योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ८९ उपसंहरति— क्रियाचैतन्यरूपत्वादेवं चक्रमयं स्थितम् ॥७१॥ क्रिया, “क्रियाशक्तिस्तु विश्वस्य मोदनाद् द्रावणात् तथा” (१।५७) इत्युपक्रान्ता क्रियाशक्तिरेव भेदेन विरचनामयी वामादिशक्तिप्राधान्यभेदात् संक्षोभिण्यादि- योन्यन्ततत्तन्मुद्रारूपेण, चैतन्यरूपत्वात् चक्रमयं त्रैलोक्यमोहनादिसर्वानन्दमयान्त- नवचक्रमयं स्थितमित्यर्थः ॥७१॥ ननु “यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी” (१।९) इत्युपक्रान्तम्, कथं पुनः “क्रियाचैतन्यरूपत्वादेवं चक्रमयं स्थितम्” (१।७१) इत्युपसंह्रियते ? इत्याशङ्क्य¹ तर्हि महान् प्रकृतोपसंहारस्त्वयमित्याह— इच्छारूपं परं तेजः सर्वदा भावयेद् बुधः । मुद्रा प्रकरण का अब उपसंहार होता है— इस तरह से मुद्रा स्वरूपिणी क्रिया शक्ति ही चैतन्य (संवित्) का रूप धारण कर चक्रमय बन जाती है ॥७१॥ ‘क्रियाशक्तिस्तु’ इत्यादि श्लोक से मुद्रा का प्रसंग प्रारम्भ होता है । इस तरह से क्रिया शक्ति ही अंगुलियों की विभिन्न स्थितियों के माध्यम से वामा प्रभृति शक्तियों की प्रधानता आदि के आधार पर संक्षोभिणी से लेकर योनि पर्यन्त मुद्राओं का स्वरूप धारण करती है । इन्हीं के साथ ज्ञानशक्ति चैतन्य का स्वरूप, अर्थात् त्रैलोक्यमोहन से सर्वा- नन्दमय पर्यन्त चक्रों का स्वरूप धारण कर लेती है । इसका अभिप्राय यह है कि क्रिया शक्ति नौ मुद्राओं का स्वरूप धारण करती है और ज्ञानशक्ति नौ चक्रों का । इस तरह से उक्त दोनों शक्तियों की सहायता से श्रीचक्र का परिपूर्ण स्वरूप बनता है ॥७१॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि ‘यदा सा परमा’ इत्यादि श्लोक से इस प्रकरण का प्रारम्भ होता है, जिसमें कि परम शक्ति का विश्व रूप में विस्तार बताया गया है, अब उपसंहार में भी परम शक्ति की ही चर्चा होनी चाहिये, उसके स्थान पर यहाँ क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति से मुद्रा और चक्र की सृष्टि का उल्लेख हो रहा है, ऐसा क्यों ? इसी प्रश्न का उत्तर आगे दे रहें हैं कि यह एक लम्बा प्रकरण है । ऊपर अवान्तर प्रकरण का उप- संहार बताया गया है, लम्बे प्रकरण का उपसंहार आगे इस तरह से बताया जा रहा है— परम ज्योति इच्छा शक्तिमय है, बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह उसी की भावना करे ॥ १. शङ्कायाम्—ख. ग. ङ. ।
९० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः परं तेजः शिवशक्तिसामरस्यरूपपरामयं ज्योतिः । इच्छारूपं स्वेच्छागृहीत१- नानानामरूपप्रपञ्चमयम् । सर्वदा कालत्रयेऽपि । भावयेद् बुधः साक्षात् पर शिवरूप- निजगुरुकटाक्षपातेन । घृणा शङ्का भयं लज्जा जुगुप्सा चेति पञ्चमी । कुलं शीलं च जातिश्चेत्यष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्त२परिपाटितपाशाष्टकतया परिस्फुरत्परशिवाहंभावः स्वेच्छाकल्पितनाना३नामरूपप्रपञ्चमयं श्रीचक्ररूपेण परिणतं परामयं तेजः सर्वदा भावयेदित्यर्थः । पुनरस्यैव चक्रस्य प्रकारान्तरेण वासनान्तरमाह— त्रिधा च नवधा चैव चक्रसंकेतकः पुनः ॥७२॥ स्पष्टम् ॥७२॥ पर तेज शिव और शक्ति के सामरस्य से उद्भूत परम प्रकाश को कहते हैं। यह पर तेज अपनी इच्छा से मुद्रा, चक्र आदि अनेक नामों और आकारों को धारण कर लेता है। विद्वान् साधक को चाहिये कि वह इसी तेजोमय रूप का सदा तीनों कालों में ध्यान करे । किसी प्रामाणिक१ व्यक्ति ने कहा है— घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील, और जाति—ये आठ प्रकार के पाश होते हैं ।। परम शिव के प्रतिनिधि अपने गुरु की कृपादृष्टि प्राप्त कर लेने पर साधक के उक्त आठों पास टूट जाते हैं और उसमें 'मैं ही परशिव हूँ' इस तरह की प्रतीति जाग उठती है। ऐसे व्यक्ति को भी चाहिये कि वह अपनी इच्छा से नाना नाम और रूपमय प्रपंच को धारण करने वाले परम तेज को ही श्रीचक्र के रूप में परिणत जानकर उसकी उपासना करे ।। फिर इसी चक्र की दूसरे प्रकार की भावना बताते हैं— यह चक्रसंकेत पुनः त्रिधा और नवधा विभक्त होता है ॥७२॥ इसका अर्थ स्पष्ट है। अभिप्राय यह है कि यह श्रीचक्र कामेश्वर-कामेश्वरी की संकेत भूमि है, अर्थात् उनका यहाँ मिलन होता है। इस युगलस्वरूप के साक्षात्कार के अनेक उपाय पहले बताये गये हैं। अब पुनः यहाँ बताया जा रहा है कि उस युगलस्वरूप का साक्षात्कार करने के लिये इस श्रीचक्र की त्रिविध और नवविध भावना करनी चाहिये ॥७२॥ १. कृतनानारूप—ख. ग. झ. उ. । २. नरीत्या पाटित—क. ख. ग. ने. । ३. 'नाम' नास्ति—ख. ग. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक कुलार्णवतन्त्र (१३।९०) में उपलब्ध है। अमृतानन्द यहाँ कुलार्णव का नाम न लेकर इसको किसी अभियुक्त व्यक्ति का वचन मानते हैं। पृ० ९ की टिप्पणी देखिये।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९१ तत्रादौ त्रिधात्ववासनामाह— वह्निनैकेन शक्तिभ्यां द्वाभ्यां चैको१ऽपरः पुनः । तैश्च वह्नित्रयेणापि शक्तीनां त्रितयेन च ॥७३॥ पद्मद्वयेन चान्यः स्याद् भूगृहत्रितयेन च । पञ्चशक्तिचतुर्वह्निपद्मद्वयमहीत्रयम् ॥७४॥ २परिपूर्णं महाचक्रं एकेन वह्निना द्वाभ्यां शक्तिभ्यामेकः प्रकारः । तैश्च एकवह्निशक्तिद्वयरूपै- ३स्त्रिकोणत्रयैः पुनर्वह्नित्रयेण शकीनां त्रितयेन चापरः प्रकारः । अयमर्थः—त्रिको- णानामेवोपरि विस्तारक्रमेण पुनर्वह्नित्रयेण शक्तित्रयेण४ च जायतेऽयमेकः प्रकारः । पद्मद्वितयेन भूगृहत्रितयेन चान्यः प्रकारः । पद्मद्वय(यं) ५वृत्तत्रयान्तरालयोरष्टदलं षोडशदलं चेति । भूगृहत्रितयं चतुरस्रत्रयम् । एवं कृते सति पञ्च शक्तयश्चत्वारो वह्नयः पद्मद्वयं महीत्रयं चेति परिपूर्णं महाचक्रं समष्टिरूपम् ॥७३-७५॥ इनमें से पहले त्रिविध भावना का उपदेश करते हैं— पहले प्रकार में एक वह्नि और दो शक्तियों की भावना की जाती है । उनके साथ तीन वह्नि और तीन शक्तियों को मिला कर दूसरे प्रकार की भावना की जाती है । दो पद्मों और तीन भूगृहों को मिलाकर तीसरी भावना बनती है । इस तरह पाँच शक्ति, चार वह्नि, दो पद्म और तीन भूगृहों को मिलाने से यह श्रीचक्र परिपूर्ण हो जाता है ॥