योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
१३८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः शिवशक्त्याद्यया मूलविद्यया परमेश्वरि । जगत्कृत्स्नं तयो व्याप्तं शृणुष्वावहिता प्रिये ॥२७॥ शिवः अकारः, शक्तिर्हकारः, तावाद्यौ हेतुभूतौ यस्याः सा, तथाविधया पूर्वोक्तरीत्या प्रथाभूतया मूलविद्यया कृत्स्नं २जगदुक्तरूपं व्याप्तम् । शृणुष्वावहिता अत्यन्तसावधाना शृणुष्व ॥२७॥ विद्यायां३ विश्वव्याप्तिमेव प्रतिजानीते— पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सँदाऽनघे । तन्मयी मूलविद्या च तत्तथा कथयामि ते ॥२८॥ पञ्चभूतमयं विश्वं भूतानि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशास्तन्मयं५ विश्वम् उक्त- हे परमेश्वरि ! शिव (अकार) और शक्ति (हकार) से उत्पन्न यह मूलविद्या सारे जगत् को कैसे व्याप्त किये हुए है, इस बात को अब तुम बहुत सावधानी से सुनो ॥२७॥ यहाँ शिव शब्द अकार का और शक्ति शब्द हकार का वाचक है । ये ही दोनों वर्ण उस मूलविद्या के कारण हैं, अर्थात् इन्हीं दो वर्णों के विस्तार से मूलविद्या का स्वरूप बनता है। इस मूलविद्या का जब विस्तार होता है, तो यह ३६ तत्त्वों से बने इस सारे जगत् को व्याप्त कर लेती है। कैसे व्याप्त कर लेती है, यही अब मैं बताने जा रहा हूं। इस विषय को तुम बहुत सावधानी से सुनो ॥२७॥ अब विद्या की इस विश्वव्याप्ति को ही बताते हैं— यह विश्व पंचभूतमय है। हे अनघे ! वह परा देवता भी पंचभूतमयी है और यह मूलविद्या परा देवता और पंचभूत दोनों का बोध कराती है, इसी विषय को अब मैं तुम्हें कह रहा हूँ ॥२८। यह विश्व १पंचभूतमय है, पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन भूतों से बना १. यथा-ख. ग. च. छ. ने. ज. झ. । २. जगदेवभूतं यथा व्याप्तमुक्तप्रकारेण रूपेणेति, अत एव तास्ववहिता अत्यन्त-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. यां विश्वव्याप्तं तत्त्वमेव- ख. ने. ज. झ. उ. । ४. सदानी-ख. ग. ने. ज., सनातनी-छ. झ. । ५. 'तन्मयं' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । १. शिव पंचमंत्रतनु है। पाशुपत मत के अनुसार वामदेव आदि पाँच मंत्रों से ही पाँच तत्त्वों के रूप में पंचमहाभूतों की उत्पत्ति मानी जाती है। इनका स्वरूप अन्य दर्शनों में प्रतिपादित स्वरूप से भिन्न है। आगे स्वयं दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण देकर इस बात को सिद्ध किया है। आगे ग्रन्थ में द्रष्टव्य है। (२८ पृ. १५८ से १७२)
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३९ (१।४१) लक्षणम् । १सा परा सौभाग्यदेवता तन्मयी पञ्चभूतात्मिका । मूलविद्या- ऽपि तन्मयी तद्वाचिका देवतावाचिका पञ्चभूतवाचिका च । अत एव तदुभयमयी । तत्प्रकारं कथयामीत्यर्थः । “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः । आकाशाद् वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी" (तै० उ० २।१।१) इत्युपनिष- दुक्तरीत्या प्रकाशात्मकात् परमशिवात् पञ्चभूतानामुत्पत्तिः, २विमर्शात्मिकायाः शक्तेस्तद्वाचकानां विद्यावर्णानामुत्पत्तिरिति हि स्थितिः ॥२८॥ एवं स्थितेऽस्याः किं वाच्यं किं वाचकमिति शङ्कां परिहरन् वर्णभूतसृष्टि- प्रतिपादनपुरःसरं विश्वमयतामेवाह— हकाराद् व्योम संभूतं ककारात्तु प्रभञ्जनः । रेफादग्निः सकाराच्च जलतत्त्वस्य संभवः ॥२९॥ हुआ है। पहले (१।