योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः सामरस्याकारेण समष्टिरूपिणीं कूटत्रयात्मना व्यष्टिरूपिणीमिति। आद्यां शक्तिं सकलजगदादित्येति पूर्वोक्त(२।१३)क्रमेण भावयन्तो योगिनो भावार्थं मन्वते ॥२३-२५॥ भावार्थमुक्त्वेदानीं सम्प्रदायार्थमाह— सम्प्रदायो महाबोधरूपो गुरुमुखे स्थितः। विश्वाकारप्रथायास्तु महत्त्वं च यदाश्रयम् ॥२६॥ सम्यग् याथाथ्येन कर्णे शिष्यस्य प्रदीयत इति सम्प्रदायः। महाबोधरूपः महतो देशकालाकारैरनवच्छिन्नस्य प्रकाशस्य बोधः परिज्ञानं रूपं यस्य तादृशः। गुरुमुखे स्थितः १गृणीते तत्त्वमात्मीयमात्मीकृतजगत्त्रयम्। उपायोपेयरूपाय शिवाय गुरवे नमः॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या २स्वात्मपरमार्थप्रकटनपरो गुरुः, तस्यैव मुखे स्थितः, समष्टिव्यष्टिरूपिणी है, अपने सामरस्यमय स्वरूप के कारण समष्टिरूपिणी और कूट- त्रयात्मक रूप के कारण व्यष्टिरूपिणी है। आद्यशक्ति की व्युत्पत्ति पहले (२।१३) बताई गई है। उस आद्या शक्ति को यहाँ बताये गये क्रम से श्रीविद्या के प्रत्येक अक्षर के अर्थ के रूप में भावना करने को ही योगी जन भावार्थ मानते हैं ॥२३-२५॥ भावार्थ का उपदेश कर अब 'सम्प्रदायार्थ' का वर्णन करते हैं— महाबोध रूपी सम्प्रदायार्थ गुरु के मुख में स्थित है, क्योंकि तीन बीजों का स्वरूप धारण कर विश्वमय बनी श्रीविद्या का रहस्य वहीं छिपा हुआ है ॥२६॥ सम्प्रदाय शब्द का अर्थ है सम्यक् विधिपूर्वक जो शिष्य के कान में दिया जाता है। यह सम्प्रदाय महाबोध रूप है, देश, काल, आकार से अपरिच्छिन्न महान् प्रकाशात्मक शिव का परिज्ञान कराना इसका लक्ष्य है। यह गुरु के मुख में स्थित है। किसी अभि- युक्त ने गुरु को इस तरह से प्रणाम निवेदन किया है— सारे जगत् को अपनी ही आत्मा के रूप में देखने-दिखाने वाले अपने ज्ञान को जो अपने शिष्य के कान में शब्द के रूप में देता है और जो स्वयं शिवस्वरूप भी है, उपाय बताने वाला और उपेय (प्राप्तव्य) भी जो स्वयं ही है, उस गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ इस तरह से स्वात्मस्वरूप के वास्तविक अभिप्राय को गुरु ही प्रकट करता है। यह ज्ञान शिवस्वरूप गुरु के मुख में ही रहता है, किसी अन्य के मुख में नहीं। इसका १. गृणते-ग. ने. ज. झ. ड. । २. आत्मपरमात्मप्रक-ख. ने. ज. ड. । [श्लोक संख्या २६ से ४१ तक सम्प्रदायार्थ का वर्णन किया गया है।]