७३-७५॥ एक वह्नि और दो शक्तियों के संयोग से पहला प्रकार बनता है । अर्थात् श्रीचक्र की इस पहली भावना में बिन्दु, त्रिकोण और वसुकोण की भावना की जाती है । एक वह्नि और दो शक्तियों से निष्पन्न इन तीन त्रिकोणों के साथ फिर तीन वह्नि त्रिकोणों और तीन शक्ति त्रिकोणों के संयोग से दूसरा प्रकार बनता है । इसका भाव यह है कि उक्त तीन संख्या के त्रिकोणों के ऊपर ही पुनः तीन शक्ति त्रिकोणों और वह्नि त्रिकोणों का विस्तार होने पर भावना का दूसरा आधार तैयार हो जाता है । इसमें अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार चक्र की भावना की जाती है । पद्मद्वय और भूगृहत्रय से तीसरा प्रकार बनता है । तीन वृत्तों अर्थात् वृत्ताकार घेरों के बीच में अष्टदल और षोडश दल ये दो पद्म बनते हैं । भूगृहत्रय शब्द से तीन चतुरस्रों का ग्रहण होता है । इस तरह से इस तीसरे प्रकार में अष्टदल, षोडशदल और चतुरस्र चक्र की भावना की १. चैकः परः—ख. ग. घ. ज. झ. । २. इति पूर्णं—ख. ग. च. छ. ज. झ. उ. । ३. स्त्रिकोणैः—ख. ग. ज. झ. उ. । ४. शक्तित्रये जातेऽपरः प्रकारो भवति—ख. ने. ज. झ. । ५. वृत्तत्रयान्तराले—ख. ग. च. ज. झ. उ. ।
९२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तत्प्रकारत्रयमेव विविच्य विवृणोति— तत्प्रकारः प्रदर्श्यते । तत्राद्यं नवयोनि स्यात् तेन द्विदशसंयुतम् ॥७५॥ मनुयोनि परं विन्द्यात् तृतीयं तदनन्तरम् । अष्टद्व्यष्टदलोपेतं चतुरस्रत्रयान्वितम् ॥७६॥ जातावेकवचनम् । तत्प्रकाराः प्रदर्श्यन्त इत्यर्थः । तत्र तेषु प्रकारेषु । आद्यं नवयोनि । वह्निनाैकेन शक्तिभ्यां द्वाभ्यामित्यस्य विवरणम् । एकस्य वह्नेर्द्वयोः शक्त्योश्च संयोगे सति बैन्दवत्रिकोणाष्टकोणैर्नवयोनिचक्रं १भवतीत्यर्थः । तेन द्विदशसंयुतं मनुयोनि परं विन्द्यात् । तेन नवयोनिचक्रेण२ । द्विदशसंयुतं दशारद्वय- संयुतम् । मनुयोनि चतुर्दशकोणम् । परं द्वितीयं जानीयात् । ३तेन वह्नित्रये शक्तित्रये च कृते सति दशारचक्रद्वयं चतुर्दशारचक्रं च चक्रत्रितयं द्वितीयं चक्रं भवतीत्यर्थः । तदनन्तरमष्टद्व्यष्टदलोपेतं चतुरस्रत्रयान्वितम् । ४तेन चक्रद्वयेनान- जाती है। इन तीन प्रकार की भावनाओं में पाँच शक्ति, चार वह्नि, दो पद्म और महीत्रय (चतुरस्रत्रय) से निष्पन्न यह महाचक्र (श्रीचक्र) परिपूर्ण हो जाता है॥७३-७५॥ इन्हीं तीनों प्रकारों को और अधिक स्पष्ट करते हैं— इस त्रिविध भावना की विधि अब बताते हैं। पहला प्रकार नवयोनि पर्यन्त चक्र का है। दूसरा दो दशारों और चतुर्दशार का है। इसके बाद तीसरा प्रकार अष्टदल, षोडश दल के साथ चतुरस्रत्रय के मिलने से बनता है ॥७५-७६॥ प्रकार शब्द में एकवचन जाति का सूचक है। इसका अर्थ होगा विविध जाति का प्रकार, अर्थात् अनेक प्रकार। यहाँ तीन प्रकार बताए गये हैं। पहला प्रकार नवयोनि पर्यन्त चक्रों का है। ७३वें श्लोक में एक वह्नि और दो शक्तियों की चर्चा आई है। नवयोनि पद उसी की तरफ संकेत करता है, क्योंकि नवयोनि चक्र एक वह्नि और दो शक्तियों के संयोग से ही बनता है। इस तरह से नवयोनि शब्द बैन्दव, त्रिकोण और अष्टकोण—इन तीनों चक्रों की ओर संकेत करता है। उस नवयोनि चक्र के साथ दो दशार और चतुर्दशार चक्र को मिलाने पर दूसरा प्रकार बनता है। नवयोनि चक्र के ऊपर तीन वह्नि और तीन शक्ति त्रिकोणों को मिलाने से अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार—इन तीन चक्रों के बनने से भावना का दूसरा प्रकार संपन्न होता है। १. भवेदि-ग. ज. झ. उ । २. चक्रेण संयुतं-ग. ने. ज. झ. उ. । ३. तैश्च-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. तदनन्तरं तेन-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९३ न्तरमव्यवधानेन स्थितमत्यन्तं १सन्निहितम् । अष्टदलकमलेन २षोडशदलकमलेन चोपेतं चतुरस्रत्रयात्मकं तृतीयं चक्रमित्यर्थः ॥७५-७६॥ ननु ३ त्रयाणां चक्राणा मेकैकप्रकारत्वं कथमिति ? उच्यते— “प्रत्येकमंशभेदेन सर्गस्थितिलयक्रमात्” इति संकेतपद्धत्युक्तरीत्या ४एकैकचक्रावयवत्रितयस्य सृष्टि- स्थितिसंहारभेदात् क्रोडीकारः५ । तद्यथा— चतुरस्रत्रयं सृष्टिसृष्टिः, षोडशदलपद्मं सृष्टिस्थितिः, अष्टदलपद्मं सृष्टिसंहारः । एवं चक्रत्रयमयं सृष्टिमयत्वादेकम् । एवं चतुर्दशारं स्थितिसृष्टिः बाह्यदशारं स्थिति-स्थितिः, अन्तर्दशारं स्थिति- संहारः । एवं चक्रत्रयं स्थितिमयत्वादेकम् । एवमष्टकोणं संहारसृष्टिः, त्रिकोणं संहारस्थितिः, बैन्दवं संहारसंहारः । एवं चक्रत्रयं संहारमयत्वादेकम्६ । इत्येतत् सर्वं मनसि निधायाह— श्रीचक्र की भावना के उक्त दो प्रकारों के बन जाने के बाद इन्हीं से लगे हुए अष्टदल और षोडशदल कमलों से संयुक्त चतुरस्रत्रय से इस भावना का तीसरा प्रकार पूरा होता है ॥ ७५-७६॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि तीन-तीन चक्रों को मिलाकर एक-एक प्रकार कैसे बन सकता है ? इसका उत्तर यह है कि १संकेतपद्धति के अनुसार सृष्टि, स्थिति और संहार के भेद से प्रत्येक चक्र के तीन-तीन अंश बन जाते हैं । इस तरह से प्रत्येक चक्र के सृष्टि, स्थिति और संहार नामक अवयवों को मिलाकर उक्त त्रिविध भावना की जाती है । जैसे कि चतुरस्रत्रय सृष्टि-सृष्टि, षोडश दल सृष्टि-स्थिति और अष्टदल सृष्टि-संहार का प्रतीक है । इस तरह से ये तीनों चक्र सृष्टिमय होने से एक ही मान लिये जाते हैं । इसी तरह से चतुर्दशार स्थिति-सृष्टि, बाह्यदशार स्थिति-स्थिति और अन्तर्दशार स्थिति-संहार दशा वाला है । इस प्रकार ये तीन चक्र भी स्थितिमयता के आधार पर एक हैं । इसी तरह से अष्टकोण संहार-सृष्टि, त्रिकोण संहार-स्थिति और बैन्दव चक्र संहार-संहार दशा वाला है । इस तरह से ये तीन चक्र अपनी संहारमयता के आधार पर एक हैं । आगे भगवान् १. अत्यन्तमव्यवहितम्-ने. ज. झ. उ. । २. 'षोडश....त्रयात्मकं' इत्यस्य स्थाने 'चतुरस्रत्रयोपेतं चक्रत्रयोपेतं चक्रत्रयात्मकं' इति पाठः-ग. ने. ज. उ. । ३. 'ननु.... रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ४. एकेन चक्रावयवत्रितयस्य प्रत्येकस्य-ने. ज. झ. उ. । ५. कारतः-ने. ज. झ. उ. । ६. इतः परम्-'बैन्दवं चक्रमारभ्य चतुरस्रान्तोद्धारः सृष्टि- रित्यर्थः' इति सार्वत्रिकः पाठोऽत्रानावश्यकः, अग्रे विद्यमानत्वात् । I. इस विशिष्ट ग्रन्थ का परिचय नित्या. षो., उपो. पृ. ४६-४७ से तथा लुप्ता. भा. २, पृ. ७३ से प्राप्त करना चाहिये । लगता है भास्करराय के समय में भी यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं था । इस ग्रन्थ के कुछ वचनों की भास्करराय ने नित्या. षो. पंचम पटल का अंश मानकर व्याख्या की है ।