४१) बताया जा चुका है कि शिव से पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों का समष्टिभूत नामरूपात्मक जगत् ही विश्व है। सौभाग्यदेवता परा भगवती महात्रिपुर- सुन्दरी है। यह परा सौभाग्यदेवता पंचभूतमयी बन जाती है। उस सौभाग्यदेवता की वाचिका सौभाग्यविद्या भी तन्मयी हो जाती है, अर्थात् परा देवी की पंचभूतात्मकता के कारण यह विद्या पांच भूतों को भी सौभाग्यदेवता के साथ ही प्रतीति कराने लगती है। इसीलिये यह सौभाग्यविद्या सौभाग्यदेवता और पंचभूत दोनों की वाचिका है। यह कैसे होता है, उसी को मैं कह रहा हूँ। तैत्तिरीयोपनिषद् का कहना है—“उस ब्रह्म- स्वरूप आत्मा से आकाश की उत्पत्ति हुई ! आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई"। इस उपनिषद् के प्रमाण से प्रकाशात्मक¹ परम शिव से पांच महाभूतों की उत्पत्ति हुई और विमर्शात्मक शक्ति से इन पांच महाभूतों के वाचक विद्यागत वर्णों की उत्पत्ति हुई, यही वास्तविक स्थिति है ॥२८॥ विद्यागत वर्णों और पांच भूतों के इस वाच्यवाचकभाव संबन्ध को स्पष्ट करते हुए अब बताया जा रहा है कि विद्यागत वर्णों से ही पंचभूतों की सृष्टि होती है और इस तरह से यह विद्या विश्व के रूप में अपना विस्तार कर लेती है— हकार से आकाश की उत्पत्ति होती है। ककार से वायु, रेफ से अग्नि और १. लक्षणा-क. ग. ज. । २. विश्वात्मिकाया विमर्शशक्तेः-क. ग. । भावों में तेजस्तत्त्व की, विद्या, ईश्वर और सदाशिव में वायुतत्त्व की तथा शक्ति और शिव में व्योम तत्त्व की अभिव्याप्ति है। पंचतत्त्वदीक्षा के प्रसंग में स्वच्छन्दतन्त्र (५।१३) में इन पाँच तत्त्वों की व्याप्ति निवृत्ति, प्रतिष्ठा आदि कलाओं की व्याप्ति के अनुसार बताई है। प्रायः सभी शैवशास्त्र के ग्रन्थों में दीक्षा के प्रसंग में यह विषय वर्णित है।
- प्रकाशविमर्शात्मक यामल स्वरूप का संक्षिप्त विवेचन विज्ञानभैरव भाषानुवाद की पृ० ४-९ की टिप्पणी में देखिये ।
१४० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः लकारात् पृथिवी जाता तस्माद् विश्वमयी च सा । हकाराद् व्योम संभूतं प्रथमं विमर्शशक्तेराकाशवाचको हकारो जातः, ^१हकारानन्तरं तद्वाच्यं व्योम प्रकाशात्मनः परशिवात् संभूतम् । पश्चाद् वायु- वाचकः ककारो जातः ककारानन्तरं ककारवाच्यः प्रभञ्जनः संजातः । तत्पश्चा- दग्निवाचको रेफः संजातः, तदनन्तरं रेफवाच्योऽग्निः ^२संजातः । ततो जलतत्त्ववाचकः सकारः संजातः, ^३तदनन्तरं तद्वाच्यजलतत्त्वस्य संभवः । तदनन्तरं पृथिवीवाचको लकारो जातः, ^४तदनन्तरं तद्वाच्या पृथिवी जातेत्यर्थः । ^५तस्मात् शिवशक्तिसामरस्यरूपपरावयवप्रकाशविमर्शाभ्यां ^६पञ्चमहाभूतानि तद्वाचकान्यक्षराणि च यस्माज्जातानि, तस्मात्तदुभयसामरस्यरूपा सा परा स्वावयवभूतवर्ण^७मयी विश्वमयीत्यर्थः । तदुक्तं कामकलाविलासे— 'स्फुरितारुणाद् बिन्दोर्नादब्रह्माङ्कुरो^८ रवो व्यक्तः । तस्माद् गगनसमीरणदहनोदकभूमिवर्णसंभूतिः ॥९॥ सकार से जलतत्त्व उत्पन्न होता है। लकार से पृथिवी पैदा होती है। इस तरह से वह परा देवी विश्वमय हो जाती है ॥२९-३०॥ हकार से व्योम पैदा हुआ, अर्थात् पहले विमर्श शक्ति से आकाशवाचक हकार वर्ण की और तब उस हकार के वाच्य व्योम की उत्पत्ति प्रकाशात्मक परम शिव से हुई । बाद में वायु का वाचक ककार और तदनन्तर ककार के वाच्य वायु की उत्पत्ति हुई । इसके बाद अग्नि का वाचक रेफ और उस रेफ का वाच्य अग्नि उत्पन्न हुआ । इसी क्रम से जलतत्त्व का वाचक सकार और तब सकार के वाच्य जलतत्त्व की और तब पृथिवी- वाचक लकार और लकार के वाच्य पृथिवीतत्त्व की उत्पत्ति हुई । इस तरह से शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप परा भगवती के प्रकाश और विमर्श नामक अवयवों से पांच महाभूत और उनके वाचक अक्षरों की भी उत्पत्ति होती है, अतः शिवशक्तिसामरस्य- स्वरूपा परा भगवती के ये पाँच महाभूत और उनके वाचक वर्ण अवयव हैं । इस तरह से यह परा भगवती ^१शब्दात्मक और अर्थात्मक विश्व का स्वरूप धारण कर लेती है । कामकलाविलास में भी इस विषय का वर्णन किया गया है— १ तदनन्तरं-ने. ज. झ. उ. । २. संभूतः। पुनर्जलतत्त्व-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. सकाराज्जलतत्त्वं संभूतम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. लकारात् पृथिवी-ख. ने. झ. उ. । ५. यस्मात्-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. पञ्चभूतानि पञ्चभूताक्षराणि च जातानि-ख. ने. ज. झ. उ. । ७ मयविश्व-ख. ने. ज. । ८. स्फुटिता-क. ग. मु. । ९. ह्वयो-ख. ने. ज. झ. ।
