु भैरवी चतुःशतीशास्त्रे नोक्ता, किमित्यत्र नोद्धृता, सप्तमचक्रेश्वरी विद्या चोद्धृतेत्यत आह— मूलविद्या तथा प्रोक्ता त्रैलोक्यवशकारिणी । निज संवित्ति स्वरूप आन्तर प्रमाता का अन्तःकरण और बहिरिन्द्रियों के माध्यम से प्रमेय पदार्थों के रूप में अपने को समर्पित कर देना ही, उनसे समरसता प्राप्त कर लेना ही आवाहन है । इसका अभिप्राय यह है कि साधक के आवाहन पर संवित्स्वरूपिणी भगवती चक्र, मूर्ति इत्यादि बाह्य प्रमेय पदार्थों में प्रतिष्ठित हो जाती है । इस तरह से अपने हृदयकमल की कर्णिका में स्फुरित हो रही संवित्कला, न्याय- भाष्यकार वात्स्यायन की पद्धति से—“आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय बाह्य विषय से संयुक्त होती है” इस क्रम से बाह्य अर्थों में अपना प्रसार कर लेती है । आठवीं आवाहिनी विद्या के प्रभाव से यह कार्य सम्पन्न होता है। यह विद्या सर्वसिद्धिप्रद नामक आठवें चक्र की स्वामिनी है । आगे की नवीं विद्या भैरवी है । विश्व का भरण, रक्षण और वमन करने से यह भैरवी कहलाती है । यह देवी स्थितिकाल में विश्व का भरण करती है, संहारकाल में अपने परचित् स्वरूप में विश्राम देकर विश्व की रक्षा करती है और सृष्टिकाल में अपने स्वरूप में से इसको फिर निकाल देती है । इस तरह से भरण, रक्षण और वमन क्रियाओं के प्रथम अक्षरों को ग्रहण कर भैरवी का स्वरूप बनता है ॥२-४॥ प्रश्न उठता है कि यह नवीं भैरवी विद्या भी चतुःशती शास्त्र में उपदिष्ट नहीं है, तब इसका उद्धार यहाँ क्यों नहीं किया गया । यहाँ तो केवल सप्तम चक्रेश्वरी मूर्तिविद्या का ही उद्धार बताया गया है । इसका समाधान देते हैं— यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या कही गई है, जो सारे त्रैलोक्य को अपने वश में करने वाली है । १. प्रसारलक्षणावाहने विहिताऽष्टमी-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. प्रदाभिधाना- ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १११ मूलं विश्वस्य शिवादेर्भूम्यन्तस्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपं १परं तेजो वेदयतीति मूलविद्या तथा प्रोक्ता भैरवी कथिता नान्या। अस्या- स्तत्रैवोद्धृतत्वान्नात्रोद्धारः। अन्यथा सप्तमचक्रेश्वरीवदत्रोद्धरेत्। वक्ष्यति— “मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि” (२।७) इति। त्रैलोक्यमुक्त (१।८२) लक्षणं वशीकरोति २सर्जने संहारे च स्वायत्तं करोतीति ॥५॥ वक्ष्यमाणपूजासंकेते वक्तुं योग्यमपि न्यासं नवचक्रेश्वरीविद्यानां प्रसङ्गा- न्मण्डूकप्लुतिन्यायेनाह— एवं नवप्रकारास्तु पूजाकाले प्रयत्नतः ॥५॥ एताः क्रमेण न्यस्तव्याः साधकेन कुलेश्वरि । एवमुक्तप्रकारेण। नवप्रकारा एताश्चक्रेश्वरीविद्याः। साधकेन एतद्विद्योपा- सकेन मोक्षमात्मनः साधयितुमिच्छता। कुलेश्वरी। कुलं मेयमानमातृरूपम्। शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों का मूल कारण प्रकाश और विमर्श का सामरस्यमय परम तेज ही है, इस विषय का ज्ञान कराने वाली होने से यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या के नाम से चतुःशती शास्त्र में वर्णित है। यहाँ वर्णित भैरवी मूल- विद्या ही है, कोई दूसरी नहीं। इस मूलविद्या का उद्धार वहाँ कर दिया गया है। यदि ऐसा न होता तो सप्तम चक्रेश्वरी विद्या के समान यहाँ इसका भी उद्धार बताया जाता। आगे (२।