९४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः चक्रस्य त्रिप्रकारत्वं कथितं परमेश्वरि । स्पष्टम् । ननु चक्रस्य त्रैविध्यमुक्तं यदि तर्हीदं चक्रं मध्यचक्रमारभ्य किमुत्पादयितुं न शक्यत इत्यत आह— सृष्टिः स्यान्नवयोन्यादिपृथ्व्यन्तं संहृतिः पुनः ॥७७॥ पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तमिति शास्त्रस्य निर्णयः । अत्र नवयोनिशब्देन ^२नवयोन्यन्तर्गतं बैन्दवं चक्रं लक्ष्यते । ^३तद् बैन्दवं चक्र- मारभ्य चतुरस्रान्तोद्धारः सृष्टिः । संहृतिः पुनः पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तमिति । तथा च चतुरस्रत्रयमारभ्य बैन्दवान्तमुद्धारः संहार इत्यर्थः । इति चतुःशतीशास्त्रस्य शिव कहते हैं कि इसी विभाग को मन में रखकर मैंने श्रीचक्र की त्रिविध भावना का प्रकार बताया है— हे परमेश्वरि ! इस तरह से मैंने चक्र की त्रिविध भावना का कथन किया है ॥७७॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥७७॥ ऊपर चक्र की त्रिविधता का वर्णन है तथा चतुरस्र चक्र से इसका प्रारंभ बताया गया है । उसके स्थान पर किसी बीच के चक्र से भी इसकी भावना की जा सकती है, अतः इस विषय में शास्त्र की व्यवस्था बताई जा रही है— नवयोनि से चतुरस्र पर्यन्त चक्र का उद्धार सृष्टिक्रम और चतुरस्र से नव- योनि पर्यन्त उद्धार संहारक्रम कहलाता है, शास्त्र का यही निर्णय है ॥७७-७८॥ यहाँ नवयोनि शब्द से तदन्तर्गत बैन्दव चक्र का ग्रहण किया जाता है । इस बैन्दव चक्र से चतुरस्र पर्यन्त चक्र का उद्धार सृष्टिक्रम कहलाता है और चतुरस्रत्रय से बैन्दव चक्र पर्यन्त उद्धार संहारक्रम के अन्तर्गत आता है । यह ^१चतुःशतीशास्त्र का निर्णय १. सृष्टिस्थं-ख. ग. च. छ. ज. झ. ड. । २. 'नव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'तद् बैन्दवं''''सृष्टिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । १. नित्याषोडशिकार्णव को अमृतानन्द चतुःशतीशास्त्र के नाम से उद्धृत करते हैं । शिवानन्द के अनुसार इसमें पूरे चार सौ श्लोक हैं । वहाँ प्रथमतः (१।२९-४१) सृष्टि- क्रम के अनुसार तथा बाद में (१।५९-७१) संहारक्रम के अनुसार श्रीचक्र का उद्धार बताया गया है । यहाँ अमृतानन्द का कहना है कि चतुःशतीशास्त्र में सृष्टिक्रम और संहारक्रम से श्रीचक्र का उद्धार बताया गया है, अतः इन दो क्रमों के अतिरिक्त किसी तृतीय क्रम से श्रीचक्र की उपासना नहीं की जा सकती । भास्करराय के अनुसार नित्या- षोडशिकार्णव के १।४२ श्लोक में इस विषय की चर्चा हुई है । इस प्रसंग में यह अवधेय है कि संहारक्रम के उद्धारक श्लोक जयरथ अथवा विद्यानन्द की व्याख्या में उपलब्ध नहीं हैं । नित्या. उपो. पृ० ९-११ में इस विषय की विस्तृत चर्चा की गई है ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९५ निर्णयः । अतो न ¹मध्यमादिचक्रमुद्धारयतीति तात्पर्यम् । यथा देवदत्तविष्णुमित्र- यज्ञदत्तेषु प्रस्तुतेषु देवदत्तयज्ञदत्तयोः फलानि देयानीत्युक्ते विष्णुमित्रस्य न देया- नीति गम्यते, तद्वत्² ॥७७-७८॥ पूर्वं श्रीक्रममवयवशो विभज्य वासनामुक्त्वेदानीं समष्टिचक्रस्य वासनामाह— एतत्समष्टिरूपं तु त्रिपुराचक्रमुच्यते ॥७८॥ एतत्समष्टिरूपं सृष्ट्यादित्रितयं समष्टिनम । अवयवी तु तथा न भवति, सृष्टि- पदेन स्थितिपदेन संहारपदेनापि च नाभिधीयते, किन्तु ³त्रिपुराचक्रमुच्यते । त्रिपु- रायाः सृष्ट्यादिभ्यः पुरा विद्यमानत्वात् तत्पदा⁴भिधेयाया अनाद्यन्तरूपायाः स्वसं- विदश्चक्रमाविर्भावभूमिरित्युच्यते । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"वशिन्योऽष्टौ सान्त- रालम्" इत्यादिना "अनाख्या सर्वगा ततः" इत्यन्तेन ॥७८॥ है । इसलिये उक्त दो क्रमों के अतिरिक्त किसी बीच के चक्र से श्रीचक्र का उद्धार नहीं किया जा सकता । जैसे देवदत्त, विष्णुमित्र और यज्ञदत्त की उपस्थिति में कोई कहे कि देवदत्त और यज्ञदत्त को फल दो, तो इससे यह निकलता है कि विष्णुमित्र को फल नहीं देना है, उसी तरह से चक्र के उद्धार की दो विधियों के बताने से यह निकलता है कि इनसे भिन्न कोई तीसरी विधि नहीं है ॥७७-७८॥ ऊपर श्रीचक्र को तीन अवयवों में विभक्त कर उसकी भावना का प्रकार बताया गया है, अब पूरे चक्र को एक साथ भावना करने की विधि बताई जा रही है— सृष्टि आदि तीनों विभागों को एक साथ मिला देने पर त्रिपुराचक्र परि- पूर्ण कहलाता है ॥७८॥ समष्टि शब्द का अर्थ है सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र की एकाकारता । अवयवशः यह चक्र सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के नाम से जाना जाता है, किन्तु इन सब रूपों के एक साथ मिल जाने पर ऊपर वाला विभाग भी समाप्त हो जाता है। उस समय समष्टिभूत यह अवयवी चक्र उक्त तीनों अलग-अलग नामों से अभिहित न होकर केवल त्रिपुरा चक्र के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरा चक्र का अर्थ है—सृष्टि आदि तीन अवस्थाओं से पहले विद्यमान, अनादि और अनन्त स्वरूपवाली संवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा का आविर्भावक चक्र। संकेतपद्धति के कुछ श्लोकों में इन व्यष्टि और समष्टि १. मध्यमारभ्य चतुःशतीशास्त्रस्य चक्रोद्धार इति-ख. ग. । २. 'तद्वत्' नास्ति-ख. ने. झ. । ३. 'किन्तु' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. । ४. नभिसन्धेयायाः-ख. ने. ज.