- शास्त्रों में षडध्व के विवेचन के प्रसंग में इस विषय की चर्चा आई है। विज्ञान भैरव के २५वें श्लोक की व्याख्या में यह विषय देखा जा सकता है।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४१ अथ विशदादपि बिन्दोर्गगननिलवह्निवारिभूमिजनिः । एतत्पञ्चक'विकृतिर्जगदिदमण्वाद्यजाण्डपर्यन्तम् ॥१०॥ माता मानं मेयं बिन्दुत्रयभिन्न२बीजरूपाणि । धामत्रयपीठत्रयशक्तित्रयभेदभावितान्यपि च ॥१३॥ तेषु क्रमेण लिङ्गत्रितयं तद्वच्च मातृकात्रितयम् । इत्थं त्रितयमयी सा तुरीयपीठादिभेदिनी विद्या ॥१४॥ इति ॥२९-३० नन्वेवंविधक्रमेण विद्यायां वर्णाः किमिति न स्थिताः ? उच्यते—सत्यमेवं- विधक्रमो न भवति, तथापि पूर्वोक्तसृष्टिस्थितिसंहारानाख्यावभासनार्थं विद्याया- मक्रमेण वर्णाः पठ्यन्ते । तेन भूतवर्णक्रमो वर्णवासनाक्रमं बाधितुं नोत्सहते, अरुण (रक्त) बिन्दु में स्फुरण (स्पन्दन) होने पर नादब्रह्म (शब्दब्रह्म) रूपी अंकुर से शब्द की पश्यन्ती आदि के क्रम से अभिव्यक्ति होती है। इसी शब्द से गगन, पवन, ज्वलन, सलिल और पृथिवी के वाचक वर्णों की उत्पत्ति होती है॥ अब शुक्ल बिन्दु में स्पन्दन होने पर गगन, अनिल, वायु, जल और भूमि इन पाँच भूतों की सृष्टि होती है। इन पाँच महाभूतों के परिणामस्वरूप अणु से लेकर ब्रह्माण्ड पर्यन्त समस्त जगत् की सृष्टि पूरी हो जाती है॥ माता (ज्ञाता) महेश्वर, मान (ज्ञान) विद्या, मेय (ज्ञेय) भगवती त्रिपुरसुन्दरी—ये तीनों स्वरूप रक्त, शुक्ल और मिश्र बिन्दुओं के रूप में विभक्त तुरीय स्वरूप को, समष्टि स्वरूप को जानने के साधन हैं। तीन धाम, तीन बीज, तीन शक्तियाँ इत्यादि रूपों में भी इनकी भावना की जाती है॥ इन्हीं में क्रम से तीन लिङ्गों और तीन मातृकाओं की भी भावना की जाती है। इस तरह से इन तीन- तीन संख्या वाले पदार्थों का स्वरूप धारण करने वाली यह विद्या वास्तव में तुरीय स्थान में रहती है और इस तरह तुरीय धाम, पीठ आदि में निवास करने वाली यह परा विद्या तीन संख्यावाले सारे प्रपंच को तिरोहित कर देती है ॥२९-३०॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि विद्या के वर्णों से ही पाँच महाभूतों की उत्पत्ति हुई है, तो विद्या में वर्णों का क्रम वही होना चाहिये ? प्रश्नकर्ता की बात सही है कि विद्या में वर्णों का वह क्रम नहीं है, जिस क्रम से पाँच भूतों की सृष्टि हुई है, तो भी सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्या क्रम की ऊपर चर्चा आई है। इसी क्रम से विद्या में वर्णों की स्थिति है। वर्णों की भावना इसी क्रम से की जाती है, अतः वासना क्रम ही यहाँ प्रधान है। वर्णों की वासना के इस क्रम को भूतों की उत्पत्ति बताने वाला वर्णों का क्रम बाधित नहीं कर सकता, क्योंकि यहाँ वर्णों की वासना ही प्रधान है, भूत क्रम गौण। पुनः प्रश्न उठता है कि तब विद्या में पाँच ही अक्षर होने चाहिये, जिनसे १. विकृति-क०। २. रूपिणम्-क०। ३. सा तु-क०। ४. सृष्टीत्यादि-ख०।
