योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७९ सैषेति तच्छब्देन चतुःशतीशास्त्रोक्ता (३।६-७) सर्वविद्राविणी मुद्रा परामृश्यते । स्फुरितविग्रहा संविद्रूपत्वात् । कोऽर्थः ? ज्येष्ठाप्राचुर्याधारत्वात् स्थितिरूपिणी, अत एव ऋजुरूपमध्यमातर्जन्यन्वयोः कनिष्ठिकाऽनामिकयोश्च संयोगरूपिणो, कामा- कर्षिण्यादिरूपत्वात् सर्वानुग्रहकारिणो, तदाधारत्वात् सर्वाशापरिपूरणाख्ये चक्रे संविद्रूपत्वात् स्फुरितविग्रहा चतुःशतोशास्त्रे प्रतिपादिता सैषा सर्वविद्राविणी मुद्रा स्थितेत्यर्थः ॥६०-६१॥ सर्वार्कर्षिणीमुद्रामाह— ज्येष्ठावामासमत्वेन सृष्टेः प्राधान्यमाश्रिता ॥६१॥ आकर्षिणी तु मुद्रेयं सर्वसंक्षोभिणी स्मृता । ज्येष्ठावामासमत्वेन ज्येष्ठावामाशक्तिद्वयसामरस्यरूपत्वात् । सृष्टेः प्राधान्य- माश्रिता । सृष्टिरूपा वामा, स्थितिरूपा ज्येष्ठा । उभयसाम्यात् सृष्टिस्थितिसाधा- रणीयं वामांशेन वक्रतर्जनीमध्यमाद्वयरूपा, ज्येष्ठांशेन ऋजुसंयुक्तानामिकाकनिष्ठा- द्वयरूपेत्यर्थः । अत एव वक्राङ्गुलिद्वयरूपत्वाद् आकर्षिणीयं मुद्रा सर्वसंक्षोभिणि चतुःशतीशास्त्र (३।६-७) में उपदिष्ट सर्वविद्राविणी मुद्रा का ग्रहण होता है, अर्थात् इस मुद्रा का स्वरूप वहाँ बता दिया गया है । संवित्स्वरूपिणी इस मुद्रा का स्वरूप सर्वाशा- परिपूरक चक्र में ही स्फुरित होता है । इसका अभिप्राय यह है कि यह मुद्रा ज्येष्ठा शक्ति पर ही प्रधानतः आधृत होने से स्थितिरूपिणी है । इसीलिये सरल (सीधी) आकृति वाली मध्यमा-तर्जनी और कनिष्ठा-अनामिका के संयोग से यह बनती है । कामा- कर्पिणी प्रभृति शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने से यह सब पर अनुग्रह करने वाली है । सर्वाशापरिपूरक चक्र में विद्यमान शक्तियों की आधारभूत यह शक्ति उसमें संवित् स्वरूप में स्फुरित होती है । चतुःशतीशास्त्र (३।६-७) में इसी का सर्वविद्राविणी के नाम से वर्णन है ॥६०-६१॥ सर्वार्कर्षिणी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— इस आकर्षिणी मुद्रा में ज्येष्ठा और वामा शक्ति की समानता होने पर भी सृष्टि शक्ति वामा को प्रधानता दी जाती है । सर्वसंक्षोभकर चक्र में यह स्थित है ॥६१-६२॥ ज्येष्ठा और वामा शक्तियों के सामरस्य से उत्पन्न होने पर भी यह मुद्रा सृष्टि शक्ति वामा पर प्रधानतः आश्रित है । वामा शक्ति सृष्टि का और ज्येष्ठा शक्ति स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है । इस मुद्रा में दोनों की समान स्थिति है, अर्थात् इस मुद्रा में सृष्टि और स्थिति शक्ति की समान स्थिति होने से वामांश से वक्र (तिरछी) तर्जनी और मध्यमा का और ज्येष्ठांश से सरल (सीधी) अनामिका और कनिष्ठा का संयोग बनता है । इस मुद्रा में दो अंगुलियाँ तिरछी रहती हैं, अतः यह आकर्षिणी कहलाती है और सर्व-
८० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः सर्वसंक्षोभकारिणि चक्रे स्मृता। स्मृतिः पूर्वानुभवसंस्कारजन्यं ज्ञानम्। पूर्वं चतुःशतीशास्त्रे (३।७-८) अनुभूता मुद्रा¹ इदानीं स्मृता, सवासना कथितत्यर्थः ॥६१-६२॥ सर्वविशंकरीमुद्रामह— व्योमद्वयान्तरालस्थबिन्दुरूपा महेश्वरि ॥६२॥ शिवशक्त्याख्यसंश्लेषाद् दिव्यावेशकरी स्मृता । चतुर्दशारचक्रस्था ²संविदानन्दविग्रहा ॥६३॥ आधाराद्याज्ञान्तषट्चक्रान्तरालानि³ पञ्च व्योमानि। तेषां द्वयोर्द्वयोर्मध्ये एकैको बिन्दुरिति पञ्च बिन्दवः पञ्चभूतमयाः। तदुक्तमभियुक्तैः—"पञ्चबिन्दुमयं भेदं पञ्चप्रणव⁴पञ्जरम्" इति। तद्रूपा व्योमद्वयान्तरालस्थबिन्दुरूपा। शिव- संक्षोभकर चक्र में पुनः याद की गई है। पहले चतुःशतीशास्त्र (३।७-८) में वर्णित इस मुद्रा का यहाँ पुनः स्मरण किया गया है, वासना के साथ उसका पुनः वर्णन किया गया है ॥६१-६२॥ सर्वविशंकरी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— हे महेश्वरि ! दो व्योमों के बीच में स्थित बिन्दु के समान इसका स्वरूप है। शिवात्मक और शक्त्यात्मक अंगुलियों के संयोग से यह बनता है। दिव्य आवेश को प्रदान करने वाली संविदानन्दस्वरूपिणी यह मुद्रा चतुर्दशार चक्र में स्थित है ॥६२-६३॥ आधार से लेकर आज्ञा पर्यन्त छः चक्रों के अन्तराल में पाँच व्योम माने गये हैं। इनमें से दो-दो के बीच में एक-एक बिन्दु स्थित है। ये पाँच बिन्दु पाँच महाभूतों के प्रतिनिधि हैं। जैसा कि किसी अभियुक्त ने कहा है—"यह भेदात्मक संसार पाँच बिन्दुओं के प्रतिनिधि पाँच महाभूतों से बना है और इन पाँच महाभूतों से बना देह पाँच¹ प्रणवों १. 'मुद्रा' नास्ति-ख. ने. झ. ड. । २. सच्चिदा-ग. छ. उ. । ३ बिन्दवः पञ्च- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. पङ्कजम्-ख. ग. ज. झ. ब. उ. ।
- स्वच्छन्दतन्त्र के षष्ठ पटल में पाँच प्रणव से युक्त प्राणहंस के उच्चार की विधि बताई गई है। इसका अभिप्राय यह है कि मनुष्य का प्राणरूपी पक्षी पाँच भूतों के बने इसी देहरूपी पिंजड़े में बन्द रहता है। प्रस्तुत मुद्रा की सहायता से साधक अपने पाँच बिन्दुवाले आध्यात्मिक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो सकता है, अपने प्राणहंस को इस पिंजड़े से मुक्त करा सकता है।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८१ शक्त्यात्मसंश्लेषात् । शिवात्मानो दक्षकराङ्गुलयः, शक्त्यात्मानो वामकराङ्गु- लयः । शिवशक्त्यात्मना परिवृत्येतरेतराङ्गुल्यन्तरालप्रवेशितानां सर्वेषामन्योन्य- गाढपरिपीडनादेवंभूता दिव्यावेशकरी मुद्रा दिव्यस्य प्रकाशात्मकशिवस्य, आवेशकरी सामरस्यकरी, चतुर्दशारचक्रस्था चतुर्दशारचक्रे सर्वसौभाग्यदायक- नामधेये स्थिता, ²संविच्छक्तिः, आनन्दविग्रहा परमशिवसामरस्यरूपिणी । कोऽर्थः ? ³उभयकराङ्गुल्यन्तरालगर्तैकैकाङ्गुलिरूपपञ्चबिन्दुमयशवशक्तद्वयसामरस्य - निरूपणलक्षणबन्धनात्मिकेयं मुद्रा संविदैकरस्यानन्दमयो चतुर्दशारचक्रे स्थिते- त्यर्थः ॥६२-६३॥ उन्मादिनीमुद्रामाह— बिन्द्रन्तरालविलसत्सूक्ष्मरूप⁴शिखामयी । ज्येष्ठाशक्तिप्रधाना तु सर्वोन्मादनकारिणी ॥६४॥ का पिंजरा है"। यह मुद्रा भी उक्त आकार वाले पाँच महाभूतों की याद दिलाती है । दाहिने हाथ की अंगुलियाँ शिवात्मक और बायें हाथ की अंगुलियाँ शक्त्यात्मक मानी जाती हैं । शिवात्मक और शक्त्यात्मक इन अंगुलियों को एक-दूसरी अंगुलियों के बीच में फँसा कर सबको पूरी तरह से भींच लेने पर यह आकार बनता है । यह मुद्रा दिव्या- वेशकरी है, अर्थात् शिव के प्रकाशात्मक दिव्य स्वरूप में साधक को समरस कर देती है । सर्वसौभाग्यदायक नाम के चतुर्दशार चक्र में यह स्थित है । यह संवित्स्वरूपिणी मुद्रा शक्ति आनन्दस्वरूपिणी है, परम शिव के साथ साधक को संयुक्त कर देती है । इसका अभिप्राय यह है कि शिवात्मक और शक्त्यात्मक दोनों हाथों की अंगुलियों के बीच में एक-एक अंगुलि को फँसाने से शिव और शक्ति के सामरस्य से समुद्भूत पाँच महाभूतों के प्रतिनिधि के रूप में पंचबिन्दुमयं स्वरूप की जो अभिव्यक्ति होती है, वही इस मुद्रा का स्वरूप है । यह मुद्रा चतुर्दशार चक्र में स्थित है और संवित् के साथ समरसता से उत्पन्न होने वाले आनन्द का अनुभव कराने वाली है ॥६२-६३॥ उन्मादिनी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— दो बिन्दुओं के बीच में से निकली अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप वाली दो दीप- शिखाओं के सदृश आकृति वाली मुद्रा, जिसमें कि ज्येष्ठा शक्ति का स्वरूप प्रधान १. ल्यन्तरालद्वयगर्तैकैकाङ्गुलिरूपान्योन्यगाढपातनादेवंभूता—ख. ग. ज. झ. उ. । २. सच्चिदानन्द—ग. उ. । ३. 'उभय... मुद्रा' इत्यस्य स्थाने—'शिवशक्तिसामरस्यबिन्दुरूप- लक्षणबन्धनात्मिकेयं मुद्रा' इति पाठः—ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । ४. रेखा—क. ग. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
[८२] योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
दशारचक्रमास्थाय संस्थिता वीरवन्दिते । बिन्द्वन्तरालाद् आधारादिब्रह्मरन्ध्रान्तर्गतयोनिमहाबिन्द्वोः स्वयम्भुपराख्ययो- र्लिङ्गयोरन्तरालाद् विलसत्सूक्ष्मरूपेशिखामयी^१ विलसन्त्यौ सूक्ष्मरूपे बिसतन्तु- निभाकृती शिखेव शिखावत् शिखे अम्बिकाशान्तयोस्तन्मयी तदैकरस्यरूपा । ज्येष्ठाशक्तिप्रधाना ज्येष्ठाशक्तिप्रचुरा । सर्वोन्मादनकारिणी । “उन्मादश्चित्त- विभ्रमः” (अ० को० १।७।२६) । सर्वानुन्मत्तवत् ^२सर्वव्यापारपराङ्मुखान् शिव- शक्तिसामरस्याऽनुसन्धानपरान् करोतीत्यर्थः । दशारचक्रमास्थाय दशारचक्रं बहिर्दशारचक्रम् । वीरवन्दिते । इदन्तारिपोरहमि ^३समराङ्गणे प्रलयप्रतिपादन- परा वीराः, तैर्वन्दिते आत्माहम्भावनया भाविते । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— अहमि प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः । पराक्रमपरो भुङ्क्ते स्वभावमशिवापहम् ॥ (श्लो० ५०) इति । है, सबको उन्मत्त कर देनेवाली है। हे वीरवन्दिते ! यह मुद्रा बहिर्दशार चक्र में अधिष्ठित है ॥६४-६५॥ बिन्द्वन्तराल, अर्थात् आधार और ब्रह्मरन्ध्र में स्थित योनि और महाबिन्दु में विद्य- मान स्वयंभू और पर लिंग के बीच में से निकली कमलनाल के सूक्ष्म तन्तुओं के समान आकृति वाली दीपशिखाओं के समान जब अम्बिका और शान्ता शक्ति का स्वरूप समरस हो जाता है और ज्येष्ठा शक्ति का स्वरूप प्रधान हो जाता है, तो इससे निष्पन्न उन्मा- दिनी मुद्रा सबको उन्मत्त बना देती है। चित्त के विभ्रम को उन्माद कहते हैं। यह मुद्रा सबको पागल बना देती है, साधक को सभी लौकिक व्यवहारों से विमुख कर शिव और शक्ति की समरसता की खोज में लगा देती है। दशार चक्र से यहाँ बहिर्दशार का ग्रहण किया जाता है। वीर शब्द का अर्थ है इदन्ता (भेद-दृष्टि) रूपी शत्रु के साथ युद्ध कर उसको अहं (अभेद दृष्टि) में लीन कर देने वाला। भेददृष्टि पर विजय प्राप्त करने वाले वीर भगवती त्रिपुरसुन्दरी की अपनी आत्मा के रूप में भावना करते हैं, अतः वह ‘वीर- वन्दिते’ पद से संबोधित की गई है। उक्त स्थिति का वर्णन ^१परापंचाशिका में भी किया गया है—
१. रेखा-क. ग. । २. स्वस्व-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. रणाङ्गणे-ने. ज. झ. उ. । १. इस ग्रन्थ का प्रकाशन अनुत्तरप्रकाशपञ्चाशिका के नाम से काश्मीर ग्रन्थमाला ग्रन्थ संख्या १२ के ग्रन्थ षट्त्रिंशत्तत्त्वसन्दोह के साथ हुआ है। इस ग्रन्थ का परिष्कृत संस्करण अपेक्षित है। शिवपुराण कैलाशसंहिता (१६।७०-८४) के श्लोकों से भी इस ग्रन्थ के परिष्कार में सहायता ली जा सकती है।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८३ कोऽर्थः ? अन्तः कुलाकुलबिन्दुद्वयान्तरालविलसदम्बिकाशान्ताख्यवह्न्य- मृतकुण्डलिनीरूपशिखाद्वयसदृशा ^१ शक्तिशिवाख्य^२करद्वयमध्यमाऽङ्गुष्ठद्वयसंयोग- बिन्दुद्वयाकारवर्तुलद्वयान्तर्गतकनिष्ठिकाद्वयमयी ज्येष्ठाशक्तिप्रधानत्वाद् ऋज्वाकृत्य- नामातर्जनीद्वयाग्रसंयोगरूपा शिवशक्तिसामरस्यानुसन्धानलक्षणबन्धनरूपा सर्वो- न्मादिन्याख्या मुद्रा बहिर्दशारचक्रमास्थाय स्थितेत्यर्थः ॥६४-६५॥ महाङ्कुशमुद्रामाह— वामाशक्तिप्रधाना तु महाङ्कुशमयी पुनः ॥६५॥ ^३तद्वद् विश्वं वमन्ती सा द्वितीये तु दशारके । संस्थिता मोदनपरा मुद्रारूपत्वमास्थिता ॥६६॥ बिन्द्वन्तरालविलसत्सूक्ष्म^४रूपशिखामयी ऋज्वाकृतितर्जन्यनामिकासंयोगरूपा ^५ज्येष्ठाशक्तिप्रधाना पूर्वं भवति। इदानीं वामाशक्तिप्रधाना, “वामा विश्वस्य
इदन्ता रूपी शत्रु का अहन्ता में विलय करने के प्रयास में लगा साधक सभी प्रकार के अमंगल का नाश कर देने वाले स्व-स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। पूर्वोक्त ग्रन्थ का अभिप्राय यह है—शरीर के भीतर कुल और अकुल नामक दो बिन्दुओं के बीच में अम्बिका और शान्ता नाम की वह्नि और अमृत कुण्डलिनियाँ विराज- मान हैं। इन कुण्डलिनियों से निकली दो सूक्ष्म दीपशिखाओं के समान ही यहाँ शक्ति और शिव नामक दो हाथों की दो मध्यमाओं और दोनों अंगुष्ठों के संयोग से दो बिन्दुओं का आकार बनता है। इन दो वर्तुलां के बीच में दोनों कनिष्ठिकाओं के संयोजन से उन्मा- दिनी मुद्रा का आकार बनता है। इसमें अनामा और तर्जनी अंगुलियाँ सीधी रहती हैं, अतः इसमें ज्येष्ठा शक्ति की प्रधानता रहती है। इस सर्वोन्मादिनी मुद्रा का बन्धन शिव और शक्ति के सामरस्य की खोज के लिये किया जाता है। यह बहिर्दशार चक्र में स्थित है ॥६४-६५॥ महांकुश मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— महांकुश मुद्रा में वामा शक्ति की प्रधानता है। वामा शक्ति के समान ही विश्व की सृष्टि में लगी यह मुद्रा द्वितीय दशार में स्थित है। मोदन व्यापार में प्रवृत्त होकर इसने मुद्रा का रूप धारण किया है ॥६५-६६॥ कुल और अकुल बिन्दुओं के बीच में स्थित वह्नि और अमृत कुण्डलिनियों से निकली दीपशिखाओं के समान आकृतिवाली मुद्रा का ऊपर वर्णन किया गया है। उसमें तर्जनी और अनामिका की आकृति सीधी रहती है, इसीलिये उसमें ज्येष्ठा शक्ति प्रधान मानी