७) बताया गया है—“हे परमेश्वरि ! मूलविद्या से व्यापक न्यास करना चाहिये”। यह नवीं भैरवी विद्या ही मूलविद्या है। त्रैलोक्य पद की व्याख्या कर दी गई है (१।८२)। इस त्रैलोक्य को यह मूलविद्या सृष्टि और संहार दोनों अवस्थाओं में अपने ही अधीन रखती है ॥५॥ आगे कहे जाने वाले तृतीय पूजासंकेत के न्यास-प्रकरण में ही न्यास का वर्णन करना उचित था, किन्तु नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का प्रसंग होने से १मण्डूकप्लुति न्याय से उनसे संबद्ध न्यासों का वर्णन यहीं किया जा रहा है— हे कुलेश्वरि ! साधक को चाहिये कि वह पूजा करते समय प्रयत्नपूर्वक क्रम से ऊपर बताई गई नौ प्रकार की विद्याओं का न्यास करे ॥५-६॥ इस तरह से इन नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का यहाँ वर्णन किया गया है। साधक का अर्थ यहाँ मुक्ति की कामना वाला श्रीविद्या का उपासक है। कुलेश्वरि ! यह संबोधन १. ‘परं’ नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. सर्जनसंहारैः स्वा-ने. झ. उ. । १. मण्डूक-प्लुति न्याय का विवरण हमने विज्ञानभैरव भाषानुवाद, पृ. ३७ की टिप्पणी में दे दिया है। यहाँ विशेषता यह है कि यह मण्डूक-प्लुति आगे की ओर न बढ़कर उलटी हुई है, अर्थात् तृतीय संकेत में वर्णित न्यास प्रकरण का कुछ अंश प्रसंगवश यहाँ आ गया है।

११२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्—"मेयै¹मातृमितिलक्षणं कुलं प्रान्ततो व्रजति यत्र विश्रमम्" (श्लो० ७२) इति । तस्य सर्जने संहारे च ईश्वरि । अत्र श्रुतिः—"यथो- र्णनाभिः सृजते गृह्णते च" (मु० उ० १।१।७) इति । आज्ञावतारेऽप्युक्तम्— "स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इति । पूजाकाले वक्ष्यमाणसंकेतोक्त- सपर्यासमये२ । प्रयत्नतः "प्रयत्न³स्तदवाप्तौ तु व्यापारोऽतित्वरान्वितः" (द० रू० १।२०) इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या ⁴श्रद्धावेशितया क्रमेण न्यस्तव्याः ॥५-६॥ तत्स्थानान्याह— पादाग्रजङ्घाजानूरुगुदलिङ्गाग्रकेषु च ॥६॥ स्पष्टम्५ ॥६॥ आधारे विन्यसेन्मूर्तिं तस्यामावाहिनीं न्यसेत् । मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि ॥७॥ पद है । कुल का अर्थ है मेय, मान और माता का समूह । चिद्गगनचन्द्रिका में बताया गया है—"यह मेय, मान और मिति लक्षण वाला कुल इस भगवती के एक अंश में विश्राम प्राप्त करता है"। इस कुल की सृष्टि और संहार में समर्थ भगवती यहाँ कुलेश्वरी कही गई है । यहाँ मुण्डक श्रुति का प्रमाण दिया गया है कि जैसे मकड़ी जाला बनाती है और उसको निगल लेती है, उसी तरह से यह भगवती सृष्टि और संहार व्यापार में स्वतन्त्र है । आज्ञावतार में भी कहा गया है—"अपनी इच्छा से ही यह सारे जगत् को निगलती और उगलती रहती है" । "अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिये आतुरतापूर्ण व्यापार ही प्रयत्न है" दशरूपक के इस कथन के अनुसार साधक को चाहिये कि वह पूरी श्रद्धा के साथ आगे पूजासंकेत प्रकरण में बताई जाने वाली विधि से पूजा करते समय प्रयत्नपूर्वक क्रमशः इन विद्याओं का न्यास करे ॥