१६२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः वासनावत्त्वाद् वर्णानाम् । ननु तर्हि भूत¹संख्याकान्यक्षराणि किमिति न भवन्ति, अन्यान्यपि बहूनि श्रूयन्त एवेत्यत आह— गुणाः पञ्चदश प्रोक्ता² भूतानां तन्मयी शिवा ॥३०॥ भूतानां पञ्चानां व्याप्यव्यापकभावेन पञ्चदश गुणाः स्युः । अतस्तन्मयी तदात्मिका तत्संख्यावर्णवतीयं विद्या, शिवा शोकमोहमयसंसाररूपाऽमङ्गलपरि- पन्थिपरमाद्वैतप्रथा³परमार्थरूपा, परममङ्गलात्मकत्वात् ॥३०॥ ननु विद्याक्षरसंख्यया⁴ यावन्तः परिगणिताः पदार्थाः⁵, किं तन्मयतावासना वक्तुं शक्यते ? ⁶इत्यत आह— यस्य यस्य पदार्थस्य या या शक्तिरुदीरिता । सा सा सर्वेश्वरी देवी स स सर्वो महेश्वरः ॥३१॥ लोके यस्य यस्य पदार्थस्य ⁷यत्किञ्चित्करणसामर्थ्यलक्षणा या या शक्ति- र्विद्यते, सा सा शक्तिः सर्वेश्वरी देवी सर्वस्य शिवादिक्षित्यन्त⁸स्येश्वरी निया- पाँच महाभूतों की उत्पत्ति होती है । यहाँ तो और भी बहुत से वर्ण सुनाई पड़ते हैं ? इस प्रश्न का अब उत्तर देते हैं— पाँच भूतों के पन्द्रह गुण होते हैं । अतः पंचभूतमयी यह कल्याणी विद्या भी पन्द्रह अक्षरों वाली है ॥३०॥ पाँच भूतों की व्याप्यता और व्यापकता के आधार पर इनमें गुणों की संख्या १५ हो जाती है। अतः पंचभूतात्मिका यह विद्या भी उतने ही संख्या के वर्णों वाली है। यह विद्या शिवा है, शोक और मोह से भरे इस अमंगलमय संसार का समूल नाश कर देने वाले परम अद्वय ज्ञान के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करा देने वाली यह विद्या परम मंगलमय है ॥३०॥ अब प्रश्न उठता है विद्या के इन पन्द्रह अक्षरों से क्या सभी ३६ पदार्थों की विद्या- मयता की भावना की जा सकती है ? इसका उत्तर है— जिस जिस पदार्थ को जो जो शक्ति कही गई है, उनमें की सभी शक्तियाँ सर्वेश्वरी परा देवी और सभी पदार्थ महेश्वर शिव के स्वरूप हैं ॥३१॥ लोक में जिस जिस पदार्थ की जो जो कार्य करने की सामर्थ्य प्रसिद्ध है, वे सब शक्तियाँ (सामर्थ्य) सर्वेश्वरी देवी के, शिव से लेकर पृथिवी पर्यन्त समस्त पदार्थों का १. संख्ययैवाक्षराणि-ख. ने. झ. उ. । २. ख्याताः-ख., शाख्याताः-ग. च. छ. ज. झ. । ३. प्रथारूपपरममङ्गलार्थत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. संख्याया-क. ग. झ. । ५. 'पदार्थाः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. इत्याह-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. या या शक्तिः किञ्चित्-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. स्येशान-क. ख. ने. ज. झ. उ. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४३ मिका देवी परा, स स सर्वः पदार्थो महेश्वरो विश्वजगन्नियामकः परमशिवः । ^१लोके यद्यद्वस्तु यत्किञ्चित्करणसामर्थ्यशालि तत्सामर्थ्यरूपेण परैव परिणता, तत्तत्सामर्थ्यवद्वस्तुरूपेण परमशिवः परिणत इति वक्तुं शक्यते । किं वक्तव्यमेत- दुभयमयविद्यावर्णसमानसंख्यावत्पदार्थरूपेण तावेव परिणतावित्यर्थः । तदुक्त- मभियुक्तैः— त्वं चन्द्रिका शशिनि तिग्मरुचौ रुचिस्त्वं त्वं चेतनासि पुरुषे पवने बलं त्वम् । त्वं स्वादुताऽसि सलिले शिखिनि त्वमूष्मा निःसार^२मम्ब निखिलं त्वदृते यदि स्यात् ॥ इति ॥३१॥ (अ० स्त० २०) नियमन करने वाली परा देवी के और वे सब पदार्थ महेश्वर के, सारे जगत् का नियमन करने वाले परम शिव के स्वरूप हैं । लोक में जिस किसी वस्तु में जो कुछ विशेष कार्य करने की शक्ति दिखाई पड़ती है, वह सामर्थ्य परा शक्ति का ही परिणाम है और उस उस सामर्थ्य से सम्पन्न पदार्थ परम शिव का परिणाम है । अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का अपना स्वरूप परम शिव का और उस पदार्थ की सामर्थ्य परा शक्ति का परिणाम है, उनसे अभिन्न है । इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ शिवमय और उसकी सामर्थ्य शक्तिमय है । ऐसी स्थिति में यह कौन असंभव बात है कि शिवशक्तिमय इस विद्या के वर्णों के और समान संख्या वाले पदार्थों के रूप में परम शिव और परा शक्ति ही परिणत होते हैं । ^१अम्बास्तव में कहा गया है— तुम चन्द्रमा में चाँदनी के रूप में, सूर्य में प्रभा के रूप में, पुरुष में चेतना के रूप में, पवन में वेग के रूप में, जल में स्वाद के रूप में और अग्नि में उष्णता के रूप में निवास करती हो । ओ मा ! तुम्हारे बिना यह सारा जगत् सूना हो जायगा ॥३१॥ १. सर्वलोके-ख. ज. झ. उ. । २. मेतदखिलं-ख. ने., मेव-ज. झ. ।