१. 'शिखाद्वयसदृशा' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । २. ख्याद्वय-ने. ज. झ. उ. । ३. अधो-क. ग. ने. छ. ज. झ. उ. । ४. रेखा-क. ख. । ५. वामाशक्तिप्रधाना न भवति किन्तु तर्जन्यनामिकासंयोगरूपा न भवति-क. ने. ज. झ. उ. ।
८४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः वमनादङ्कुशाकारां गता" (१।३७) इति पूर्वोक्तरीत्या वामाशक्तिप्रधानत्वाद् वक्राकारतर्जनीबन्धनरूपा विश्वं वमन्ती², सृष्टिरूपत्वात् । तद्वत् परमशिववत् । द्वितीये तु दशारके अन्तर्दशारे । मोदनपरा परशिवसामरस्यलक्षणपरानुसन्धानमयी, अत एव मुद्रारूपत्वमास्थिता । अयमर्थः—पूर्वोक्तमुद्रालक्षणविमर्शनमयचिच्छक्तिरेव ³वामाशक्तिभूततर्जनीद्वयमयपरशिवसामरस्यपरानन्दप्रवणरूपा महाङ्कुशमुद्रा⁴- ऽन्तर्दशारे स्थितेति ॥६५-६६॥ खेचरीमुद्रामाह— धर्माधर्मस्य संघट्टादुत्थिता विँत्तिरूपिणी । विकल्पोत्थक्रियालोपरूपदोषविघातिनी ॥६७॥ विकल्परूपरोगाणां हारिणी खेचरी परा । सर्वरोगहराख्ये तु चक्रे संविन्मयी स्थिता ॥६८॥ गई है। यही मुद्रा जब वामा शक्ति प्रधान हो जाती है, अर्थात् तर्जनी अंगुलि का आकार तिरछा हो जाता है, तो यह महांकुश मुद्रा कहलाती है। पहले (१।३७) यह बताया जा चुका है कि विश्व का वमन करने के कारण वामा शक्ति अंकुश के जैसा तिरछा आकार ग्रहण कर लेती है। सृष्टि स्वरूप वामा शक्ति की प्रधानता के कारण यह मुद्रा भी परम शिव के समान ही विश्व की सृष्टि में समर्थ है। यह अन्तर्दशार चक्र में स्थित है। परमशिव के सामरस्य स्वरूप के अनुसन्धान में लगी होने से यह जीवों में आनन्द की अभिव्यक्ति करती है और इसीलिये मुद्रा का स्वरूप धारण करती है। इसका अभि- प्राय यह है कि ऊपर बताए गये लक्षण वाली उन्मादिनी नामक विमर्शमय चित्-शक्ति ही जब वामा शक्ति स्वरूप तर्जनीद्वयमय परम शिव के साथ सामरस्य रूपी परमानन्द में लीन हो जाती है, तो अन्तर्दशार चक्र में स्थित महांकुश मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है ॥६५-६६॥ खेचरी मुद्रा का स्वरूप बताते हैं— धर्म (शक्ति) और अधर्म (शिव) के सामरस्य से उत्पन्न, संवित्स्वरूपा, विकल्प (असावधानी) के कारण नित्य, नैमित्तिक आदि कृत्यों के लोप से उत्पन्न दोषों को दूर करने वाली, विकल्पात्मक रोगों का नाश करने वाली खेचरी मुद्रा सर्व- श्रेष्ठ मानी जाती है। संविन्मयी यह मुद्रा सर्वरोगहर नामक चक्र में स्थित है ॥ ६७-६८ ॥ १. मुपाश्रिता—ग ने. उ. । २. वमन्ती स्थिता—ख. ज. झ. । ३. वामाप्राधान्याद् व्यक्तोभतेत्यर्थः । तेनाद्वयपर—ख. ग. ज. झ. उ. । ४. मुद्राख्याऽन्त—क. ख. ग. ज. झ. उ. । ५. वित्ति—ज. उ. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८५ धर्माधर्मस्य संघट्टात् । धर्मः शक्तिः, सृष्ट्यादिसकलधर्मपरत्वात् । अधर्मः शिवः, तत्तत्सकलधर्मरहितत्वात् । तयोः संघट्टः सामरस्यम्, तस्मादुत्थिता । वित्ति१रूपिणी । वित्तिः२ संवित्तिः । विकल्पोत्थक्रियालोपरूपदोषविघातिनी । विकल्पः कोटिद्वयावलम्बनम् एवं वा न वेति संशयज्ञानम्, विकल्पोत्थाः क्रिया नित्यनैमित्तिककाम्यरूपाः, तल्लोपेन ३प्रत्यवायः प्रायो जायते, तस्य विघातिनो । विकल्परूपरोगाणां हारिणी । परिपूर्णभावस्य शिवस्य मयैवमेतत्कर्तव्यं न वेति विकल्परूपा रोगा आधय एव व्याधयः, तदुक्तमभियुक्तैः—“अपूर्णम्मन्यता व्याधिः कार्पण्यैकनिदानभूः । क्लेशावहोऽ४तिकष्टश्च” इति, तेषां हारिणी खेचरी— धर्म शक्ति को कहते हैं, क्योंकि सृष्टि, स्थिति आदि समस्त धर्म उसी से प्रवृत्त होते हैं। अधर्म शिव है, क्योंकि वह सकल धर्मों से अतीत है। इन दोनों के सामरस्य से उठी संवित्ति समस्त प्रत्यवायों का नाश कर देती है। 'यह ऐसा है या नहीं' इस तरह से दो कोटियों का सहारा लेने वाला संशयात्मक ज्ञान यहाँ विकल्प के नाम से कहा गया है। इस संशयात्मक ज्ञान के कारण नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों का लोप होने पर प्रत्यवाय (दोष) लगता है। इस तरह के सारे दोषों (विघ्नों) का नाश इस मुद्रा के प्रदर्शन से हो जाता है। जीव परिपूर्ण रूप से शिव ही है, किन्तु अपने इस स्वरूप का बोध न रहने से मुझे ऐसा करना चाहिये या नहीं, इस तरह के नाना प्रकार के विकल्प (संशय) रूपी रोग उसके तन और मन को घेर लेते हैं। १भट्ट गंगाधर मिश्र ने ठीक ही कहा है— अपने को अपूर्ण मानना सब से बड़ा रोग है। इससे व्यक्ति की स्थिति दयनीय हो जाती है। ऐसे व्यक्ति को नाना प्रकार के क्लेश घेर लेते हैं, जो कि उसको बहुत कष्ट देते हैं॥ खेचरी मुद्रा इन सब विकल्पों को दूर भगा देती है। स्वयं ग्रन्थकार ने २चिद्विलास स्तव में कहा है— १. चिति-ज. उ. । २. चितिः-ज. उ. । ३. पापं जायते-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. जुगुप्सश्च-मु. । १. भट्ट गंगाधर मिश्र और उसके किसी स्तोत्र ग्रन्थ का उल्लेख ऋजुविमर्शिनी (पृ० ६९, ८०, १३४) में हुआ है। इसके दो श्लोक दीपिका में भी अभियुक्त वचन करके उद्धृत हैं। ऋजुविमर्शिनी (पृ० ६९) के प्रमाण पर हमने यहाँ उनका नाम दे दिया है। २. चिद्विलास स्तव का भी अनेक हस्तलेखों तथा मुद्रित प्रति के आधार पर किया गया परिष्कृत संस्करण नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट भाग (पृ० ३२२-३३०) में प्रका- शित हो चुका है। एक हस्तलेख में अमृतानन्द के गुरु पुण्यानन्द को इसका कर्ता माना गया है। परन्तु इस सम्बन्ध में कोई प्रामाणिक बात नहीं कही जा सकती (द्र० पृ० १७)