९६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः ननु स्वसंविद्रूपा त्रिपुरैव सा ज्ञायताम्, किमेतेन चक्रवासनालक्षणेन बक- बन्धनप्रयासेनेत्यत आह— यस्य विज्ञानमात्रेण त्रिपुराज्ञानवान् भवेत् । यस्य विज्ञानमात्रेण यस्मिन् विज्ञात एव, त्रिपुराचक्रज्ञानमात्रेण त्रिपुराज्ञान- वान् ज्ञाता भवेत् । कोऽर्थः ? १शुद्धाया निराकारमूर्तेस्त्रिपुराया ज्ञानमशक्यम् । अत एवोक्तरीत्यैव एतच्चक्रवासनया२ तन्मध्ये ३बैन्दवचक्रे क्रोडीकृता सा ज्ञातुं शक्येत्यर्थः । तदुक्तमभियुक्तैः— चक्रों का स्वरूप प्रदर्शित हैं । १ऋजुविमर्शिनी और अर्थरत्नावली (नि. पो. पृ. ६५-६६) में इस विषय को देखना चाहिये ।।७८।। अब प्रश्न उठता है कि जब श्रीचक्र में त्रिपुरा का निवास है, तो हम स्वसंवित्- स्वरूपिणी त्रिपुरा को जानने का ही प्रयास क्यों न करें, बगुले को पकड़ने के प्रयास सरीखे इस चक्र-वासना के चक्कर में पड़ने से क्या लाभ है ? इसका उत्तर आगे देते हैं— इस त्रिपुरा भगवती के चक्र को सही तरह से जान लेने वाले व्यक्ति को त्रिपुरा का ज्ञान अपने आप हो जाता है ॥७९॥ जिसके जान लेने पर, अर्थात् ऊपर वर्णित विविध वासनाओं के माध्यम से इस श्रीचक्र के स्वरूप को ठीक तरह से समझ लेने पर साधक त्रिपुरा के स्वरूप का ज्ञाता हो जाता है । इसका भाव यह है कि शुद्ध निराकार स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा को समझ पाना कठिन है । इसीलिये ऊपर बताई गई विविध वासनाओं के सहारे इस श्रीचक्र के मध्य में विराजमान बैन्दव चक्र में अपने स्वरूप को छिपा कर बैठी हुई भगवती को जाना जा सकता है, जैसा कि सुभगोदयवासनाकार२ शिवानन्द ने कहा है— १. शुद्धनिरा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. नायास्त-ने. झ. उ. । ३. बैन्दवे क्रोडी- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । १. इस प्रसंग में ऋजुविमर्शिनीकार ने संकेतपद्धति के तीन श्लोक उद्धृत किये हैं । उनमें सृष्टि, स्थिति और संहार चक्र के निरूपण के बाद चतुर्थ अनाख्या चक्र की चर्चा की गई है । दीपिका में तृतीय श्लोक के प्रारंभ और अन्त का कुछ अंश मात्र उद्धृत है । इसमें अष्टकोण, त्रिकोण और बिन्दुचक्र की संहारात्मकता का तथा सम्पूर्ण चक्र की अनाख्यता का उल्लेख है । अर्थरत्नावली में उद्धृत वचनों में यह विषय भिन्न पद्धति से वर्णित है । २. इस ग्रन्थ का परिचय पृ. ७१ की पहली टिप्पणी में दिया जा चुका है ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९७ घृतकाठिन्यवच्चक्रमहायोनौ चिदम्बरम् । द्रुतहेमघनीभावमिव ¹मूर्तीकरोम्यहम् ॥ (सु० वा० ३६) इति । चक्रस्य पूर्वमुद्दिष्टं नवधात्वमिदानीं वक्तुं प्रतिजानीते— चक्रस्य नवधात्वं च कथयामि तव प्रिये ॥७९॥ यतः प्रियतमाऽसि त्वम्, अतो रहस्यमपि कथयामीत्यर्थः ॥७९॥ इदानीं नवधा²त्वमेवाह— आदिमं भूत्रयेण स्याद् द्वितीयं षोडशारकम् । अन्यदष्टदलं प्रोक्तं मनुकोणमनन्तरम् ॥८०॥ पञ्चमं दशकोणं स्यात् षष्ठं चापि दशारकम् । सप्तमं वसुकोणं स्यान्मध्यँत्र्यस्रमथाष्टमम् ॥८१॥ नवमं त्र्यस्रमध्यं स्यात् मैं चक्र की महायोनि में, अर्थात् बैन्दव चक्र में, जमे हुये घृत के¹ समान घनीभूत स्वरूप वाली संवित्कला का पिघले हुए सुवर्ण के घनीभूत स्वरूप-सदृश कान्ति वाली चिदम्बर की मूर्ति बना कर ध्यान करता हूँ ॥७९॥ चक्र की त्रिविध भावना के उपदेश के बाद अब पूर्वसूचित नवविध भावना का वर्णन करते हैं— हे प्रिये, अब मैं चक्र की नवविध भावना को कहता हूँ ॥७९॥ तुम मेरी प्रियतमा हो, अतः इस रहस्य को भी अब मैं तुम्हारे सामने खोल रहा हूँ ॥७९॥ अब चक्र की नवविधता का वर्णन किया जाता है— चतुरस्र त्रय से पहला प्रकार बनता है, षोडशार से दूसरा, अष्टदल से तीसरा, चतुर्दशार से चौथा, बाह्यदशार से पांचवां, अन्तर्दशार से छठा, अष्ट- कोण से सातवाँ, मध्यत्र्यस्र (मध्य त्रिकोण) से आठवाँ और त्र्यस्रमध्य (त्रिकोण मध्यगत बिन्दु) से नवाँ प्रकार बनता है ॥८०-८२॥ १. मूर्तिमिति सार्वत्रिकः पाठः । २. धात्वमाह–ख. ग. नै. ज. झ. उ. । ३. मध्यं– च. छ. ज. झ. ।
- प्रस्तुत श्लोक में संवित्कला के स्वरूप की घनीभूत घृत से तथा चिदम्बर मूर्ति की पिघले हुए सुवर्ण के घनीभूत स्वरूप से तुलना की गई है । इससे संवित्कला के घृत सदृश कोमल दयार्द्र स्वरूप की तथा चिदम्बर मूर्ति के तप्त हेमसदृश स्वरूप के आवाहन के बाद उसके निष्कल और सकल स्वरूप के ध्यान की विधि बताई गई है । ७
९८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः भूत्रयेण चतुरस्रत्रयेण। मनुकोणं चतुर्दशारम्। वसुकोणम् अष्टकोणम्। स्पष्टमन्यत् ॥८०-८२॥ उक्तानां नवचक्राणां नामान्याह— तेषां नामान्यतः शृणु। त्रैलोक्यमोहनं चक्रं सर्वाशापरिपूरकम् ॥८२॥ सर्वसंक्षोभणं गौरि सर्वसौभाग्यदायकम्। सर्वार्थसाधकं चक्रं सर्वरक्षाकरं परम् ॥८३॥ सर्वरोगहरं देवि सर्वसिद्धिप्रदं तथा। सर्वानन्दमयं चापि नवमं शृणु सुन्दरि ॥८४॥ त्रैलोक्यमोहनम्। लोक्यत इति लोकः, लोक्यतेऽनेनेति लोकः, लोकयतीति लोक इति कर्मकरणकर्तृव्युत्पत्त्या मेयमानमातृलक्षणं त्रैलोक्यम्, तस्य मोहनं तिरोधायकमद्वैतप्रतीत्युत्पादनेन। सर्वाशापरिपूरकम्। आशा नाम अतृप्तस्य भूत्रय चतुरस्रत्रय को कहते हैं। ^१मनुकोण चतुर्दशार को और वसुकोण अष्टकोण को कहते हैं। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥८०-८२॥ उक्त नवचक्रों के नाम बताते हैं— अब उनके नाम सुनो। त्रैलोक्यमोहन चक्र पहला और सर्वाशापरिपूरक चक्र दूसरा है। हे गौरि! सर्वसंक्षोभण चक्र तीसरा, सर्वसौभाग्यदायक चौथा, सर्वार्थ- साधक चक्र पांचवाँ और सर्वरक्षाकर छठा चक्र है। हे देवि! सातवें चक्र का नाम सर्वरोगहर और आठवें का नाम सर्वसिद्धिप्रद है। हे सुन्दरि! तुम सुनो कि नवें चक्र का नाम सर्वानन्दमय है ॥८२-८४॥ १. त्रैलोक्यमोहन शब्द में जो लोक शब्द है, उसकी कर्म, करण और कर्ता के अर्थ में त्रिविध व्युत्पत्ति की जाती है—जो देखा जाता है, जिससे देखते हैं और जो देखता है। इनसे क्रमशः मेय, मान और माता का ग्रहण होता है। इन तीनों के समाहार का नाम त्रैलोक्य है। यह चक्र इस त्रैलोक्य का मोहन करने वाला है, अद्वैत दृष्टि को उत्पन्न कर यह चक्र इस त्रैलोक्य को तिरोहित कर देता है। २. सर्वाशापरिपूरक पद में विद्य- १. चतुर्दशकोणं स्पष्ट-ख. ग. ज. झ. उ.। २. सर्वक्षोभकरं-ख. ग. च. छ. झ. उ.। ३. देवि-झ. उ.।