- पञ्चस्तवी के विषय में हम अन्यत्र (आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ० ८६-८७) लिख चुके हैं कि लघुस्तव के कर्ता धर्माचार्य ही इसके रचयिता हैं । इन पाँच स्तवों में से तीन स्तवों (लघुस्तव, चर्चास्तव और सकलजननीस्तव) के पंडित हरभट्ट शास्त्री कृत पाण्डित्यपूर्ण टीका के साथ कश्मीर के प्रसिद्ध विद्वान् पंडित श्री दीनानाथ यक्ष द्वारा संपादित संस्करण प्रकाश में आ चुके हैं । यह दुःख का विषय है कि बाकी के दो स्तव (घटस्तव और अम्बास्तव) अभी प्रकाशित नहीं हो सके । अम्बास्तव का अठारहवां श्लोक (लक्ष्मीवशीकरण) भोज के सरस्वतीकण्ठाभरण (निर्णयसागर प्रेस, द्वितीय संस्करण, पृ० ३०६-३०७) में उद्धृत है।
१४४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु भूतगुणमयी शिवेत्युक्तम्, शिवाया तत्संख्या कुत ²इत्यत आह— व्याप्ता पञ्चदशार्णैः सा विद्या भूतगुणात्मिका । पञ्चभिश्च तथा षड्भिश्चतुर्भिरपि चाक्षरैः ॥३२॥ सा शिवा ³परैव विद्या, वाच्यवाचकयोरभेदात्⁴ । पञ्चभिरक्षरैर्वाग्भव- बीजस्यावयवैः, षड्भिरक्षरै कामराजबीजस्यावयवैः, चतुर्भिरक्षरैः शक्तिबीजस्या- वयवैः । न क्षरन्तीत्यक्षराणि, तेषां नित्यत्वात् । ⁵स्वांशैर्नाशरहितैः पञ्चदशार्णे- र्व्याप्ता, अत एव ⁶भूतगुणात्मिका ॥ ३२ ॥ बीजत्रयमक्षरशो विभज्य भूतगुणात्मकतावासनामुक्त्वेदानीमक्षराण्यरवयवशो विभज्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकतावासनामाह— स्वरव्यञ्जनभेदेन सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनी । सप्तत्रिंशत्प्रभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपिणी ॥ ३३ ॥ तत्त्वातीतस्वभावा च विद्यैषा भाव्यते सदा । इस पर प्रश्न उठता है कि विद्या में तो पन्द्रह अक्षर हैं, तब यहाँ ३६ संख्या कहाँ से आवेगी ? इसका उत्तर आगे देते हैं— वह भूतगुणात्मिका विद्या पन्द्रह वर्णों से व्याप्त है । यह पाँच, छः और चार अक्षरों के तीन बीजों में विभक्त है ॥३२॥ वाच्य और वाचक की अभिन्नता के कारण परा शक्ति और परा विद्या में कोई भेद नहीं है। पाँच अक्षर वाग्भव बीज के, छः अक्षर कामराज बीज के और चार अक्षर शक्ति बीज के अवयव हैं। अक्षर शब्द का अर्थ है जिसका क्षरण (नाश) न हो। अक्षर नित्य हैं, अतः इनका क्षरण नहीं होता। यह विद्या इन नाशरहित पन्द्रह वर्णों से व्याप्त है, इसलिये प्रधानतः यह भूतगुणात्मिका कहलाती है ॥३२॥ इस प्रकार यहाँ तीन बीजों के क्रम से अक्षरों का विभाग और उनकी पन्द्रह भूत- गुणों के रूप में भावना को बताने के बाद अब इन अक्षरों के भी अवयवों का विभाग कर कर उनकी ३६ तत्त्वों के रूप में वासना बताई जा रही है— स्वर और व्यंजन के भेद से यह विद्या ३७ अवयवों वाली हो जाती है। विद्या के ये सैंतीस अवयव परा देवी के छत्तीस तत्त्वों वाले विश्वमय स्वरूप का और एक तत्त्वातीत विश्वोत्तीर्ण स्वरूप का बोध कराते हैं। इस तरह से श्रीविद्या की सदा इन्हीं रूपों में भावना करनी चाहिये ॥३३-३४॥ १. शिवायाः-ख. ज. झ. उ. । २. इत्याह-ज. झ. उ. । ३. परैवाम्बिका या वाच्य- ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रभेदिनी-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. एवंविधस्वांशैः-ख. ने.