८६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेत खे निरस्तसकलक्रियाक्रमे या चितिश्चरति शाश्वतोदया२ । सा शिवत्वसमवाप्तिकारिणी खेचरी ३सकलखेदहारिणी ॥ (चि० ३८) इति मदुक्तरीत्या निर्विकल्पबोधभूमिसंचारिणी चितिः चिच्छक्तिः परमशिवसाम- रस्यरूपा तदधिष्ठितत्वात् सर्वरोगहराख्ये चक्रे संविन्मयी स्थिता । कोऽर्थः ? शिव- शक्तिमयदक्षवामबाहुद्वयपरिवर्तनरूपतर्जनीद्वयावलम्बितव्यत्यस्तकरद्वयकनिष्ठाना- मिकाद्वन्द्वतदुपरिस्थितमध्यमाद्वयाग्रसंयुक्ताङ्गुष्ठद्वयाग्रसंयोजनलक्षणबन्धनरूपा शिवशक्तिद्वयसंघट्टादुत्थिता परा निर्विकल्पबोधभूमिसंचारिणी, अत एव विकल्प- जनितनित्यनैमित्तिककाम्यकर्मलोपरूपदोषविघातिनी, अत एव च विकल्परूप- रोगाणामपूर्णम्मन्यतालक्षणानां हारिणी सर्वरोगहराख्ये चक्रे खेचरी मुद्रा स्थितेत्यर्थः ॥६७-६८॥ बीजमुद्रामाह — शिवशक्तिसमाश्लेषस्फुरद्व्योमान्तरे पुनः । प्रकाशयन्ती विश्वं सा सूक्ष्मरूपस्थितं सदा ॥६९॥ कर्मकाण्ड का सारा प्रपंच जहाँ विलीन हो गया है, उस ज्ञानगगन में जो चिति शक्ति सदा प्रकाशमान होकर चलती है, उसी को खेचरी कहते हैं। यह समस्त क्लेशों का नाश करने वाली और शिवत्व की प्राप्ति में सहायता करने वाली है। निर्विकल्प बोधभूमि (ज्ञानगगन) में संचरण करने वाली चिति शक्ति सदा परम शिव के साथ समरस होकर रहती है। अतः परम शिव के द्वारा अधिष्ठित सर्वरोगहर चक्र में भी यह संवित्स्वरूपिणी मुद्रा के रूप में स्थित है। इसका अभिप्राय यह है कि दाहिना और बांया हाथ क्रमशः शिव और शक्ति का प्रतीक है। दाहिने हाथ को बाँई तरफ और बायें हाथ को दाहिनी तरफ करके दोनों तर्जनियों से एक-दूसरे हाथ की कनिष्ठा और अनामिका को पकड़ कर और उसके ऊपर दोनों मध्यमाओं के अग्रभाग से दोनों अंगूठों के अग्रभाग को मिलाने से इस मुद्रा का स्वरूप बंधता है। इस तरह से शिव और शक्ति दोनों के संघट्ट से निर्विकल्प बोधभूमि में संचरण करने वाली यह परम उत्कृष्ट मुद्रा निष्पन्न होती है। इसीलिये यह विकल्पजन्य नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों के लोप से उत्पन्न होने वाले दोषों का नाश कर डालती है और इसीलिये विकल्प ज्ञान से उत्पन्न अपूर्ण- मन्यता आदि रोगों को भी दूर करने वाली है। यह खेचरी मुद्रा सर्वरोगहर नामक चक्र में स्थित है ॥६७-६७॥ बीज मुद्रा का वर्णन करते हैं— शिव और शक्ति के सामरस्य के बीच में स्फुरित हो रहे सूक्ष्म गगन में निखिल भुवन को सूक्ष्म रूप से सदा प्रकाशित करने वाली
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८७ बीजरूपा महामुद्रा सर्वसिद्धिमये स्थिता । शिवशक्त्योः समाश्लेषः सामरस्यं तन्मध्ये स्फुरद्व्योमान्तरे प्रकाशविमर्श२रूप- सूक्ष्मतरगगनान्तराले । सूक्ष्मरूपस्थितं कारणतावन्मात्रतया स्थितम् । विश्वं सदा सर्वदा ३प्रकाशयन्ती, अत एव बीजरूपा महामुद्रा, तस्या ४भाविचराचररूप- विश्वोत्पत्तिहेतुत्वात् । सर्वसिद्धिमये विश्वोत्पत्तिहेतुभूतबीजमुद्राधारत्वात् सर्वस्य शिवादेर्भूभ्यन्तस्य सिद्धिरुत्पत्तिः, तदुक्तं५ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये—"चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः" (सू. १) इति, तन्मये चक्रे स्थिता । कोऽर्थः ? शिवशक्तिसंज्ञितो- भयकरव्यत्यस्तकनिष्ठिकाद्वयाग्रावलम्बनवक्रोभयानामिकोभयपार्श्वप्रसृतसंयुक्ताग्र- मध्यमाद्वयोपरिस्थितवक्राकारतर्जन्यङ्गुष्ठयुगलाग्रसमाश्लेषान्तरालप्रतीयमानगग- नान्तराले कारण१तावन्मात्रतया स्थितं विश्वं प्रकाशयन्ती बीजमुद्रा सर्व- सिद्धिमयाभिधे चक्रे स्थितेत्यर्थः ॥६९-७०॥ सूक्ष्म कारण के रूप में स्थित विश्व का सदा प्रकाश करने वाली यह बीज स्वरूपिणी महामुद्रा सर्वसिद्धिमय चक्र में स्थित है । ६९-७०॥ शिव और शक्ति का समाश्लेष ही सामरस्य है। इस सामरस्य में प्रकाश और विमर्श- रूप सूक्ष्म बोधगगन शोभायमान है । इसमें सूक्ष्म कारणतन्मात्रा के रूप में सारा जगत् विद्यमान है । बीज रूप में स्थित इस विश्व को यह सदा प्रकाशित करती है । इसलिये इसको बीज रूप महामुद्रा कहते हैं । आगे बनने वाले चर और अचर सारे जगत् की उत्पत्ति इसी से होती है । यह मुद्रा सर्वसिद्धिमय चक्र में स्थित है । विश्व की उत्पत्ति में कारणभूत बीजमुद्रा का आधार होने से इस चक्र से शिव से लेकर भूमि पर्यन्त सारे जगत् की सिद्धि (उत्पत्ति) होती है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है—"चिति शक्ति स्वतन्त्र रूप से विश्व की सिद्धि (उत्पत्ति) में कारण है" ।। इस तरह से सारे जगत् की उत्पत्ति करने वाले सर्वसिद्धिमय चक्र में यह मुद्रा स्थित है । इसका अभिप्राय यह है कि शिव और शक्ति संज्ञा वाले दोनों हाथों को अदल-बदल कर दोनों कनिष्ठिकाओं के अग्रभाग को दोनों तिरछी अनामिकाओं से पकड़ कर और उसकी दोनों तरफ दोनों मध्यमाओं के अग्रभाग को संयुक्त करने के बाद उन दोनों के ऊपर तर्जनियों और अंगूठों को तिरछा रखने पर बीच में जो खाली जगह दिखाई पड़ती है, इस सूक्ष्म तन्मात्रारूप कारण में स्थित विश्व का प्रकाश करने वाली यह बीजमुद्रा सर्वसिद्धिमय नामक चक्र में स्थित है ॥६९-७०॥ १. तन्मये-ग. ज. झ. उ. । २. 'रूप' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ३. प्रकाशा- यन्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. 'भावि' नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. । ५. 'तदुक्तमीश्वर- प्रत्यभिज्ञायाम्' इति पाठः-ग. ज. झ. उ. ।
८८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः योनिमुद्रामाह— सम्पूर्णस्य प्रकाशस्य लाभभूमिरियं पुनः ॥७०॥ योनिमुद्रा कलारूपा सर्वानन्दमये स्थिता । सम्पूर्णस्य प्रकाशस्य प्रकाशात्मनः परशिवस्य । लाभभूमिः प्राप्तिस्थानम् । अत एव ^१इयं योनिमुद्रा, योनिरूपा मुद्रा योनिमुद्रा, योनिस्त्रिकोणम् । वामा- दीच्छादिशक्तित्रितयसामरस्यरूपा^२न्तस्त्रिकोणान्तरालरूपिणी । कलारूपा हार्द्ध- कलात्मकविमर्श^३शक्तिरूपा । अत एव सर्वानन्दमये शिवशक्तिसामरस्यसमुदित- परानन्दलक्षण^४परमबिन्दुरूपसर्वानन्दमयनाम्नि चक्रे स्थिता । कोऽर्थः ? वामेच्छा- रूपवक्रतर्जनीद्वयाग्रगृहीतव्यत्यस्तानामिकाद्वयाग्रपरिगतज्येष्ठाज्ञानमय^५ऋजुसंयुक्ता- ग्रमध्यमाद्वयमध्यगतरौद्रीक्रियात्मककनिष्ठिकाग्रयोजितसम्पूर्णप्रकाशरूपाङ्गुष्ठद्वया- ग्ररूपा ^६विमर्शकलारूपमयी योनिमुद्रा प्रकाशविमर्शसामरस्यलक्षण^७परबिन्दुमय- सर्वानन्दमये स्थितेत्यर्थः ॥७०-७१॥ अब योनिमुद्रा का वर्णन करते हैं— सम्पूर्ण प्रकाश, परम शिव की प्राप्ति का स्थान यह योनिमुद्रा ही है। कामकलास्वरूपिणी यह मुद्रा सर्वानन्दमय चक्र में स्थित है ॥७०-७१॥ सम्पूर्ण प्रकाश, अर्थात् प्रकाशात्मक परम शिव की प्राप्ति का स्थान यह योनिमुद्रा ही है। यह मुद्रा योनिरूपा है। यहां योनि का अर्थ त्रिकोण है। इस मुद्रा का आकार भी वैसा ही है। वामा आदि और इच्छा आदि तीन-तीन शक्तियों के सामरस्य से बने मध्यत्रिकोण के अन्तराल सरीखा इसका रूप है। यह मुद्रा हार्द्ध(काम)कलात्मक विमर्श शक्ति का अवतार है। इसीलिये यह सर्वानन्दमय चक्र में स्थित है। शिव और शक्ति के सामरस्य से उत्पन्न परमानन्द को लक्षित कराने वाला परम बिन्दु (त्रिकोणमध्यगत बिन्दु) ही सर्वानन्दमय चक्र है। इस चक्र में योनिमुद्रा स्थित है। इसका सार यह है कि वामा और इच्छा शक्ति स्वरूप दोनों तिरछी तर्जनियों से अलग-अलग दोनों अनामिकाओं को पकड़ना चाहिये । इन अनामिकाओं के ऊपर ज्येष्ठा और ज्ञान शक्तिमय मध्यमा अंगुलियों को सीधी रखना चाहिये और इनके बीच में रौद्री और क्रियाशक्ति स्वरूपिणी कनिष्ठिकाओं को रखना चाहिये। सबसे आगे प्रकाशमय दोनों अंगुष्ठों का संयोजन करने से विमर्श कला स्वरूपिणी योनिमुद्रा का आकार बनता है। यह मुद्रा प्रकाश-विमर्श के सामरस्य के प्रतीक परबिन्दु स्वरूप सर्वानन्दमय चक्र में स्थित है ॥७०-७१॥ १. ‘इयं’ नास्ति-ख. ज. झ. उ. । २. रूपा त्रिकोणरूपिणी-ख. ग. ज. झ. उ. । ३. शक्तिः-ख. । ४. ‘परम’ नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ५. ‘विमर्शकलारूपमयी’ इति पाठोऽत्राधिकः-गं. उ. । ६. नास्ति-गं. उ. । ७. ‘पर’ नास्ति-ख. ग. ज. झ. उ. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८९ उपसंहरति— क्रियाचैतन्यरूपत्वादेवं चक्रमयं स्थितम् ॥७१॥ क्रिया, “क्रियाशक्तिस्तु विश्वस्य मोदनाद् द्रावणात् तथा” (१।५७) इत्युपक्रान्ता क्रियाशक्तिरेव भेदेन विरचनामयी वामादिशक्तिप्राधान्यभेदात् संक्षोभिण्यादि- योन्यन्ततत्तन्मुद्रारूपेण, चैतन्यरूपत्वात् चक्रमयं त्रैलोक्यमोहनादिसर्वानन्दमयान्त- नवचक्रमयं स्थितमित्यर्थः ॥७१॥ ननु “यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी” (१।९) इत्युपक्रान्तम्, कथं पुनः “क्रियाचैतन्यरूपत्वादेवं चक्रमयं स्थितम्” (१।७१) इत्युपसंह्रियते ? इत्याशङ्क्य¹ तर्हि महान् प्रकृतोपसंहारस्त्वयमित्याह— इच्छारूपं परं तेजः सर्वदा भावयेद् बुधः । मुद्रा प्रकरण का अब उपसंहार होता है— इस तरह से मुद्रा स्वरूपिणी क्रिया शक्ति ही चैतन्य (संवित्) का रूप धारण कर चक्रमय बन जाती है ॥७१॥ ‘क्रियाशक्तिस्तु’ इत्यादि श्लोक से मुद्रा का प्रसंग प्रारम्भ होता है । इस तरह से क्रिया शक्ति ही अंगुलियों की विभिन्न स्थितियों के माध्यम से वामा प्रभृति शक्तियों की प्रधानता आदि के आधार पर संक्षोभिणी से लेकर योनि पर्यन्त मुद्राओं का स्वरूप धारण करती है । इन्हीं के साथ ज्ञानशक्ति चैतन्य का स्वरूप, अर्थात् त्रैलोक्यमोहन से सर्वा- नन्दमय पर्यन्त चक्रों का स्वरूप धारण कर लेती है । इसका अभिप्राय यह है कि क्रिया शक्ति नौ मुद्राओं का स्वरूप धारण करती है और ज्ञानशक्ति नौ चक्रों का । इस तरह से उक्त दोनों शक्तियों की सहायता से श्रीचक्र का परिपूर्ण स्वरूप बनता है ॥७१॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि ‘यदा सा परमा’ इत्यादि श्लोक से इस प्रकरण का प्रारम्भ होता है, जिसमें कि परम शक्ति का विश्व रूप में विस्तार बताया गया है, अब उपसंहार में भी परम शक्ति की ही चर्चा होनी चाहिये, उसके स्थान पर यहाँ क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति से मुद्रा और चक्र की सृष्टि का उल्लेख हो रहा है, ऐसा क्यों ? इसी प्रश्न का उत्तर आगे दे रहें हैं कि यह एक लम्बा प्रकरण है । ऊपर अवान्तर प्रकरण का उप- संहार बताया गया है, लम्बे प्रकरण का उपसंहार आगे इस तरह से बताया जा रहा है— परम ज्योति इच्छा शक्तिमय है, बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह उसी की भावना करे ॥ १. शङ्कायाम्—ख. ग. ङ. ।
९० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः परं तेजः शिवशक्तिसामरस्यरूपपरामयं ज्योतिः । इच्छारूपं स्वेच्छागृहीत१- नानानामरूपप्रपञ्चमयम् । सर्वदा कालत्रयेऽपि । भावयेद् बुधः साक्षात् पर शिवरूप- निजगुरुकटाक्षपातेन । घृणा शङ्का भयं लज्जा जुगुप्सा चेति पञ्चमी । कुलं शीलं च जातिश्चेत्यष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्त२परिपाटितपाशाष्टकतया परिस्फुरत्परशिवाहंभावः स्वेच्छाकल्पितनाना३नामरूपप्रपञ्चमयं श्रीचक्ररूपेण परिणतं परामयं तेजः सर्वदा भावयेदित्यर्थः । पुनरस्यैव चक्रस्य प्रकारान्तरेण वासनान्तरमाह— त्रिधा च नवधा चैव चक्रसंकेतकः पुनः ॥७२॥ स्पष्टम् ॥७२॥ पर तेज शिव और शक्ति के सामरस्य से उद्भूत परम प्रकाश को कहते हैं। यह पर तेज अपनी इच्छा से मुद्रा, चक्र आदि अनेक नामों और आकारों को धारण कर लेता है। विद्वान् साधक को चाहिये कि वह इसी तेजोमय रूप का सदा तीनों कालों में ध्यान करे । किसी प्रामाणिक१ व्यक्ति ने कहा है— घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील, और जाति—ये आठ प्रकार के पाश होते हैं ।। परम शिव के प्रतिनिधि अपने गुरु की कृपादृष्टि प्राप्त कर लेने पर साधक के उक्त आठों पास टूट जाते हैं और उसमें 'मैं ही परशिव हूँ' इस तरह की प्रतीति जाग उठती है। ऐसे व्यक्ति को भी चाहिये कि वह अपनी इच्छा से नाना नाम और रूपमय प्रपंच को धारण करने वाले परम तेज को ही श्रीचक्र के रूप में परिणत जानकर उसकी उपासना करे ।। फिर इसी चक्र की दूसरे प्रकार की भावना बताते हैं— यह चक्रसंकेत पुनः त्रिधा और नवधा विभक्त होता है ॥७२॥ इसका अर्थ स्पष्ट है। अभिप्राय यह है कि यह श्रीचक्र कामेश्वर-कामेश्वरी की संकेत भूमि है, अर्थात् उनका यहाँ मिलन होता है। इस युगलस्वरूप के साक्षात्कार के अनेक उपाय पहले बताये गये हैं। अब पुनः यहाँ बताया जा रहा है कि उस युगलस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिये इस श्रीचक्र की त्रिविध और नवविध भावना करनी चाहिये ॥७२॥ १. कृतनानारूप—ख. ग. झ. उ. । २. नरीत्या पाटित—क. ख. ग. ने. । ३. 'नाम' नास्ति—ख. ग. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक कुलार्णवतन्त्र (१३।९०) में उपलब्ध है। अमृतानन्द यहाँ कुलार्णव का नाम न लेकर इसको किसी अभियुक्त व्यक्ति का वचन मानते हैं। पृ० ९ की टिप्पणी देखिये।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९१ तत्रादौ त्रिधात्ववासनामाह— वह्निनैकेन शक्तिभ्यां द्वाभ्यां चैको१ऽपरः पुनः । तैश्च वह्नित्रयेणापि शक्तीनां त्रितयेन च ॥७३॥ पद्मद्वयेन चान्यः स्याद् भूगृहत्रितयेन च । पञ्चशक्तिचतुर्वह्निपद्मद्वयमहीत्रयम् ॥७४॥ २परिपूर्णं महाचक्रं एकेन वह्निना द्वाभ्यां शक्तिभ्यामेकः प्रकारः । तैश्च एकवह्निशक्तिद्वयरूपै- ३स्त्रिकोणत्रयैः पुनर्वह्नित्रयेण शकीनां त्रितयेन चापरः प्रकारः । अयमर्थः—त्रिको- णानामेवोपरि विस्तारक्रमेण पुनर्वह्नित्रयेण शक्तित्रयेण४ च जायतेऽयमेकः प्रकारः । पद्मद्वितयेन भूगृहत्रितयेन चान्यः प्रकारः । पद्मद्वय(यं) ५वृत्तत्रयान्तरालयोरष्टदलं षोडशदलं चेति । भूगृहत्रितयं चतुरस्रत्रयम् । एवं कृते सति पञ्च शक्तयश्चत्वारो वह्नयः पद्मद्वयं महीत्रयं चेति परिपूर्णं महाचक्रं समष्टिरूपम् ॥७३-७५॥ इनमें से पहले त्रिविध भावना का उपदेश करते हैं— पहले प्रकार में एक वह्नि और दो शक्तियों की भावना की जाती है । उनके साथ तीन वह्नि और तीन शक्तियों को मिला कर दूसरे प्रकार की भावना की जाती है । दो पद्मों और तीन भूगृहों को मिलाकर तीसरी भावना बनती है । इस तरह पाँच शक्ति, चार वह्नि, दो पद्म और तीन भूगृहों को मिलाने से यह श्रीचक्र परिपूर्ण हो जाता है ॥७३-७५॥ एक वह्नि और दो शक्तियों के संयोग से पहला प्रकार बनता है । अर्थात् श्रीचक्र की इस पहली भावना में बिन्दु, त्रिकोण और वसुकोण की भावना की जाती है । एक वह्नि और दो शक्तियों से निष्पन्न इन तीन त्रिकोणों के साथ फिर तीन वह्नि त्रिकोणों और तीन शक्ति त्रिकोणों के संयोग से दूसरा प्रकार बनता है । इसका भाव यह है कि उक्त तीन संख्या के त्रिकोणों के ऊपर ही पुनः तीन शक्ति त्रिकोणों और वह्नि त्रिकोणों का विस्तार होने पर भावना का दूसरा आधार तैयार हो जाता है । इसमें अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार चक्र की भावना की जाती है । पद्मद्वय और भूगृहत्रय से तीसरा प्रकार बनता है । तीन वृत्तों अर्थात् वृत्ताकार घेरों के बीच में अष्टदल और षोडश दल ये दो पद्म बनते हैं । भूगृहत्रय शब्द से तीन चतुरस्रों का ग्रहण होता है । इस तरह से इस तीसरे प्रकार में अष्टदल, षोडशदल और चतुरस्र चक्र की भावना की १. चैकः परः—ख. ग. घ. ज. झ. । २. इति पूर्णं—ख. ग. च. छ. ज. झ. उ. । ३. स्त्रिकोणैः—ख. ग. ज. झ. उ. । ४. शक्तित्रये जातेऽपरः प्रकारो भवति—ख. ने. ज. झ. । ५. वृत्तत्रयान्तराले—ख. ग. च. ज. झ. उ. ।
९२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तत्प्रकारत्रयमेव विविच्य विवृणोति— तत्प्रकारः प्रदर्श्यते । तत्राद्यं नवयोनि स्यात् तेन द्विदशसंयुतम् ॥७५॥ मनुयोनि परं विन्द्यात् तृतीयं तदनन्तरम् । अष्टद्व्यष्टदलोपेतं चतुरस्रत्रयान्वितम् ॥७६॥ जातावेकवचनम् । तत्प्रकाराः प्रदर्श्यन्त इत्यर्थः । तत्र तेषु प्रकारेषु । आद्यं नवयोनि । वह्निनाैकेन शक्तिभ्यां द्वाभ्यामित्यस्य विवरणम् । एकस्य वह्नेर्द्वयोः शक्त्योश्च संयोगे सति बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणैर्नवयोनिचक्रं १भवतीत्यर्थः । तेन द्विदशसंयुतं मनुयोनि परं विन्द्यात् । तेन नवयोनिचक्रेण२ । द्विदशसंयुतं दशारद्वय- संयुतम् । मनुयोनि चतुर्दशकोणम् । परं द्वितीयं जानीयात् । ३तेन वह्नित्रये शक्तित्रये च कृते सति दशारचक्रद्वयं चतुर्दशारचक्रं च चक्रत्रितयं द्वितीयं चक्रं भवतीत्यर्थः । तदनन्तरमष्टद्व्यष्टदलोपेतं चतुरस्रत्रयान्वितम् । ४तेन चक्रद्वयेनान- जाती है। इन तीन प्रकार की भावनाओं में पाँच शक्ति, चार वह्नि, दो पद्म और महीत्रय (चतुरस्रत्रय) से निष्पन्न यह महाचक्र (श्रीचक्र) परिपूर्ण हो जाता है॥७३-७५॥ इन्हीं तीनों प्रकारों को और अधिक स्पष्ट करते हैं— इस त्रिविध भावना की विधि अब बताते हैं। पहला प्रकार नवयोनि पर्यन्त चक्र का है। दूसरा दो दशारों और चतुर्दशार का है। इसके बाद तीसरा प्रकार अष्टदल, षोडश दल के साथ चतुरस्रत्रय के मिलने से बनता है ॥७५-७६॥ प्रकार शब्द में एकवचन जाति का सूचक है। इसका अर्थ होगा विविध जाति का प्रकार, अर्थात् अनेक प्रकार। यहाँ तीन प्रकार बताए गये हैं। पहला प्रकार नवयोनि पर्यन्त चक्रों का है। ७३वें श्लोक में एक वह्नि और दो शक्तियों की चर्चा आई है। नवयोनि पद उसी की तरफ संकेत करता है, क्योंकि नवयोनि चक्र एक वह्नि और दो शक्तियों के संयोग से ही बनता है। इस तरह से नवयोनि शब्द बैन्दव, त्रिकोण और अष्टकोण—इन तीनों चक्रों की ओर संकेत करता है। उस नवयोनि चक्र के साथ दो दशार और चतुर्दशार चक्र को मिलाने पर दूसरा प्रकार बनता है। नवयोनि चक्र के ऊपर तीन वह्नि और तीन शक्ति त्रिकोणों को मिलाने से अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार—इन तीन चक्रों के बनने से भावना का दूसरा प्रकार संपन्न होता है। १. भवेदि-ग. ज. झ. उ । २. चक्रेण संयुतं-ग. ने. ज. झ. उ. । ३. तैश्च-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. तदनन्तरं तेन-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९३ न्तरमव्यवधानेन स्थितमत्यन्तं १सन्निहितम् । अष्टदलकमलेन २षोडशदलकमलेन चोपेतं चतुरस्रत्रयात्मकं तृतीयं चक्रमित्यर्थः ॥७५-७६॥ ननु ३ त्रयाणां चक्राणा मेकैकप्रकारत्वं कथमिति ? उच्यते— “प्रत्येकमंशभेदेन सर्गस्थितिलयक्रमात्” इति संकेतपद्धत्युक्तरीत्या ४एकैकचक्रावयवत्रितयस्य सृष्टि- स्थितिसंहारभेदात् क्रोडीकारः५ । तद्यथा— चतुरस्रत्रयं सृष्टिसृष्टिः, षोडशदलपद्मं सृष्टिस्थितिः, अष्टदलपद्मं सृष्टिसंहारः । एवं चक्रत्रयमयं सृष्टिमयत्वादेकम् । एवं चतुर्दशारं स्थितिसृष्टिः बाह्यदशारं स्थिति-स्थितिः, अन्तर्दशारं स्थिति- संहारः । एवं चक्रत्रयं स्थितिमयत्वादेकम् । एवमष्टकोणं संहारसृष्टिः, त्रिकोणं संहारस्थितिः, बैन्दवं संहारसंहारः । एवं चक्रत्रयं संहारमयत्वादेकम्६ । इत्येतत् सर्वं मनसि निधायाह— श्रीचक्र की भावना के उक्त दो प्रकारों के बन जाने के बाद इन्हीं से लगे हुए अष्टदल और षोडशदल कमलों से संयुक्त चतुरस्रत्रय से इस भावना का तीसरा प्रकार पूरा होता है ॥ ७५-७६॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि तीन-तीन चक्रों को मिलाकर एक-एक प्रकार कैसे बन सकता है ? इसका उत्तर यह है कि १संकेतपद्धति के अनुसार सृष्टि, स्थिति और संहार के भेद से प्रत्येक चक्र के तीन-तीन अंश बन जाते हैं । इस तरह से प्रत्येक चक्र के सृष्टि, स्थिति और संहार नामक अवयवों को मिलाकर उक्त त्रिविध भावना की जाती है । जैसे कि चतुरस्रत्रय सृष्टि-सृष्टि, षोडश दल सृष्टि-स्थिति और अष्टदल सृष्टि-संहार का प्रतीक है । इस तरह से ये तीनों चक्र सृष्टिमय होने से एक ही मान लिये जाते हैं । इसी तरह से चतुर्दशार स्थिति-सृष्टि, बाह्यदशार स्थिति-स्थिति और अन्तर्दशार स्थिति-संहार दशा वाला है । इस प्रकार ये तीन चक्र भी स्थितिमयता के आधार पर एक हैं । इसी तरह से अष्टकोण संहार-सृष्टि, त्रिकोण संहार-स्थिति और बैन्दव चक्र संहार-संहार दशा वाला है । इस तरह से ये तीन चक्र अपनी संहारमयता के आधार पर एक हैं । आगे भगवान् १. अत्यन्तमव्यवहितम्-ने. ज. झ. उ. । २. 