- पुराणों में एक कल्प में १४ मनुओं की स्थिति मानी जाती है, अतः मनुकोण शब्द से यहाँ चतुर्दश कोणात्मक चतुर्दशार चक्र गृहीत होता है। इसी तरह से वसु देवों की आठ संख्या के आधार पर वसुकोण शब्द अष्टकोण का वाचक है।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९९ पदार्थान्तरेषु स्पृहा, तस्याः सर्वस्याः स्पृहायाः परिपूरकं नित्यपरिपूर्णतृप्तिलक्षण- परमशिवसामरस्यप्रतिपादनेन । १सर्वसंक्षोभणम् । सर्वस्य क्षित्यादेः शिवान्तस्यो- र्युपरि तत्त्वक्रमेण २संक्षोभः, तस्य संहारलक्षणस्य कारकम्, भेदप्रपञ्चलयरूप- त्वात् । सर्वसौभाग्यदायकम् । सर्वसौभाग्यं सर्वस्पृहणीयता, तस्या दायकम्, सर्वस्पृहणीयपरप्रेमास्पदपरशिवैक्यप्रतिपादनेन । सर्वार्थसाधकम् । सर्वेषां वैदिकानां तान्त्रियाणां ३क्रियाणामर्थः प्रयोजनं परशिवप्राप्तिः, तदुक्तं महाकविभिः— बहुधा ह्यागमैर्भिन्नाः पन्थानः सिद्धिहेतवः । त्वय्येव निपतन्त्योघा जाह्नवीया इवार्णवे ॥ (रघु० १०।२६) इति । तत्साधयति । सर्वरक्षाकरम् । रक्षा नाम प्रतिकूलपदार्थादुपहतिपरिहारः । षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं सर्वमेव प्रतिकूलपदार्थः, तस्मात् सर्वस्माद् रक्षां शिवाहमभाव- भावनालक्षणां करोति । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— मान आशा शब्द का अर्थ है अतृप्त मन का नाना प्रकार के पदार्थों की प्राप्ति के लिये टकटकी लगाये रखना । इस तरह की सभी अभिलाषाओं की पूर्ति यह चक्र कर देता है, क्योंकि यह अपने उपासक को नित्य परिपूर्णतृप्ति से ओतप्रोत परमशिव के साथ एकरस कर देता है । ३. संहार दशा में पृथिवी से शिवपर्यन्त तत्त्वों का एक दूसरे में लय हो जाता है । सब तत्त्वों के संहारात्मक क्षोभ को करने वाला यह सर्वसंक्षोभण चक्र अपने साधक की समस्त भेददृष्टि का विलय कर देता है । ४. सबके द्वारा स्पृहणीय वस्तु को सर्वसौभाग्य कहते हैं। यह सर्वसौभाग्यदायक चक्र सभी के द्वारा अभिलषणीय परम प्रेम के स्थान परम शिव के साथ साधक को एकता प्रदान कर देता है । ५. सभी वैदिक और तान्त्रिक क्रियाकलाप का एक ही प्रयोजन है—परमशिव की प्राप्ति । जैसा कि महाकवि कालिदास ने कहा है— नाना प्रकार के शास्त्रों में पुरुषार्थ के साधक अनेक उपाय बताये गये हैं । किन्तु जैसे सभी नदियों का जल लेकर गंगा अन्ततः समुद्र में मिल जाती है, उसी तरह से इन सब उपायों से व्यक्ति अन्ततः आपके पास ही पहुँचता है ॥ इस प्रयोजन की सिद्धि करने वाला है सर्वार्थसाधक चक्र । (६) सर्वरक्षाकर चक्र सभी प्रकार के प्रतिकूल पदार्थों के सम्पर्क से होने वाले कष्ट से साधक को बचाता है । ३६ तत्त्वात्मक यह सारा जगत् प्रतिकूल पदार्थ है । इन सब में शिवाहंभाव की भावना का प्रसार कर यह चक्र उनके विपरीत प्रभाव से साधक की रक्षा करता है । अर्थात् सभी पदार्थों में शिव विराजमान हैं और मैं भी उस शिव से भिन्न नहीं हूँ, इस प्रकार के ज्ञान का उदय हो जाने पर साधक जगत् में सभी प्रकार के प्रतिकूल पदार्थों से सुरक्षित हो जाता है । परापंचाशिका में बताया गया है— १. सर्वक्षोभकरं-ख. ग. ज. झ. उ. । २. क्षोभस्य सं-ख. ग. ज. झ. । ३. क्रियाणामर्थः-ग. ज. ।
१०० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः अहमि प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः । पराक्रमपरो भुङ्क्ते स्वभावमशिवापहम् ॥ (श्लो० ५०) इति । सर्वरोगहरम् । भेदलक्षणं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं सर्वमेव रोगः, तस्य हरम्, अभेदप्रतीतिहेतुत्वात् । अत्रैवोक्तम्- "विकल्परूपरोगाणां हारिणी खेचरी परा" (१।८६) इति । सर्वसिद्धिमयम् । सर्वस्य सिद्धिरुत्पत्तिः स्थितिः संहारश्च, तन्मयम्, त्रिकोणस्य सर्वसृष्टिस्थितिसंहारहेतुत्वात् । तदुक्तं¹ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये- "चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः" (सू० १) इति । सर्वानन्दमयम् । शिवशक्तिलक्षणप्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपत्वात् । अत्र सर्वत्र प्रवृत्तिनिमित्तभेदादद्वैतविश्रान्तिरेव परमार्थः ॥८२-८४॥ पूर्वोक्तवासनाचक्रस्य प्रयोजनमाह— अत्र पूज्या महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी । इदन्तारूपी प्रतियोगी (शत्रु) का अहन्ता में विलय करने के प्रयास में लगा साधक अन्ततः सभी प्रकार के अमंगल का नाश कर देने वाले अपने शिवस्वभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ (७) परस्पर भिन्न ३६ तत्त्व वाला यह सारा संसार ही एक रोग है । सर्वरोगहर चक्र परस्पर की भेद दृष्टि को मिटाकर सबमें अभेद प्रतीति को जगाकर सभी रोगों के निदानभूत इस मूल रोग को ही मिटा देता है । अभी (१।६८) मुद्रा के प्रकरण में भी बताया गया है कि "खेचरी मुद्रा सारे विकल्पात्मक रोगों का नाश करने वाली है।" (८) सर्वसिद्धिमय का अर्थ है सारे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाला । त्रिकोण चक्र ही सबकी सृष्टि आदि का कारण है । प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है कि "चिति शक्ति ही विश्व की सिद्धि में कारण है"। (९) शिव और शक्ति की, प्रकाश और विमर्श की समरसभाव से स्थिति सर्वानन्दमय चक्र में रहती है । इस तरह से यह चक्र सभी प्रकार के आनन्दों से ओतप्रोत है । ऊपर सभी नौ चक्रों के नामों की वासना बताई गई है । इन सबमें शब्दों की भिन्नता भले ही हो, किन्तु सबका वास्तविक अर्थ अद्वय शिवतत्त्व में विश्रान्ति प्राप्त करना ही है ॥८२-८४॥ ऊपर चक्र की जो त्रिविध और नवविध वासना बताई गई है, अब उसका प्रयोजन बताते हैं— इस तरह से त्रिविध और नवविध वासना के द्वारा भावित श्रीचक्र में महा- देवी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा करनी चाहिये ॥८५॥ १. क्तमीश्वरप्रत्यभिज्ञीयम्—ख.। विहार्थं सर्वत्र