ज. झ. उ. । ६. भूतात्मिका-ख. ने. ज. झ उ. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४५ स्वरव्यञ्जनभेदेन प्रथमबीजेऽकारचतुष्टयमीकारश्चेति पञ्च स्वराः, शिष्टानि षड् व्यञ्जनानि, एवमेकादश । द्वितीयबीजेऽकारपञ्चकमीकारश्चेति षट् स्वराः, शिष्टानि व्यञ्जनानि सप्त, एवं त्रयोदश । तृतीयबीजेऽकारत्रयमीकारश्चेति चत्वारः स्वराः, शिष्टानि व्यञ्जनानि पञ्च, एवं नव । इत्येवं विभागेनाक्षरावयवा- स्त्रयस्त्रिंशत् । बीजत्रयान्ते बिन्दवस्त्रय इति षट्त्रिंशत् । तत्समष्टिरेका । एवं सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनो विद्या समष्टिरूपा । एवं सप्तत्रिंशत्प्रभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्व- रूपिणी तत्त्वातीतस्वभावा च विद्यैषा । व्यष्टिसमष्टिभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मिका तदतीता (च) इयम् । षट्त्रिंशत्तत्त्वान्यवयवभूतानि, तेषां रूपवती, सप्तत्रिंशत्प्र- भेदेन तत्त्वातीतस्वभावा च । स्वस्य भावः स्वभावः, शिवस्य यादृशो भावस्तादृशोऽ- स्या¹ इति भावयितव्यमित्यर्थः । तत्त्वानां लक्षणानि मयैव सौभाग्यसुधोदये निरूपितानि । यथा— स्वर और व्यंजन के भेद से विद्या में ३७ वर्ण होते हैं । जैसे प्रथम बीज में चार अकार और ईकार मिलकर पाँच स्वर हुए, बाकी छः व्यंजन हैं । इस तरह से प्रथम बीज में ११ अक्षर हुए । द्वितीय बीज में पाँच अकार और ईकार मिल कर छः स्वर हुए, बाकी सात व्यंजन हैं । दोनों मिलकर द्वितीय बीज में १३ अक्षर हुए । तीसरे बीज में तीन अकार और ईकार मिलकर चार स्वर और बाकी पाँच व्यंजन हैं । इस तरह से यहाँ अक्षरों की संख्या ९ हुई । सब मिलाकर अक्षरों की संख्या ३३ हुई । तीन बीजों के अन्त में तीन बिन्दु हैं । इनको भी मिलाने से यह संख्या छत्तीस हुई । इन सबकी समष्टि भी एक है । इस तरह से यह समष्टि विद्या ३७ भेद वाली है । इन ३७ भेदों के कारण यह विद्या ३६ तत्त्वों वाली और तत्त्वातीत स्वभाव वाली भी है । व्यष्टि रूप में यह ३६ तत्त्वों वाली और समष्टि रूप में तत्त्वातीत है । यह ३६ तत्त्वों को अपना अवयव बनाकर उनका स्वरूप धारण कर लेती है और ३७ वें स्वरूप में प्रवेश कर उनसे ऊपर उठ जाती है, तत्त्वातीत विश्वोत्तीर्ण स्वरूप धारण कर लेती है । स्वभाव शब्द का अर्थ है अपना भाव । अपना, अर्थात् शिव का जैसा स्वरूप है वैसा ही स्वरूप इस विद्या का भी है, ऐसी भावना करनी चाहिये । तत्त्वों के लक्षण मैंने ही ¹सौभाग्यसुधोदय में बताये हैं । जैसे कि— १. स्याः स्वभाव-ख. ने. ज. उ. ।
- यह विस्तृत उद्धरण भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट (पृ० ३०६-३२१) में प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रथम प्रपंच (श्लो० २८-४८) में पाठभेदों के साथ उपलब्ध है । इस ग्रन्थ का प्रथम संस्करण सन् १९६८ में प्रकाशित हो चुका था । यह खेद का विषय है कि कश्मीर ग्रन्थमाला में सन् १९१४ में प्रकाशित श्री जगदीश चन्द्र चटर्जी के 'कश्मीर शैविज्म' के तथा सन् १९३८ में प्रकाशित सटीक प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (पृ० १६३- १०