'षोडश....त्रयात्मकं' इत्यस्य स्थाने 'चतुरस्रत्रयोपेतं चक्रत्रयोपेतं चक्रत्रयात्मकं' इति पाठः-ग. ने. ज. उ. । ३. 'ननु.... रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ४. एकेन चक्रावयवत्रितयस्य प्रत्येकस्य-ने. ज. झ. उ. । ५. कारतः-ने. ज. झ. उ. । ६. इतः परम्-'बैन्दवं चक्रमारभ्य चतुरस्रान्तोद्धारः सृष्टि- रित्यर्थः' इति सार्वत्रिकः पाठोऽत्रानावश्यकः, अग्रे विद्यमानत्वात् । I. इस विशिष्ट ग्रन्थ का परिचय नित्या. षो., उपो. पृ. ४६-४७ से तथा लुप्ता. भा. २, पृ. ७३ से प्राप्त करना चाहिये । लगता है भास्करराय के समय में भी यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं था । इस ग्रन्थ के कुछ वचनों की भास्करराय ने नित्या. षो. पंचम पटल का अंश मानकर व्याख्या की है ।
९४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः चक्रस्य त्रिप्रकारत्वं कथितं परमेश्वरि । स्पष्टम् । ननु चक्रस्य त्रैविध्यमुक्तं यदि तर्हीदं चक्रं मध्यचक्रमारभ्य किमुत्पादयितुं न शक्यत इत्यत आह— सृष्टिः स्यान्नवयोन्यादिपृथ्व्यन्तं संहृतिः पुनः ॥७७॥ पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तमिति शास्त्रस्य निर्णयः । अत्र नवयोनिशब्देन ^२नवयोन्यन्तर्गतं बैन्दवं चक्रं लक्ष्यते । ^३तद् बैन्दवं चक्र- मारभ्य चतुरस्रान्तोद्धारः सृष्टिः । संहृतिः पुनः पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तमिति । तथा च चतुरस्रत्रयमारभ्य बैन्दवान्तमुद्धारः संहार इत्यर्थः । इति चतुःशतीशास्त्रस्य शिव कहते हैं कि इसी विभाग को मन में रखकर मैंने श्रीचक्र की त्रिविध भावना का प्रकार बताया है— हे परमेश्वरि ! इस तरह से मैंने चक्र की त्रिविध भावना का कथन किया है ॥७७॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥७७॥ ऊपर चक्र की त्रिविधता का वर्णन है तथा चतुरस्र चक्र से इसका प्रारंभ बताया गया है । उसके स्थान पर किसी बीच के चक्र से भी इसकी भावना की जा सकती है, अतः इस विषय में शास्त्र की व्यवस्था बताई जा रही है— नवयोनि से चतुरस्र पर्यन्त चक्र का उद्धार सृष्टिक्रम और चतुरस्र से नव- योनि पर्यन्त उद्धार संहारक्रम कहलाता है, शास्त्र का यही निर्णय है ॥७७-७८॥ यहाँ नवयोनि शब्द से तदन्तर्गत बैन्दव चक्र का ग्रहण किया जाता है । इस बैन्दव चक्र से चतुरस्र पर्यन्त चक्र का उद्धार सृष्टिक्रम कहलाता है और चतुरस्रत्रय से बैन्दव चक्र पर्यन्त उद्धार संहारक्रम के अन्तर्गत आता है । यह ^१चतुःशतीशास्त्र का निर्णय १. सृष्टिस्थं-ख. ग. च. छ. ज. झ. ड. । २. 'नव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'तद् बैन्दवं''''सृष्टिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । १. नित्याषोडशिकार्णव को अमृतानन्द चतुःशतीशास्त्र के नाम से उद्धृत करते हैं । शिवानन्द के अनुसार इसमें पूरे चार सौ श्लोक हैं । वहाँ प्रथमतः (१।२९-४१) सृष्टि- क्रम के अनुसार तथा बाद में (१।५९-७१) संहारक्रम के अनुसार श्रीचक्र का उद्धार बताया गया है । यहाँ अमृतानन्द का कहना है कि चतुःशतीशास्त्र में सृष्टिक्रम और संहारक्रम से श्रीचक्र का उद्धार बताया गया है, अतः इन दो क्रमों के अतिरिक्त किसी तृतीय क्रम से श्रीचक्र की उपासना नहीं की जा सकती । भास्करराय के अनुसार नित्या- षोडशिकार्णव के १।४२ श्लोक में इस विषय की चर्चा हुई है । इस प्रसंग में यह अवधेय है कि संहारक्रम के उद्धारक श्लोक जयरथ अथवा विद्यानन्द की व्याख्या में उपलब्ध नहीं हैं । नित्या. उपो. पृ० ९-११ में इस विषय की विस्तृत चर्चा की गई है ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९५ निर्णयः । अतो न ¹मध्यमादिचक्रमुद्धारयतीति तात्पर्यम् । यथा देवदत्तविष्णुमित्र- यज्ञदत्तेषु प्रस्तुतेषु देवदत्तयज्ञदत्तयोः फलानि देयानीत्युक्ते विष्णुमित्रस्य न देया- नीति गम्यते, तद्वत्² ॥७७-७८॥ पूर्वं श्रीक्रममवयवशो विभज्य वासनामुक्त्वेदानीं समष्टिचक्रस्य वासनामाह— एतत्समष्टिरूपं तु त्रिपुराचक्रमुच्यते ॥७८॥ एतत्समष्टिरूपं सृष्ट्यादित्रितयं समष्टिनम । अवयवी तु तथा न भवति, सृष्टि- पदेन स्थितिपदेन संहारपदेनापि च नाभिधीयते, किन्तु ³त्रिपुराचक्रमुच्यते । त्रिपु- रायाः सृष्ट्यादिभ्यः पुरा विद्यमानत्वात् तत्पदा⁴भिधेयाया अनाद्यन्तरूपायाः स्वसं- विदश्चक्रमाविर्भावभूमिरित्युच्यते । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"वशिन्योऽष्टौ सान्त- रालम्" इत्यादिना "अनाख्या सर्वगा ततः" इत्यन्तेन ॥७८॥ है । इसलिये उक्त दो क्रमों के अतिरिक्त किसी बीच के चक्र से श्रीचक्र का उद्धार नहीं किया जा सकता । जैसे देवदत्त, विष्णुमित्र और यज्ञदत्त की उपस्थिति में कोई कहे कि देवदत्त और यज्ञदत्त को फल दो, तो इससे यह निकलता है कि विष्णुमित्र को फल नहीं देना है, उसी तरह से चक्र के उद्धार की दो विधियों के बताने से यह निकलता है कि इनसे भिन्न कोई तीसरी विधि नहीं है ॥७७-७८॥ ऊपर श्रीचक्र को तीन अवयवों में विभक्त कर उसकी भावना का प्रकार बताया गया है, अब पूरे चक्र को एक साथ भावना करने की विधि बताई जा रही है— सृष्टि आदि तीनों विभागों को एक साथ मिला देने पर त्रिपुराचक्र परि- पूर्ण कहलाता है ॥७८॥ समष्टि शब्द का अर्थ है सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र की एकाकारता । अवयवशः यह चक्र सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के नाम से जाना जाता है, किन्तु इन सब रूपों के एक साथ मिल जाने पर ऊपर वाला विभाग भी समाप्त हो जाता है। उस समय समष्टिभूत यह अवयवी चक्र उक्त तीनों अलग-अलग नामों से अभिहित न होकर केवल त्रिपुरा चक्र के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरा चक्र का अर्थ है—सृष्टि आदि तीन अवस्थाओं से पहले विद्यमान, अनादि और अनन्त स्वरूपवाली संवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा का आविर्भावक चक्र। संकेतपद्धति के कुछ श्लोकों में इन व्यष्टि और समष्टि १. मध्यमारभ्य चतुःशतीशास्त्रस्य चक्रोद्धार इति-ख. ग. । २. 'तद्वत्' नास्ति-ख. ने. झ. । ३. 'किन्तु' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. । ४. नभिसन्धेयायाः-ख. ने. ज.