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०१ महादेवी। महती देशकालाकारैरनाकलितत्वात्, द्योतनादिति देवी, देवी- पदाभिधेया विमर्शरूपा। अत्र "त्रिधा च नवधा च" (१।७२) इति पूर्वोक्तवासना- चक्रे। महात्रिपुरसुन्दरी। महती अनावरणा चिद्रूपिणी, त्रिपुरा १तुर्यरूपत्वात्, सुन्दरी स्वस्वात्मतया २सर्वस्य स्पृहणीयत्वात्। एवं विद्या स्वसंविद्देवता पूज्या वक्ष्यमाण(३।२-४)परादित्रिविधरूपया पूजया भावनीया। त्रैलोक्यमोहनादिनवचक्राणां स्वस्वनामानु३रूपार्थवासनालक्षणफलान्युक्त्वे- दानीं समष्टिचक्रस्य फलमाह— परिपूर्णं महाचक्रमजरामरकारकम् ॥८५॥ परिपूर्णं ४नवचक्रसमष्टिरूपं महायोनि५मध्यमहाबिन्दु६चक्रस्फुरत्प्रकाशविमर्श- सामरस्यरूपपराप्रभापटलमयसर्वानन्दमयं ७सर्वावरणसमग्रं च महाचक्रम्। विश्व- महात्रिपुरसुन्दरी महादेवी इसलिये है कि यह देश, काल और आकार से अनाकलित है, अस्पृष्ट होने से महान् है और प्रकाशमान होने से विमर्शस्वरूपिणी देवी है। "त्रिधा च नवधा च" (१।७२) इत्यादि श्लोकों के द्वारा जिस चक्र की त्रिधा और नवधा भावना विधि का वर्णन किया गया है, उसी चक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा करनी चाहिये। यह देवी निरावरण चित्स्वरूपिणी है, इसका चित्स्वरूप सदा प्रकाशमान है, इसको कोई आवृत नहीं कर सकता, इसलिये यह महान् है। यह तुरीयस्वरूप वाली है, अतः त्रिपुरा है, तीन-तीन संख्या वाली सभी वस्तुओं को पैदा करने वाली होने से उनसे पहले विद्यमान है। यह सुन्दरी इसलिये है कि अपनी आत्मा के समान इसका स्वरूप सबको स्पृहणीय है, सभी साधक इस स्वरूप को प्राप्त करना चाहते हैं। इन विशेषणों वाली अपनी ही संवित्ति (ज्ञान) में भासित हो रही इस देवता की आगे (३।२-४) बताई गई परा, अपरा, परापरा नामक पूजा के त्रिविध प्रकारों से उपासना करनी चाहिये। त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों का अपने नाम के अनुरूप अर्थ बताने से उनकी भावना का फल भी बता दिया गया है। अब समष्टि (सम्पूर्ण) चक्र की भावना का फल बताते हैं— नवचक्रसमष्टिस्वरूप इस परिपूर्ण चक्र की भावना करने से साधक अजर और अमर हो जाता है ॥८५॥ परिपूर्ण महाचक्र का अर्थ है नवचक्रसमष्टि स्वरूप महायोनि (मध्यत्रिकोण) के मध्य में विराजमान बिन्दुचक्र। इसी सर्वानन्दमय चक्र में विराजमान प्रकाश और विमर्श १. तुरीय-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. सर्वस्पृह-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ३. रूप- लक्षणफला-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ४. 'नवचक्रसमष्टिरूपं' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। ५. 'मध्य' नास्ति-ख. ने.। ६. 'चक्र' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. 'सर्वा- वरणसमग्रं च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.।
१०२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः मयविश्वोत्तीर्णपरामयत्वाद् अजरामरकारकम् । अजरः कालत्रयातीतत्वात्, ^१अत एवामर उत्पत्तिविनाशरहितत्वात्, अजरामरः ^२परमशिवः । ^३कारकं स्वपूज- कस्य ^४कालत्रयातीतोत्पत्तिविनाशरहितनित्यपरशिवत्वप्राप्तिलक्षणं मोक्षं करोती- त्यर्थः ॥८५॥ चक्रसंकेतमुपसंहरति— एवमेष महाचक्रसंकेतः परमेश्वरि । कथितस्त्रिपुरादेव्या जीवन्मुक्तिप्रवर्तकैः^५ ॥८६॥ एवम् उक्तप्रकारेण । त्रिपुरादेव्याः पूर्वोक्त(१।६)लक्षणायाः । महाचक्रसंकेतः षट्-त्रिंशत्तत्त्वचक्ररूपत्वान्महाचक्रम्। जीवतो मुक्तिः जीवन्मुक्तिः । मुक्तिर्हि बन्धना- ^६दुद्धन्धनं घृणादिपाशाष्टकेन । ^७कोऽर्थः ? परशिवादित्वगुरुपरदेवताधिगतपर- के सामरस्य स्वरूप के परम तेजोमय प्रभापटल से अन्य सभी चक्रों और आवरण- देवताओं का प्रकाश चारों तरफ़ फैलता है। इस तरह से यह महाचक्र मूलदेवता और आवरण देवताओं के प्रकाश से परिपूर्ण हो जाता है। विश्वमय और विश्वोत्तीर्ण दोनों स्वरूपों से संयुक्त होने से यह पराशक्तिमय चक्र अजरता और अमरता को प्रदान करने वाला है। तीनों कालों से अतीत होने से अजर और उत्पत्ति तथा विनाश से रहित होने से अमर वस्तुतः परम शिव ही है। यह चक्र अपनी पूजा करने वाले साधक को तीनों कालों से अतीत और उत्पत्ति-विनाश से रहित नित्य परमशिव पद (मोक्ष) को प्राप्त करा देता है ॥८५॥ अब चक्रसंकेत प्रकरण का उपसंहार करते हैं— हे परमेश्वरि ! इस तरह से मैंने तुमको जीवन्मुक्ति प्रदान करने वाले इस चक्रसंकेत प्रकरण का उपदेश किया है ॥८६॥ ऊपर बताई गई विधि से पूर्वोक्त लक्षण वाली त्रिपुरा देवी का यह महाचक्रसंकेत साधक को इसी जीवन में मुक्ति प्रदान कर देता है। श्रीचक्र को महाचक्र यहाँ इसलिये कहा गया है कि यह चक्र ही ३६ तत्त्वों के महाचक्र का स्वरूप धारण करता है। मनुष्य घृणा आदि पूर्व वर्णित (१।७२) आठ पाशों से बँधा रहता है। यह महाचक्र साधक को इन बन्धनों से छुड़ा देता है। इसका अभिप्राय यह है कि परम शिव से लेकर १. अमरः, अत एवोत्पत्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'परम' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. 'कारकं' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. कालातीतनित्यपरशिवप्राप्ति- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. प्रदायकः-क. उ. । ६. नादामोचनं-उ. । ७. 'कोऽर्थः' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. उ.