५-६॥ न्यास के स्थानों का वर्णन आगे किया जा रहा है— पादाग्र, जंघा, जानु, ऊरु, गुदा और लिंगाग्र—इन छः स्थानों में क्रमशः प्रथम छः विद्याओं का न्यास करे ॥६॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥६॥ आधार में मूर्तिविद्या का और इस मूर्तिविद्या में आवाहिनी विद्या का विन्यास करे । हे परमेश्वरि ! मूलविद्या से व्यापक न्यास करना चाहिये ॥७॥ १. मान-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. संकेते । क्रमः पर्यायक्रमः-ख. ग. ने. झ. उ. । ३. स्तु तदप्राप्तौ-म. । ४. श्रद्धा-झ. । ५. नास्ति-ने. ज. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११३ आधारे विन्यसेन्मूर्तिम् । पादाग्रादीनां बाह्यत्वेन प्रसिद्धत्वात् पृथक्करण- माधारमूर्त्योरान्तरत्वद्योतनार्थम् । आधारे पूर्वोक्ते (१।२५) चतुर्दले ²कमले । मूर्ति मूर्तिविद्यां ³सप्तमीं न्यसेत्⁴ । तस्यां मूर्तावेवावाहिनीं न्यसेत् । मूलेन व्यापकन्यासः कर्तव्यः परमेश्वरि । मूलेन नवमचक्रेश्वरीविद्यया, सौभाग्यविद्ययेति यावत् । स्पष्टमन्यत् ।।७।। नवचक्रेश्वरीविद्यानां न्यासमुक्त्वा तदाधार⁵भूतनवचक्राणामपि⁶ चिन्ता- लक्षणमान्तरन्यासमाह— अकुलादिषु पूर्वोक्तस्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरीसमायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥८॥ अकुलादिषु “अकुले विषुसंज्ञे च” (१।२५) इत्यत्र पूर्वोक्तस्थानेषु । आदिशब्दे- नाष्टौ वह्नि-शाक्त-नाभि-अनाहत-विशुद्ध-लम्बिकाग्रभ्रुवोरन्तर-इन्दवो⁷ गृह्यन्ते । पादाग्र आदि छः पूर्वोक्त स्थान बाह्य अंग के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस श्लोक में आधार और मूर्ति का वर्णन किया गया है। इन दो स्थानों का यहाँ अलग से वर्णन इनकी आन्तरता का द्योतक है। आधार का अर्थ है पूर्व वर्णित (१।२५) मूलाधारस्थानीय चतुर्दल कमल। इसमें सप्तमी मूर्तिविद्या का विन्यास करना चाहिये। इस मूर्तिविद्या में आठवीं आवाहिनी विद्या का विन्यास करे। हे परमेश्वरि ! मूलविद्या, अर्थात् नवम चक्र- श्वरी विद्या, सौभाग्यविद्या से व्यापक न्यास सम्पन्न करना चाहिये। बाकी शब्दावली का अर्थ स्पष्ट है ॥७॥ नौ चक्रेश्वरी विद्याओं के न्यास के बाद अब इन विद्याओं के आधारभूत नौ चक्रों के भी भावनात्मक आन्तर न्यास का वर्णन करते हैं— पूर्वोक्त अकुल आदि स्थानों में चक्रेश्वरी सहित पूर्व वर्णित नौ चक्रों की भावना करनी चाहिये ॥८॥ अकुल आदि शब्द से पूर्व वर्णित (१-२५) ¹अकुल, वह्नि, शाक्त, नाभि, अनाहत, विशुद्ध, लम्बिकाग्र, भ्रूमध्य और बिन्दु का ग्रहण किया जाता है। पहले चक्रसंकेत प्रकरण १. पृथग् ग्रहणम्–ज. । २. 'कमले मूर्ति' नास्ति–ख. ज. झ. । ३. 'सप्तमी' नास्ति– ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. न्यसेत् स्मरेत्–ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. 'भूत' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'अपि' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ७. बिन्दवो–क. ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. पृ० ३६-३७ की टिप्पणी का अवलोकन कीजिये। यहाँ व्याख्याकार ने नौ संख्या पूरी करने के लिये बिन्दु का अलग से ग्रहण किया है। यह उचित नहीं लगता। वस्तुतः अकुल के बाद विषु स्थान का ग्रहण होना चाहिये। भास्करराय ने ऐसा ही किया है। तब भ्रूमध्य के अतिरिक्त ललाटस्थ बिन्दुस्थान की आधार के रूप में कल्पना नहीं करनी पड़ेगी। ८