९६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः ननु स्वसंविद्रूपा त्रिपुरैव सा ज्ञायताम्, किमेतेन चक्रवासनालक्षणेन बक- बन्धनप्रयासेनेत्यत आह— यस्य विज्ञानमात्रेण त्रिपुराज्ञानवान् भवेत् । यस्य विज्ञानमात्रेण यस्मिन् विज्ञात एव, त्रिपुराचक्रज्ञानमात्रेण त्रिपुराज्ञान- वान् ज्ञाता भवेत् । कोऽर्थः ? १शुद्धाया निराकारमूर्तेस्त्रिपुराया ज्ञानमशक्यम् । अत एवोक्तरीत्यैव एतच्चक्रवासनया२ तन्मध्ये ३बैन्दवचक्रे क्रोडीकृता सा ज्ञातुं शक्येत्यर्थः । तदुक्तमभियुक्तैः— चक्रों का स्वरूप प्रदर्शित हैं । १ऋजुविमर्शिनी और अर्थरत्नावली (नि. पो. पृ. ६५-६६) में इस विषय को देखना चाहिये ।।७८।। अब प्रश्न उठता है कि जब श्रीचक्र में त्रिपुरा का निवास है, तो हम स्वसंवित्- स्वरूपिणी त्रिपुरा को जानने का ही प्रयास क्यों न करें, बगुले को पकड़ने के प्रयास सरीखे इस चक्र-वासना के चक्कर में पड़ने से क्या लाभ है ? इसका उत्तर आगे देते हैं— इस त्रिपुरा भगवती के चक्र को सही तरह से जान लेने वाले व्यक्ति को त्रिपुरा का ज्ञान अपने आप हो जाता है ॥७९॥ जिसके जान लेने पर, अर्थात् ऊपर वर्णित विविध वासनाओं के माध्यम से इस श्रीचक्र के स्वरूप को ठीक तरह से समझ लेने पर साधक त्रिपुरा के स्वरूप का ज्ञाता हो जाता है । इसका भाव यह है कि शुद्ध निराकार स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा को समझ पाना कठिन है । इसीलिये ऊपर बताई गई विविध वासनाओं के सहारे इस श्रीचक्र के मध्य में विराजमान बैन्दव चक्र में अपने स्वरूप को छिपा कर बैठी हुई भगवती को जाना जा सकता है, जैसा कि सुभगोदयवासनाकार२ शिवानन्द ने कहा है— १. शुद्धनिरा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. नायास्त-ने. झ. उ. । ३. बैन्दवे क्रोडी- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । १. इस प्रसंग में ऋजुविमर्शिनीकार ने संकेतपद्धति के तीन श्लोक उद्धृत किये हैं । उनमें सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के निरूपण के बाद चतुर्थ अनाख्या चक्र की चर्चा की गई है । दीपिका में तृतीय श्लोक के प्रारंभ और अन्त का कुछ अंश मात्र उद्धृत है । इसमें अष्टकोण, त्रिकोण और बिन्दुचक्र की संहारात्मकता का तथा सम्पूर्ण चक्र की अनाख्यता का उल्लेख है । अर्थरत्नावली में उद्धृत वचनों में यह विषय भिन्न पद्धति से वर्णित है । २. इस ग्रन्थ का परिचय पृ. ७१ की पहली टिप्पणी में दिया जा चुका है ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९७ घृतकाठिन्यवच्चक्रमहायोनौ चिदम्बरम् । द्रुतहेमघनीभावमिव ¹मूर्तीकरोम्यहम् ॥ (सु० वा० ३६) इति । चक्रस्य पूर्वमुद्दिष्टं नवधात्वमिदानीं वक्तुं प्रतिजानीते— चक्रस्य नवधात्वं च कथयामि तव प्रिये ॥७९॥ यतः प्रियतमाऽसि त्वम्, अतो रहस्यमपि कथयामीत्यर्थः ॥७९॥ इदानीं नवधा²त्वमेवाह— आदिमं भूत्रयेण स्याद् द्वितीयं षोडशारकम् । अन्यदष्टदलं प्रोक्तं मनुकोणमनन्तरम् ॥८०॥ पञ्चमं दशकोणं स्यात् षष्ठं चापि दशारकम् । सप्तमं वसुकोणं स्यान्मध्यँत्र्यस्रमथाष्टमम् ॥८१॥ नवमं त्र्यस्रमध्यं स्यात् मैं चक्र की महायोनि में, अर्थात् बैन्दव चक्र में, जमे हुये घृत के¹ समान घनीभूत स्वरूप वाली संवित्कला का पिघले हुए सुवर्ण के घनीभूत स्वरूप-सदृश कान्ति वाली चिदम्बर की मूर्ति बना कर ध्यान करता हूँ ॥७९॥ चक्र की त्रिविध भावना के उपदेश के बाद अब पूर्वसूचित नवविध भावना का वर्णन करते हैं— हे प्रिये, अब मैं चक्र की नवविध भावना को कहता हूँ ॥७९॥ तुम मेरी प्रियतमा हो, अतः इस रहस्य को भी अब मैं तुम्हारे सामने खोल रहा हूँ ॥७९॥ अब चक्र की नवविधता का वर्णन किया जाता है— चतुरस्र त्रय से पहला प्रकार बनता है, षोडशार से दूसरा, अष्टदल से तीसरा, चतुर्दशार से चौथा, बाह्यदशार से पांचवां, अन्तर्दशार से छठा, अष्ट- कोण से सातवाँ, मध्यत्र्यस्र (मध्य त्रिकोण) से आठवाँ और त्र्यस्रमध्य (त्रिकोण मध्यगत बिन्दु) से नवाँ प्रकार बनता है ॥८०-८२॥ १. मूर्तिमिति सार्वत्रिकः पाठः । २. धात्वमाह–ख. ग. नै. ज. झ. उ. । ३. मध्यं– च. छ. ज. झ. ।
- प्रस्तुत श्लोक में संवित्कला के स्वरूप की घनीभूत घृत से तथा चिदम्बर मूर्ति की पिघले हुए सुवर्ण के घनीभूत स्वरूप से तुलना की गई है । इससे संवित्कला के घृत सदृश कोमल दयार्द्र स्वरूप की तथा चिदम्बर मूर्ति के तप्त हेमसदृश स्वरूप के आवाहन के बाद उसके निष्कल और सकल स्वरूप के ध्यान की विधि बताई गई है । ७
९८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः भूत्रयेण चतुरस्रत्रयेण। मनुकोणं चतुर्दशारम्। वसुकोणम् अष्टकोणम्। स्पष्टमन्यत् ॥८०-८२॥ उक्तानां नवचक्राणां नामान्याह— तेषां नामान्यतः शृणु। त्रैलोक्यमोहनं चक्रं सर्वाशापरिपूरकम् ॥८२॥ सर्वसंक्षोभणं गौरि सर्वसौभाग्यदायकम्। सर्वार्थसाधकं चक्रं सर्वरक्षाकरं परम् ॥८३॥ सर्वरोगहरं देवि सर्वसिद्धिप्रदं तथा। सर्वानन्दमयं चापि नवमं शृणु सुन्दरि ॥८४॥ त्रैलोक्यमोहनम्। लोक्यत इति लोकः, लोक्यतेऽनेनेति लोकः, लोकयतीति लोक इति कर्मकरणकर्तृव्युत्पत्त्या मेयमानमातृलक्षणं त्रैलोक्यम्, तस्य मोहनं तिरोधायकमद्वैतप्रतीत्युत्पादनेन। सर्वाशापरिपूरकम्। आशा नाम अतृप्तस्य भूत्रय चतुरस्रत्रय को कहते हैं। ^१मनुकोण चतुर्दशार को और वसुकोण अष्टकोण को कहते हैं। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥८०-८२॥ उक्त नवचक्रों के नाम बताते हैं— अब उनके नाम सुनो। त्रैलोक्यमोहन चक्र पहला और सर्वाशापरिपूरक चक्र दूसरा है। हे गौरि! सर्वसंक्षोभण चक्र तीसरा, सर्वसौभाग्यदायक चौथा, सर्वार्थ- साधक चक्र पांचवाँ और सर्वरक्षाकर छठा चक्र है। हे देवि! सातवें चक्र का नाम सर्वरोगहर और आठवें का नाम सर्वसिद्धिप्रद है। हे सुन्दरि! तुम सुनो कि नवें चक्र का नाम सर्वानन्दमय है ॥८२-८४॥ १. त्रैलोक्यमोहन शब्द में जो लोक शब्द है, उसकी कर्म, करण और कर्ता के अर्थ में त्रिविध व्युत्पत्ति की जाती है—जो देखा जाता है, जिससे देखते हैं और जो देखता है। इनसे क्रमशः मेय, मान और माता का ग्रहण होता है। इन तीनों के समाहार का नाम त्रैलोक्य है। यह चक्र इस त्रैलोक्य का मोहन करने वाला है, अद्वैत दृष्टि को उत्पन्न कर यह चक्र इस त्रैलोक्य को तिरोहित कर देता है। २. सर्वाशापरिपूरक पद में विद्य- १. चतुर्दशकोणं स्पष्ट-ख. ग. ज. झ. उ.। २. सर्वक्षोभकरं-ख. ग. च. छ. झ. उ.। ३. देवि-झ. उ.।
- पुराणों में एक कल्प में १४ मनुओं की स्थिति मानी जाती है, अतः मनुकोण शब्द से यहाँ चतुर्दश कोणात्मक चतुर्दशार चक्र गृहीत होता है। इसी तरह से वसु देवों की आठ संख्या के आधार पर वसुकोण शब्द अष्टकोण का वाचक है।