योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३७ नान्यस्यानाकलितागमशास्त्रस्यानधिगताखिलवेद^१वेदाङ्गस्यानवधारितपरमार्थस्य ^२परप्रतारणपरस्य मुखे स्थितः । अत्र प्रमाणवचनम्— सर्वज्ञो हि शिवो वेत्ति सदसच्चेष्टितं नृणाम् । तेनासौ नानुगृह्णाति किञ्चिज्ज्ञस्य गुरोर्गिरा ॥ इति । अत्र गुरोरिति गुरुमानिनः, किञ्चिज्ज्ञस्य गुरुत्वाभावात् । ^३विश्वाकारप्रथायाः । विश्वं शिवादिक्षित्यन्तं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकम्, तदाकारप्रथा चिच्छक्तिः, अत्र श्रुतिः-- "स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति" (ऐ० उ० १।१) इति, तस्या महत्त्वं ^४तदाकार- कारित्वम्, यदाश्रयम् । कोऽर्थः ? परशिवसामरस्यरूपाया^५ बीजत्रयरूपेण परिण- ताया विश्वमयतावासना गुरुमुखेनैव लभ्यत इत्यर्थः ॥२६॥ विश्वाकारप्रथायास्तु महत्त्वं च यदाश्रयमित्यस्यैवार्थं विवृण्वन् वक्तव्यार्थस्य महत्त्वाद्यन्तसावधानतया त्वया श्रोतव्यमित्याह— अभिप्राय यह है कि जिसने आगम शास्त्र का और वेदांगसहित समस्त वेदों का अध्ययन नहीं किया है तथा जिसने परमार्थ तत्त्व का विचार नहीं किया है, जो दूसरों को मात्र ठगने में लगा रहता है, उसके पास से यह ज्ञान नहीं मिल सकता । निम्न श्लोक इसमें प्रमाण है— शिव सर्वज्ञ है । वह मनुष्यों की सभी अच्छी और बुरी हरकतों को जानता है । इसलिये वह अल्पज्ञ गुरु की वाणी के द्वारा किसी पर अनुग्रह नहीं करता ॥ इस श्लोक में विद्यमान गुरु शब्द उस मिथ्याभिमानी गुरु के लिये प्रयुक्त हुआ है, जो दूसरों को ठगने में लगा है, क्योंकि अल्पज्ञ व्यक्ति सही अर्थ में गुरु नहीं हो सकता । यह विश्व शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त ३६ तत्त्वों से बना है । चिच्छक्ति ही इस विश्व का रूप धारण कर लेती है । ऐतरेयोपनिषद् कहती है—'उस ब्रह्म ने विचार किया कि मैं इस विश्व की सृष्टि करूँ' । विश्वमय बनी इस चिच्छक्ति के स्वरूप को पहचानना गुरुकृपा पर ही निर्भर है । इसका भाव यह है कि परशिव के साथ सामरस्य रूप में अवस्थित परा वाणी ही तीन बीजों वाली श्रीविद्या के रूप में परिणत होती है । उसके इस विश्वमय स्वरूप को समझने-विचारने की कुंजी गुरुमुख से ही प्राप्त हो सकती है ॥२६॥ अब शिव पूर्व श्लोक के उत्तरार्ध की स्पष्ट व्याख्या करना चाहते हैं । यह विषय अत्यन्त गम्भीर है, अतः भगवान् सावधानी से सुनने का निर्देश दे रहे हैं— १. वेदान्त-क. ख. ग. उ. । २. 'परप्रतारण' नास्ति-ख. ने. ज झ. । ३. 'विश्वा- कारप्रथायाः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. तदाकारत्वं-ख. ज. झ. उ. । ५. रूपायाः