११४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः पुरोदितं चक्रसंकेतोदितं नवचक्रं चक्रेश्वरोसमायुक्तं नवचक्रेश्वर्य्यधिष्ठितं परि- चिन्तयेत् । १कोऽर्थः ? अकुले सुषुम्ना २मूलारुणसहस्रदलकमले त्रिपुराधिष्ठितं त्रैलोक्यमोहनचक्रम्, वह्नावाधारे चतुर्दलकमले ३त्रिपुरेश्यधिष्ठितं सर्वाशापरि- पूरणं चक्रम्, शाक्ते स्वाधिष्ठानस्थितषड्दलकमले त्रिपुरसुन्दर्य्यधिष्ठितं सर्वसंक्षो४- भणं चक्रम्, नाभौ दशदलकमले त्रिपुरवासिन्यधिष्ठितं सर्वसौभाग्यदायक५- चक्रम्, अनाहते हृदि द्वादशदलकमले त्रिपुराश्रीसमधिष्ठितं सर्वार्थसाधकं चक्रम्, विशुद्धे षोडशदलकमले त्रिपुरमालिन्यधिष्ठितं सर्वरक्षाकरं चक्रम्, लम्बिकाग्रे ६तालुमूलेऽष्टदलकमले त्रिपुरासिद्धयधिष्ठितं सर्वरोगहरं चक्रम्, भ्रुवोरन्तरे द्विदल- कमले त्रिपुराम्बिकाधिष्ठितं सर्वसिद्धिप्रदं चक्रम्, इन्दौ ललाटे बिन्दौ महा- त्रिपुरसुन्दर्यधिष्ठतं सर्वानन्दमयं७ चक्रं भावयेदित्यर्थः ॥८॥ पूर्वोक्तविद्यानां नवचक्रेश्वरीणां नामान्याह— तासां नामानि वक्ष्यामि यथानुक्रमयोगतः । तत्राद्या त्रिपुरा देवी द्वितीया त्रिपुरेश्वरी ॥९॥ में वर्णित नौ चक्रों की, जो अभी हाल में वर्णित नौ चक्रेश्वरियों से अधिष्ठित हैं, इन नौ स्थानों में भावना करनी चाहिये । इसका अभिप्राय यह है—अकुल, अर्थात् सुषुम्ना के मूल में स्थित लाल वर्ण के सहस्रदल कमल में चक्रेश्वरी त्रिपुरा से अधिष्ठित त्रैलोक्यमोहन चक्र की, वह्नि अर्थात् चतुर्दल आधार कमल में त्रिपुरेशी से अधिष्ठित सर्वाशापरिपूरक चक्र की, शाक्त अर्थात् स्वाधिष्ठान में स्थित छः दल वाले कमल में त्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वसंक्षोभण चक्र की, नाभि स्थित दश दल वाले कमल में त्रिपुरवासिनी से अधिष्ठित सर्वसौभाग्यदायक चक्र को, अनाहत अर्थात् हृदय स्थित- द्वादशदल कमल में त्रिपुराश्री से अधिष्ठित सर्वार्थसाधक चक्र की, विशुद्ध नामक षोडश दल कमल में त्रिपुरमालिनी से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर चक्र की, लम्बिकाग्र अर्थात् तालु के मूल में स्थित अष्टदल कमल में त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित सर्वरोगहर चक्र की, भ्रूमध्य स्थित द्विदल कमल में त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रद चक्र को और इन्दु अर्थात् ललाट स्थित बिन्दु में चक्रेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी देवी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय चक्र की भावना करनी चाहिये ॥८॥ पूर्वोक्त नौ चक्रेश्वरी विद्याओं के नाम ये हैं— अब मैं यथोचित आनुपूर्वी से इनके नाम बताऊँगा । इनमें पहली त्रिपुरा १. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. मूलभागेऽरुण-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. त्रिपुरेश्वरीयुक्तं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. क्षोभकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. दायकं-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'तालुमूले' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. श्लोकार्थो नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११५ तृतीया च तथा प्रोक्ता देवी त्रिपुरसुन्दरी । चतुर्थी च महादेवि¹ देवी त्रिपुरवासिनी ॥१०॥ पञ्चमी त्रिपुराश्रीः स्यात् षष्ठी त्रिपुरमालिनी । सप्तमी त्रिपुरासिद्धिराष्टमी² त्रिपुराम्बिका ॥११॥ नवमी तु महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी । स्पष्टम् ॥९-१२॥ नन्वेताश्च विद्या नवचक्रेश्वर्यः पादाग्रादिष्वकुलादिस्थानेषु च भावनारूपेण क्रमेण न्यस्तव्या एव किम्³ ? नेत्याह— पूजयेच्च क्रमादेता नवचक्रे पुरोदिते ॥१२॥ एताः पुरोदितास्त्रिपुराद्या विद्या नवचक्रेश्वर्यः। पुरोदिते "त्रैलोक्यमोहनं चक्रम्" (१।८२-८४) इत्यादिपूर्वोक्ते । नवचक्रे इत्येकवचनमन्योन्याविश्लेषकथनार्थम् । अकुलादिनवस्थानेष्वन्योन्यसंयुक्ततयैव विभावितेषु नवचक्रेष्वित्यर्थः । क्रमात् पूजयेच्च त्रैलोक्यमोहनं चक्रमारभ्य प्रतिचक्रमेकैकां क्रमेण⁴ पूजयेदित्यर्थः ॥१२॥ देवी है। दूसरी त्रिपुरेश्वरी और तीसरी का नाम त्रिपुरसुन्दरी कहा गया है। हे महादेवि ! चौथी देवी त्रिपुरवासिनी, पांचवीं त्रिपुराश्री, छठी त्रिपुरमालिनी, सातवीं त्रिपुरासिद्धि, आठवीं त्रिपुराम्बिका और नवीं महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी है ॥९-१२॥ इन श्लोकों का अर्थ स्पष्ट है ॥९-१२॥ अब प्रश्न उठता है कि क्या इन नौ चक्रेश्वरी विद्याओं की पादाग्र आदि बाह्य और अकुल आदि आन्तर स्थानों में केवल न्यास और भावना ही क्रम से की जाती है ? इस प्रश्न का समाधान यह है— पूर्वोक्त नौ चक्रों में न्यास और भावना के साथ ही इन चक्रेश्वरियों की पूजा भी करनी चाहिये ॥१२॥ अभी त्रिपुरा आदि नौ चक्रेश्वरी विद्याओं का वर्णन किया गया है। पहले (१।८२- ८४) बताये गये नौ चक्रों में इनकी पूजा करनी चाहिये। नवचक्र पद में एकवचन इस अभिप्राय को प्रकट करता है कि ये चक्र नौ होते हुए भी एक ही हैं, एक दूसरे से मिले हुए हैं, इनको एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। अकुल आदि स्थानों में इनके परस्पर मिले हुए स्वरूप की भावना की जाती है। इस तरह से अकुल आदि स्थानों में १. देवी—क. ख. ग. ज. । २. सिद्धा ष्टष्टमी—क. उ. । ३. 'किम्' नास्ति—ख. ग. घ. ज. । ४. 'क्रमेण' नास्ति—ख. घ. ते. ज. ।

११६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु किमासां नवधात्वं स्वाभाविकम् ? नेत्याह- एवं नवप्रकाराद्या पूजाकाले तु पार्वति । एकाकारा ह्याद्यशक्तिरजरामरकारिणी ॥१३॥ आद्या शिवादिक्षित्यन्तस्य जगतो निदानत्वात् । आद्या शक्तिराद्यशक्तिः । आद्यस्य सकलवर्णादिभूतस्य प्रकाशात्मनः परशिवस्य शक्तिर्विमर्शरूपिणी । एका- कारा परापूजाकाले तेन निरन्तरं सामरस्यमापन्ना । अपरापूजाकाले तु तथा न भवति । एवमुक्तप्रकारेण । नवप्रकारा नवविधा भिन्ना । एवंविधपूजकस्य अज- रामरकारिणी । अजमरामर उक्तलक्षणः (१।८५) शिवः, तत्त्वमस्य करोति । अत्रैव वक्ष्यति- "तव नित्योदिता पूजा त्रिभिर्भेदैर्व्यवस्थिता" (३।२) इति ॥१३॥ प्रासङ्गिकमुपसंहृत्य प्रकृतमेव प्रधानं मन्त्रसंकेतमुद्दिशति- मन्त्रसंकेतकतस्तस्या नानाकारो व्यवस्थितः । नानामन्त्रक्रमेणैव पारम्पर्येण लभ्यते ॥१४॥ परस्पर संयुक्त रूप से विभावित इन नौ चक्रों में, त्रैलोक्यमोहन चक्र से लेकर सर्वानन्दमय पर्यन्त चक्रों में, क्रमशः एक-एक देवी का पूजन भी करे ॥१२॥ क्या चक्रेश्वरों के ये नौ भेद स्वाभाविक हैं? नहीं- हे पार्वति ! यह आद्या शक्ति पूजा के समय ही ये नौ रूप धारण करती है। वस्तुतः यह शक्ति एक ही है और यही साधक को अजरामर शिव स्वरूप बना देती है ॥१३॥ शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त जगत् का मूलकारण होने से यह शक्ति आद्या कहलाती है। जो आद्या है और शक्ति भी है, वह है आद्यशक्ति। यह आद्यशक्ति सकल मातृका वर्णों में प्रथम आने वाले अनुत्तर अकार स्वरूप प्रकाशात्मक परशिव के साथ विमर्शरुपि हकार के रूप में मिली रहती है, साधक जब परा पूजा में निरत रहता है, तो यह शक्ति शिव के साथ निरन्तर यामलभाव में विद्यमान रहती है। किन्तु अपरा पूजा में उसकी यह स्थिति नहीं रहती। उस समय तो यह ऊपर बताए नौ स्वरूप धारण कर लेती है। इस तरह की पूजा करने वाले साधक को यह शक्ति अजरामर बना देती है। अजरामर शब्द की व्याख्या हम पहले (१।८५) कर चुके हैं। तदनुसार परमशिव ही अजरामर हैं। जो साधक ऊपर बताई गई परा और अपरा पूजा का अनुष्ठान करता है, उसको यह देवी अजरामर शिवस्वरूप बना देती है। पूजा के इन प्रकारों का वर्णन आगे (३-२) किया जायेगा ॥१३॥ प्रसंगवश आई इन बातों का उपसंहार कर अब प्रस्तुत प्रधान विषय मन्त्रसंकेत का विवरण उपस्थित करते हैं- उस परा भगवती का मन्त्रसंकेत अनेक रूपों में विभक्त है। अनेक मन्त्रों के क्रम से इसका ज्ञान गुरुपरम्परा से ही प्राप्त हो सकता है ॥१४॥

[ द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ११७ तस्याः परशिवसामरस्यरूपायाः पराया यो मन्त्रः सौभाग्यविद्यारूपः, तस्य संकेतो गूढार्थप्रदर्शनम्। नानाकारः अनन्तरवक्ष्यमाणषड्विधरूपः। नानामन्त्र- क्रमेणैव अनन्तरपूर्वोक्तकरशुद्ध्यादिनानाप्रपञ्चपरिपाट्यैव। पारम्पर्येण लभ्यते सोपानावरोहरीत्या शिवादिस्वगुरुपर्यन्तपरम्परोपदेशकमेण लभ्यते, नान्यथा। पारम्पर्यविहीनानामसम्प्रदायवतां चुम्बकवृत्त्या चौर्याविगताक्षरपाठमात्रपर्यवसि- तानामनर्थायैव केवलमित्यर्थः। अत्रैव वक्ष्यति— पारम्पर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः। तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥ (२।८१) इति ॥१४॥ उद्दिष्टस्य मन्त्रसंकेतस्य विभागं प्रतिजानीते— षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे। परशिव के साथ समरसभाव में स्थित उस परा भगवती के सौभाग्यविद्या के नाम से प्रसिद्ध मन्त्र का संकेत (स्वरूप) अत्यन्त निगूढ, रहस्यमय अर्थों से भरा हुआ है। इनके छः प्रकारों का वर्णन अभी आगे किया जायेगा। इन अर्थों का ज्ञान अभी बताए गये करशुद्धिविद्या प्रभृति मन्त्रों की क्रमशः गुरुपरम्परा से प्राप्त विधि से उपासना करने पर ही हो सकता है। जैसे हम सीढियों की सहायता से प्रासाद से नीचे उतरते हैं, उसी तरह से शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आई परम्परा से ही ज्ञान हमारे पास पहुँचता है। ज्ञान प्राप्ति का इसके सिवाय दूसरा कोई मार्ग नहीं है। जो व्यक्ति इस गुरुपरम्परा से ज्ञान प्राप्त नहीं करते, जिनका कोई सम्प्रदाय नहीं है और जो चुम्बक वृत्ति से, चोरी से कुछ अक्षरों का ज्ञान प्राप्त करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, ऐसे व्यक्ति को इनसे कोई लाभ नहीं मिलता, उलटे ऐसा करने वाले को इससे हानि ही उठानी पड़ती है। यहीं आगे (२।