१४६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया निखिलमपि जगत् स्रष्टुम्। १पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमं शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ॥ इच्छा सैव स्वच्छा सन्ततसमवायिनी २सती शक्तिः। सचराचरस्य जगतो बीजं निखिलस्य निज३निलीनस्य ॥ स्वेच्छाशक्त्युद्गीर्णं ४जगदात्माहन्तया समाच्छाद्य । निवसन् स एव निखिलानुग्रहनिरतः सदाशिवोऽभिमतः ॥ ५विश्वं स एव पश्यन्निदन्तया निखिलमीश्वरो जातः। सा भवति शुद्धविद्या येदन्ताहन्तयोरभेदमतिः ॥ माया विभेदबुद्धिर्निजांशभूतेषु६ निखिलभूतेषु७ । नित्यं तस्य निरङ्कुशविभवं वेलेव ८वारिधिं रुन्धे ॥ स तया परिमितमूर्तिः संकुचितसमस्तशक्तिरेष पुमान्। रविरिव सन्ध्यारक्तः संहृतरश्मिः स्वभासनेऽप्यपटुः ॥ यह जो अनुत्तरमूर्ति परम शिव है, वह अपनी इच्छा से इस सारे जगत् को बनाने के लिये जब स्पन्दनशील होता है, तो इस स्पन्दनव्यापार को ही आगम शास्त्र के ज्ञाता प्रथम शिवतत्त्व के नाम से जानते हैं। उस अनुत्तर तत्त्व की स्वच्छ इच्छा शक्ति शिव के साथ सदा अविनाभाव सम्बन्ध से जुड़ी रहती है। यही शक्तितत्त्व है। अपने में छिपे हुए सारे स्थावरजंगमात्मक जगत् को यही पैदा करती है। अपनी इच्छा शक्ति से निकले हुए इस जगत् को अपनी अहन्ता से आच्छादित कर, अर्थात् अपना ही स्वरूप मान कर सब पर अनुग्रह करने में लगा हुआ तत्त्व सदाशिव माना गया है। इस सारे जगत् को इदन्ता के रूप में देखने वाला, अर्थात् अपने से भिन्न मानने वाला तत्त्व ईश्वर कहलाता है। ऊपर बताई गई अहन्ता और इदन्ता में अभेद दृष्टि को जगाने वाला तत्त्व शुद्धविद्या है। अपने ही अंग से उत्पन्न हुए समस्त प्राणियों में भेद बुद्धि को पैदा करने वाला तत्त्व माया है। समुद्र की वेला (किनारा) जैसे समुद्र को आगे बढ़ने से रोक देती है, उसी तरह से यह माया उस परम शिव के समस्त वैभव को छिपा देती है। इस माया शक्ति के कारण परिमित स्वरूप वाले पुरुष की समस्त शक्तियाँ संकुचित हो जाती हैं। उसकी स्थिति सन्ध्याकालीन उस सूर्य के समान हो जाती हैं, जो कि अपनी ललाई में १. प्रस्यन्दे स स्यन्दः-क. ख. ने. । २. परा-मु. । ३. विली-क. ख. । ४. जगदात्म- तया-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. विश्वं पश्चात् पश्यन्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. जातेषु-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. जीवेषु-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. वारिधे-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । पर कुछ विद्वान् अब भी इसको क्षेमराज की कृति मान कर स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में इसके प्रकाशन और अनुसन्धान में प्रवृत्त हैं।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४७ सम्पूर्णकर्तृताद्या या बह्व्यः सन्ति शक्तयस्तस्य । संकोचात् संकुचिताः कलादिरूपेण रुषन्त्येनम् ॥ १तत्सर्वकर्तृता सा संकुचिता कतिपयार्थमातृपरा । किञ्चित्कर्तारममुं कलयन्ती कीर्त्यते कलानाम्ना२ ॥ सर्वज्ञताऽस्य शक्तिः परिमिततनुरल्पवेद्यमातृपरा । ज्ञानमुपपादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः ॥ नित्यपरिपूर्णतृप्तिः शक्तिस्तस्यैव परिमिता तु सती । भोगेषु रञ्जयन्ती सततममुं रागतत्त्वतां याता ॥ या नित्यताऽस्य शक्तिर्निष्कृष्य निधनोदयप्रदानेन । नियतपरिच्छेदकरी क्लृप्ता स्यात् कालतत्त्वरूपेण ॥ छिपा हुआ स्वयं अपने को भी प्रकाशित करने में असमर्थ हो जाता है। सम्पूर्णकर्तृता आदि जो इसकी अनेक शक्तियाँ हैं, स्वयं इसके इस स्वरूप-संकोच के कारण वे भी संकुचित हो जाती हैं और वे ही कला आदि का स्वरूप धारण कर इसको घेर लेती हैं। उस परम शिव की सर्वकर्तृता शक्ति जब संकुचित होती है, तो यह कुछ विषयों तक ही सीमित हो जाती है। इसी के कारण पुरुष की कर्तृत्वशक्ति भी सीमित हो जाती है। १सर्वकर्तृता का किंचित्कर्तृता के रूप में कलन करने वाली यह शक्ति कलातत्त्व के नाम से जानी जाती है। सर्वज्ञता शक्ति जब अपने स्वरूप का संकोच करती है, तो वह कुछ ही विषयों को जान पाती है। ज्ञान के इस संकोच को पैदा करने वाली शक्ति को आगमशास्त्र के प्राचीन विद्वानों ने 'विद्या' नाम