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०३ सार्थश्चक्रसंकेतकः स्वपरामर्शकस्य हठादेव सकलपाशविनाशनेन शिवाहमभाव- भावनां प्रवर्तयतीत्यर्थः ॥८६॥ इति श्रीपरमयोगीन्द्रपरमहंसपुण्यानन्दशिष्यपरमहंसामृतानन्द- योगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदयदीपिकायां चक्रसंकेतः प्रथमः ॥ ● अपने गुरु पर्यन्त चली आ रही परदेवतामय गुरुपरम्परा से इस चक्रसंकेत प्रकरण का वास्तविक अभिप्राय समझ कर और उस पर अमल कर साधक अनायास ही ऊपर बताए गये पाशों से मुक्त हो जाता है और अपने भीतर इस बात का अनुभव करने लगता है कि मैं तो शिव ही हूँ ॥८६॥ इस तरह से परमयोगीन्द्र परमहंस पुण्यानन्द के शिष्य परमहंस अमृतानन्द योगिप्रवर विरचित योगिनीहृदयदीपिका का यह पहला चक्रसंकेत प्रकरण पूरा हुआ ॥१॥ ●
मन्त्रसंकेतो द्वितीयः १अथ द्वितीयं मन्त्रसंकेतं श्रोतॄजनप्रवृत्तये फलप्रतिपादनपूर्वकं वक्तुं प्रतिजानीते— मन्त्रसंकेतं दिव्यमधुना कथयामि ते । यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत् ॥१॥ दिव्यं प्रकाशविमर्शरूपपरशिवपराशक्तिप्रतिपादनपरत्वात् । मन्त्रसंकेतकम् । मननात् त्रायन्ते साधकमिति मन्त्राश्चिन्मरीचयः । तद्वाचकत्वाद् वैखरीवर्णविलास- भूतानां सौभाग्यविद्यादीनां मननत्राणता । तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"मननात् त्राण- धर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः" इति । संकेतकं२ पूर्वोक्त(१।६)लक्षणम् । ३अधुना कथयामीति । प्रकाशात्मकोऽहं ते विमर्शरूपिण्याः कथयामि, हृदयङ्गमतां नयामी- त्यर्थः । यद्वेत्ता यस्य मन्त्रसंकेतस्य४ वेत्ता ज्ञाता । त्रिपुराकारो वेदनसपरि- स्फुरत्परशिवभट्टारकः । वीरचक्रेश्वरो भवेत् । वीराः पूर्वोक्त(१।६५)लक्षणाः, तेषां अब द्वितीय मन्त्रसंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है । श्रोतागण इस ओर प्रवृत्त हों, इसके लिये इसकी फलश्रुति भी यहाँ दी जा रही है— अब मैं दिव्य मन्त्रसंकेत प्रकरण का तुम्हें उपदेश कर रहा हूँ । इसको जानने वाला वीरचक्र का स्वामी त्रिपुरास्वरूप हो जाता है ॥१॥ मन्त्रसंकेत दिव्य इसलिये है कि यहाँ प्रकाश-विमर्श स्वरूप परमशिव और पराशक्ति का प्रतिपादन किया गया है । मन्त्र शब्द का अर्थ है अपना मनन करने वाले साधक की रक्षा करने वाली चिच्छक्ति की किरणें । सौभाग्यविद्या प्रभृति मन्त्रों के वाचक वैखरी वाणी के विलास स्वरूप वर्णों में भी चिच्छक्ति का स्फुरण विद्यमान है । अतः इनमें भी मनन करने वाले का त्राण करने की शक्ति विद्यमान होने से ये मन्त्र कहलाते हैं । संकेत- पद्धति में कहा गया है—"मनन करने से त्राण (रक्षा) करता है, इसलिये इसको मन्त्र कहते हैं" । संकेतक शब्द का अर्थ पहले (१।६) बता दिया गया है । अब मैं मन्त्रसंकेत को कह रहा हूँ, मैं प्रकाशात्मक शिव तुम जैसी विमर्शरूपिणी देवी के हृदय में बैठा रहा हूँ । इस मन्त्रसंकेत का जानकार त्रिपुराकार हो जाता है, उसको सदा अपने परशिव- भट्टारक स्वरूप का भान होने लगता है । वह वीरचक्रेश्वर हो जाता है । वीर का लक्षण पहले (१।६५) बताया जा चुका है, उनका चक्र हुआ समूह । इस समूह का वह स्वामी १. 'अथ' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ. । २. संकेतं-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'अधुना कथयामि' नास्ति-ग. ने. ज. झ. उ. । ४. संकेतस्य-ख. ने. ज. झ. उ. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०५ चक्रं समूहः, तस्येश्वरः परशिवः । कोऽर्थः ? एतन्मन्त्रसंकेतप्रतिपादितश्रीविद्यादि- मन्त्ररहस्यभूतपरभावनाप्रणाशितमायाजालः परशिव एव भवेदित्यर्थः ॥१॥ ^२पूर्वोक्तत्रैलोक्यमोहनादिनवचक्रेश्वरीमन्त्रानेवोपक्रम्य मन्त्रसंकेतमारभते— करशुद्धिकरी त्वाद्या द्वितीया चात्मरक्षिका । आत्मासनगता ^३देवी तृतीया तदनन्तरम् ॥२॥ चक्रासनगता पश्चात् सर्वमन्त्रासनस्थिता । साध्यसिद्धासना षष्ठी मायालक्ष्मोमयी परा ॥३॥ हो जाता है, परशिवभावापन्न हो जाता है। इसका भाव यह है कि इस मन्त्रसंकेत प्रकरण में प्रतिपादित श्रीविद्या नामक मन्त्र के रहस्य को ठीक तरह से जानकर और उसकी उपासना कर साधक परशिव-स्वरूप हो जाता है, क्योंकि इस मन्त्र का मनन करने से उस पर छाया माया का जाल छिन्न-भिन्न हो जाता है ॥१॥ त्रैलोक्यमोहन प्रभृति नौ चक्रों का उल्लेख पहले (१।८२-८४) हो चुका है । इन नौ चक्रों की अधिष्ठात्री देवियों के मन्त्रों के उपक्रम के साथ अब मन्त्रसंकेत प्रकरण प्रारंभ होता है— ^१करशुद्धिकरी विद्या पहली, आत्मरक्षिका दूसरी और उसके बाद आत्मा- सनगता देवी तीसरी विद्या है। बाद में चक्रासनगता चौथी, सर्वमन्त्रासनस्थिता १. विद्यामन्त्रार्थभूतपरभावनाप्राशस्त्यशाली परशिव-ख. ग. ने. उ. । २. पूर्व- मनन्तरोक्तत्रैलोक्य-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. देवि-च. छ. ज. झ. । १. नित्याषोडशिकार्णव (१।९७-११८) में करशुद्धिकरी से लेकर मूलविद्या पर्यन्त आठ विद्याओं (मन्त्रों) का उद्धार बताया गया है। वहाँ उनका विनियोग साधक की कर- शुद्धि, आत्मरक्षा, स्वात्मासनशुद्धि, चक्रासनशुद्धि, मन्त्रासनशुद्धि, साध्यसिद्धासन(आवरण- देवतासन)शुद्धि तथा मूलदेवी के आवाहन एवं आराधन (पूजन) के लिये किया गया है । इन आठ विद्याओं का वहाँ उद्धार बता दिया गया है, अतः यहाँ (योगिनीहृदय में) केवल एक (सातवीं) विद्या का उद्धार किया गया है और इन नौ विद्याओं का विनियोग नौ चक्रों की अधिष्ठात्री त्रिपुरा प्रभृति नौ नित्याओं के विन्यास के लिये किया गया है। यहाँ यह स्मरणीय है कि नित्या. षो. की व्याख्या अर्थरत्नावली (पृ० १०७) में संकेतपद्धति के वचन के प्रमाण से आठ नित्याओं की ही चर्चा की गई है। नव नित्याओं का उल्लेख नित्या. षो. में कहीं नहीं मिलता। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि संकेतपद्धति की रचनाकार का दृष्टिकोण योगिनीहृदय के प्रभाव से बदल गया
१०६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः मूर्तिविद्या च सा देवी सप्तमी परिकीर्तिता । अष्टम्यावाहिनी विद्या नवमी भैरवी परा ॥४॥ करशुद्धिकरी— आत्मतत्त्वगतयोरशुद्धयोरत्र कर्मकरणात्मनोर्द्वयोः । शुद्धतत्त्वलयभावनामयी शुद्धिरात्मकरयोः परा मता ॥ (चि० ११) इत्यस्मदुक्तरीत्या कर्मेन्द्रियान्तःपातिनोः करयोरशुद्धतत्त्वान्तर्गतयोरशुद्धयोः शुद्धतत्त्वलयभावना शुद्धिः, तत्करीयं विद्या, पराहन्ताप्रतिपादनपरत्वात् । अत्रैव वक्ष्यति—"कर्मेन्द्रियाणां वैमल्यात् करशुद्धिकरी स्मृता" (३।१२५) इति । आद्या त्रैलोक्यमोहनचक्रेश्वरी १विद्येत्यर्थः । नन्वत्र करशुद्ध्यादिमन्त्राणां संख्यामेव करोति, किमिति नोद्धरति ? उच्यते, वामकेश्वरशास्त्र एवासामुद्धारः२, अत्र त्वज्ञातार्थप्रतिपादनपरत्वादस्य शास्त्रस्येति न मन्त्रोद्धारः क्रियत इति । द्वितीया पाँचवीं, साध्यसिद्धासना छठी और मूर्तिविद्या सातवीं है। माया, लक्ष्मी और पराबीज से इसका स्वरूप बनता है। आठवीं विद्या आवाहिनी और परा भैरवी नवीं विद्या है ॥ २-४॥ करशुद्धिकरी विद्या का स्वरूप स्वयं ग्रन्थकार ने अपने चिद्विलास स्तव में इस तरह से बताया है— साधक के अपने दोनों हाथों की गिनती कर्मेन्द्रिय में होती है, जो कि अशुद्ध आत्म- तत्त्व के अन्तर्गत आते हैं। इनकी शुद्ध शिवस्वरूप में लीन होने की भावना ही उत्कृष्ट शुद्धि मानी जाती है ॥ इस तरह से कर्मेन्द्रिय में गिने जाने वाले, अशुद्ध तत्त्व के अन्तर्गत स्थित होने से अशुद्ध हाथों की शुद्ध तत्त्व में लय की भावना को यहाँ शुद्धि कहा गया है । यह कर- शुद्धिकरी विद्या पराहन्ता का प्रतिपादन करके इस शुद्धि का संपादन करती है । आगे (३।१२५) यहीं बताया जायगा कि "कर्मेन्द्रियों की पवित्रता की संपादिनी यह विद्या करशुद्धिकरी नाम से जानी जाती है"। यह पहली विद्या पहले त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी है। यहाँ करशुद्धिकरी आदि विद्याओं की संख्या ही बताई गई है, उद्धार नहीं किया गया । इसका कारण यह है कि इनका उद्धार वामकेश्वर शास्त्र में ही कर दिया गया है । योगिनीहृदय शास्त्र का आरम्भ वामकेश्वर शास्त्र में अज्ञात विषयों के प्रति- पादन के लिये ही हुआ है, अतः पुनः उन विद्याओं के उद्धार की यहाँ आवश्यकता नहीं है । दूसरी विद्या आत्मरक्षिका है । चिद्विलास स्तव में स्वयं ग्रन्थकार ने बताया है— १. 'विद्या' नास्ति क. ख. ग. घ. पु.। २. 'उक्तः' इत्यधिकः ख.।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १०७ चात्मरक्षिका। "भेदलक्षणविपक्षसंकटोत्तारणं परमिहात्मरक्षणम्” (चि० ७) इत्यस्मदुक्तरीत्या भेदप्रपञ्चलक्षणप्रतिपक्ष²पराभवरूपसंकटाद् रक्षामभेदप्रतीतिरूपां पराहन्ताप्रतिपाद³नेनात्मनः करोतीत्यात्मरक्षिका द्वितीया सर्वाशापरिपूरकाख्य- द्वितीयचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। आत्मासनगता देवी⁴ तृतीया। "⁵आत्मचक्रमनुदेवता- त्मनामासनं शिवमयतवभासनम्” (चि० ४५) इत्यस्मदुक्तरीत्या साधकचक्रमन्त्र- देवतानां स्वसंविद्रूपतयाऽनुसन्धानलक्षणासनचतुष्टयविद्यानामादिभूताऽऽत्मासन- गता विद्या तृतीया सर्वसंक्षोभकर⁶लक्षणतृतीयचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। ⁷तदनन्तरं चक्रासनगता। तदनन्तरोक्तचक्रासनगता चतुर्थी विद्या सर्वसौभाग्यदायक लक्षण- चतुर्थचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः। पश्चात् सर्वमन्त्रासनस्थिता। अनन्तरोक्त⁸वासना- पूर्वोक्त(२।१ )लक्षणमननत्राणलक्षणचिन्मरीचिप्रसरेणाखिलावरणदेवतामन्त्रासन- "भेददृष्टि ही विपक्ष का संकट उपस्थित करती है, शत्रु का काम करती है। उस संकट से उबारना ही सबसे बड़ी आत्मरक्षा है”। इस तरह से भेददृष्टि-प्रधान इस संसाररूपी प्रपंच से, जो कि साधक के सामने पराजय का संकट उपस्थित कर देता है, अभेद प्रतीति रूप अद्वयदृष्टि प्रदान कर पराहन्ता का स्वरूप समझा कर यह विद्या उसकी रक्षा करती है। इसलिये यह दूसरी विद्या आत्मरक्षाकारी कहलाती है और दूसरे सर्वाशापरि- पूरक नामक चक्र की स्वामिनी है। आत्मासनगता देवी तीसरी विद्या है। चिद्विलास स्तव में ही बताया गया है-“आत्मा, चक्र, मनु (मन्त्र) और देवता इनकी आसन के रूप में भावना का अर्थ इनमें शिवमयंता की भावना करना है, अर्थात् ये चारों शिवमयं ही हैं”। इस तरह से साधक, चक्र, मन्त्र और देवता ये सभी आसन के रूप में भगवती संवित् के ही स्वरूप हैं। अतः इन चारों आसनों की विद्याओं में पहली और ऊपर बताए गये क्रम से तीसरी यह आत्मासनगता विद्या सर्वसंक्षोभकर नामक तीसरे चक्र की अधिष्ठात्री है। इसके आगे चक्रासनगता विद्या है। अभी बताये गये चार आसनों में से दूसरे चक्रासन में विराजमान यह चौथी विद्या सर्वसौभाग्यदायक नामक चतुर्थ चक्र की स्वामिनी है। इसके बाद सर्वमन्त्रासनस्थिता विद्या है। अभी मन्त्रासन की भावना चिद्विलास स्तव के प्रमाण से बताई है और पहले (२।१) मनन और त्राण करने वाली मन्त्रशक्ति की किरणों का उल्लेख किया गया है। इन किरणों का फैलाव समस्त १ संकटात्-मु.। २. 'पराभवरूप' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ३. नेन तथा-ने. ज., मेन वा-झ. उ. । ४. देवि-ज. झ. । ५. अष्ट'...'सा विमर्शमनयत् स्वभास-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. 'कर' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ७. अनन्तरं चक्रसंकेतोक्तचक्रासनयुक्ता विद्या-ख. ग. ने. उ. । ८. वासनामननत्राणचिन्म-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ९. प्रसरा-
१०८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः स्थिता पञ्चमी विद्या, सर्वार्थ^१साधकाभिधानलक्षणपञ्चमचक्रेश्वरी विद्येत्यर्थः । साध्यसिद्धासना षष्ठी । सर्वपीठनिवासिन्यः सर्वगाश्चिन्मरीचयः । भैरव्यो^२ भरिताकारा रक्षन्तु कुलमातरः ॥ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या ^३चिन्मरीचिमयपरिणतावरणदेवताः साध्याः ^४सृष्टिस्थाः सप्तसंख्याकत्रिकोणादिषोडशदलान्तचक्रपदगताश्चतुरस्रत्रयपदगताश्च देवताः सृष्टिक्रमरूपत्वात् साध्याः । तदुक्तमत्रैव—"सृष्टिः ^५स्यान्नवयोन्यादि- पृथ्व्यन्तम्" (१।७७) इति । साध्यास्ता एव संहृतिकाले सिद्धाश्चतुरस्रादिबेन्दवान्त- क्रमेणोपसंहृताः। तदुक्तमत्रैव—"संहृतिः पुनः पृथ्व्यादिनवयोन्यन्तम्" (१।७७-७८) इति । अत्र सिद्धिः संहारः । तदुक्तं^६ श्रीप्रत्यभिज्ञाहृदये—"चितिः स्वतन्त्रा विश्व- सिद्धिहेतुः" (सू० १) इति । एवं सृष्टिसंहारक्रमेणानुसन्धीयमानानां साध्य- आवरण देवताओं के मन्त्रासन तक हैं। इस तरह से यह पाँचवीं विद्या समस्त मन्त्रासनों में विराजमान है और सर्वार्थसाधक नाम के पाँचवें चक्र की अधिष्ठात्री देवी है। साध्य- सिद्धासना छठी विद्या है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति की उक्ति है— सभी पीठों में निवास करने वाली, सर्वत्र विचरण करने वाली, चिति शक्ति की किरणों से अभिव्यक्त परिपूर्ण स्वरूप वाली भैरवियाँ कुलदेवियाँ मेरी रक्षा करें ॥ इस तरह से चिति शक्ति की किरणें ही आवरण देवताओं का स्वरूप धारण कर लेती हैं। इन्हीं को यहाँ 'साध्य' नाम से कहा गया है। सृष्टि क्रम से त्रिकोण, वसुकोण, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, मनुकोण, अष्टदल और षोडश दल इन सात चक्रों में और चतुरस्रत्रय में विद्यमान देवता सृष्टिक्रम का प्रतिनिधित्व करने के कारण साध्य कहे जाते हैं। नवयोनि से पृथ्वी पर्यन्त चक्रक्रम की सृष्टि संज्ञा है, यह बात यहाँ पहले (१।७७) ही बता दी गई है। ये साध्य देवता ही संहार क्रम से चतुरस्र से बैन्दव पर्यन्त चक्र में स्थित होकर 'सिद्ध' कहलाते हैं। पृथ्वी से नवयोनि पर्यन्त चक्र-क्रम की संहार संज्ञा है, यह भी पहले (१।७७-७८) ही बता दिया गया है। यहाँ सिद्धि का अर्थ संहार है। प्रत्यभिज्ञाहृदय में बताया गया है—"चितिशक्ति स्वतन्त्र रूप से विश्व की सिद्धि (सृष्टि और संहार) करती रहती है"। इस तरह से सृष्टि और संहार के क्रम से जिनका अनु- १. साधनलक्षण-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. रम्यास्ता वाक्पराकारा-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ३. चिन्मरीच्यावरण-ख. ग. ज. झ. उ. । ४. साधकदशायां सप्तषष्टि- संख्यात्रिको-क. ग. ज. उ. । ५. सृष्टिस्थं-ज. झ. उ. । ६. 'कमीश्वरप्रत्यभिज्ञायाम्' इत्येव ग. विद्वान् सर्वत्र.