८१) बताया जायेगा— जिनको परम्परा से कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है और जो अपने स्वयंभू ज्ञान पर गर्व कर पारम्परिक ज्ञान को प्राप्त करना भी नहीं चाहते, समय (साम्प्रदायिक परम्परा) का लोप करने वाले, शास्त्रीय मर्यादा का उल्लंघन करने वाले ऐसे व्यक्तियों को डाकिनी प्रभृति देवियां विद्रूप बना देती हैं ॥१४॥ नाम मात्र से उपदिष्ट मन्त्रसंकेत का अब विभाग बताते हैं— हे अनघे देवेशि! वह मन्त्रसंकेत छः प्रकार का है। उसे मैं तुम्हें कह रहा हूँ ॥१५॥

११८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः षड्विधः अनन्तरवक्ष्यमाणभावार्थादिप्रकारेण षड्विधः । अनघे परशिष्य- त्वादिदोषरहिते । तेव१ मदंशभूताया विमर्शशक्तेः । प्रकाशात्मकोऽहं तं२ तु षड्विधं कथयामि ॥ तद्विभागमाह— भावार्थः सम्प्रदायर्थो निगर्भार्थश्च कौलिकः ॥१५॥ तथा सर्वरहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च । वक्ष्यमाणलक्षणत्वात् स्पष्टोऽर्थः ॥१५-१६॥ ३षोढा प्रकारेण लक्षणानि कथयिष्यन्नादौ भावार्थमाह— अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ॥१६॥ न क्षरन्तीत्यक्षराणि नित्यपरशिववाचकत्वात् । किञ्च, ताल्वोष्ठव्यापारोऽ- भिव्यञ्जकस्तेषाम् । अत एवाक्षराण्याक्षराणि । तेषामर्थोऽभिधेयः । श्रीसौभाग्य- विद्याऽवयवपञ्चदशाक्षराणामर्थो भावार्थः ॥१६॥ इसके भावार्थ आदि छः भेदों का वर्णन अभी आगे किया जा रहा है । 'अनघे' यह संबोधनात्मक विशेषण देवी में परशिष्यत्व आदि दोषों के अभाव का सूचक है । मैं प्रकाशात्मक शिव मेरी ही अंशभूत विमर्श शक्ति का नाम धारण करने वाली तुमको उन छः भेदों का वर्णन कर रहा हूँ ॥१५॥ उसी विभाग को अब बताते हैं— भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ और कौलिकार्थ, सर्वरहस्यार्थ तथा महा- तत्त्वार्थ ये ही छः भेद हैं ॥१५-१६॥ इन सबके लक्षण आगे बताये जायंगे, श्लोक का अर्थ स्पष्ट ही है ॥१५-१६॥ इन छः अर्थों का लक्षण आगे बताया जा रहा है । इनमें से सबसे पहले १भावार्थ का स्वरूप बताते हैं— हे परमेश्वरि ! केवल मन्त्र के अक्षरों का अर्थ ही यहाँ भावार्थ कहा गया है ॥१६॥ अक्षर नित्य परशिव के वाचक हैं, अतः इनका भी स्वरूप अक्षर, अविनाश्र्वर है । तालु, ओष्ठ आदि के व्यापार से इनकी अभिव्यक्ति मात्र होती है, उत्पत्ति नहीं । इस तरह से ये अक्षर अविश्वर हैं, इनकी उत्पत्ति नहीं होती । इन अक्षरों का जो अर्थ है, श्रीसौभाग्यविद्या नामक मन्त्र के अवयवभूत पन्द्रह अक्षरों का जो अभिधेय है, उसे ही भावार्थ कहते हैं ॥१६॥ १. तेन तव—ख, ने. ज. झ. । २. 'तं तु षड्विधं' नास्ति—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. षोढा दिन्यासक्रमेण—ग. ने. ज. झ. उ. । ४. यहाँ '...' पाठ...