भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

१३८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः शिवशक्त्याद्यया मूलविद्यया परमेश्वरि । जगत्कृत्स्नं तयो व्याप्तं शृणुष्वावहिता प्रिये ॥२७॥ शिवः अकारः, शक्तिर्हकारः, तावाद्यौ हेतुभूतौ यस्याः सा, तथाविधया पूर्वोक्तरीत्या प्रथाभूतया मूलविद्यया कृत्स्नं २जगदुक्तरूपं व्याप्तम् । शृणुष्वावहिता अत्यन्तसावधाना शृणुष्व ॥२७॥ विद्यायां३ विश्वव्याप्तिमेव प्रतिजानीते— पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सँदाऽनघे । तन्मयी मूलविद्या च तत्तथा कथयामि ते ॥२८॥ पञ्चभूतमयं विश्वं भूतानि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशास्तन्मयं५ विश्वम् उक्त- हे परमेश्वरि ! शिव (अकार) और शक्ति (हकार) से उत्पन्न यह मूलविद्या सारे जगत् को कैसे व्याप्त किये हुए है, इस बात को अब तुम बहुत सावधानी से सुनो ॥२७॥ यहाँ शिव शब्द अकार का और शक्ति शब्द हकार का वाचक है । ये ही दोनों वर्ण उस मूलविद्या के कारण हैं, अर्थात् इन्हीं दो वर्णों के विस्तार से मूलविद्या का स्वरूप बनता है। इस मूलविद्या का जब विस्तार होता है, तो यह ३६ तत्त्वों से बने इस सारे जगत् को व्याप्त कर लेती है। कैसे व्याप्त कर लेती है, यही अब मैं बताने जा रहा हूं। इस विषय को तुम बहुत सावधानी से सुनो ॥२७॥ अब विद्या की इस विश्वव्याप्ति को ही बताते हैं— यह विश्व पंचभूतमय है। हे अनघे ! वह परा देवता भी पंचभूतमयी है और यह मूलविद्या परा देवता और पंचभूत दोनों का बोध कराती है, इसी विषय को अब मैं तुम्हें कह रहा हूँ ॥२८। यह विश्व १पंचभूतमय है, पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन भूतों से बना १. यथा-ख. ग. च. छ. ने. ज. झ. । २. जगदेवभूतं यथा व्याप्तमुक्तप्रकारेण रूपेणेति, अत एव तास्ववहिता अत्यन्त-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. यां विश्वव्याप्तं तत्त्वमेव- ख. ने. ज. झ. उ. । ४. सदानी-ख. ग. ने. ज., सनातनी-छ. झ. । ५. 'तन्मयं' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । १. शिव पंचमंत्रतनु है। पाशुपत मत के अनुसार वामदेव आदि पाँच मंत्रों से ही पाँच तत्त्वों के रूप में पंचमहाभूतों की उत्पत्ति मानी जाती है। इनका स्वरूप अन्य दर्शनों में प्रतिपादित स्वरूप से भिन्न है। आगे स्वयं दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण देकर इस बात को सिद्ध किया है। आगे ग्रन्थ में द्रष्टव्य है। (२८ पृ. १५८ से १७२)