दिया है। उसी परम शिव की नित्य- परिपूर्णतृप्ति नामक शक्ति जब परिमित (संकुचित) होती है, तो वह पुरुष को सदा भोगों में लगाये रहती है। अपनी इसी रंजकता के कारण इस तत्त्व का नाम 'राग' पड़ गया है। इसकी नित्यता शक्ति जब निकल जाती है, तो पुरुष जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़ जाता है। तब हम उसे नियत (निश्चित) समय में ही देख पाते हैं। पुरुष के इस समयकृत संकोच को करने वाली शक्ति ही 'कालतत्त्व' के रूप में प्रकट होती है। इस परम शिव की निरावरण स्वातंत्र्य शक्ति जब संकुचित हो जाती है, तो वह पुरुष को १. यत्-मु. । २. नाम-ख. ग. ने. झ. उ. । १. शिव के सर्वज्ञता आदि छः गुणों का वर्णन आगम-तन्त्रशास्त्र, पुराण आदि में अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रथमतः उसका अनादि बोध माया के कारण लुप्त हो जाता है और कला आदि के कारण बाकी बचे पाँच गुण भी संकुचित हो जाते हैं। इसी- लिये अनेक आचार्यों ने माया का भी कंचुकों में समावेश कर उनकी संख्या छः मानी है। इस प्रसंग में विज्ञानभैरव भाषानुवाद, पृ० ८ की पहली टिप्पणी भी देखिये।
१४८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ] याऽस्य स्वतन्त्राख्या शक्तिः संकोचशालिनी सैव । कृत्याकृत्येष्ववशं नियतममुं नियमयन्त्यभून्नियतिः ॥ इच्छादित्रिसमष्टिः१ शक्तिः शान्ताऽस्य संकुचद्रूपा । २संकुचितेच्छाद्यात्मकसत्त्वादिमाम्यरूपिणी तु सती ॥ बुद्ध्यादिसामरस्य३रूपा चित्तात्मिका मता प्रकृतिः । इच्छाऽस्य रजोलूपाऽहङ्कृतिरासीदहंप्रतीतिकरी ॥ ज्ञानाऽस्य सत्त्वरूपा निर्णयबोधस्य कारणं बुद्धिः । तस्य क्रिया तमोमयमूर्तिर्मन इत्युच्यते विकल्पकरी ॥ ४वामादिपञ्चभेदः स एव संकुचितविग्रहो देवः । ज्ञानक्रियोपरागप्राधान्याद् विविधविषय५रूपोऽभूत् ॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनजिह्वाघ्राणानि बोधकरणानि । वाक्पाणिपादपायूपस्था६ख्याकानि कर्मकरणानि ॥ भले-बुरे की पहचान से भी वंचित कर देती है। इस तरह से पुरुष का नियमन करने वाली यह शक्ति 'नियति' के नाम से जानी जाती है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति को अपने में समेटे हुए शान्ता शक्ति जब अपने स्वरूप को संकुचित करती है, तो उसमें विद्यमान संकुचित इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियां सत्त्व, रज और तमोगुण के रूप में और स्वयं शान्ता शक्ति साम्यावस्था वाली प्रकृति के रूप में परिणत हो जाती है। यह प्रकृति बुद्धि, मन और अहंकार को अपने में समेटे हुए चित्त का स्वरूप धारण करती है। इच्छा शक्ति ही पहले रजोगुण के रूप में और बाद में अहंकार के रूप में परिणत होती है। यह अहंकार ही अहमात्मक अभिमान है। ज्ञानशक्ति पहले सत्त्वगुण के रूप में और बाद में बुद्धि के रूप में परिणत होती है। यह निश्चयात्मक ज्ञान की जननी है। क्रियाशक्ति पहले तमोगुण के रूप में और बाद में मन के रूप में परिणत होती है। यह मन संकल्पविकल्पात्मक व्यापार का साधन है। १वाम- देव आदि पाँच मन्त्रों का शरीर धारण करने वाला संकुचित स्वरूप का यह शिव ज्ञान और क्रियाशक्ति की छाया पड़ने पर ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय बन जाता है। श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शन, जिह्वा और घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ १. ष्टिाशक्ति-क. ग. उ. । २. संकलिते-ख. ग. ने. झ. उ. । ३. रस्यस्वरूप- ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. वागादिपञ्चभेदैः-क. ख. मु. । ५. विषयि-ख. ग. ने. ज. उ. । ६ स्थकनामानि-ख., स्थाख्यानि-मु. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४९ शब्दस्पर्शौ रूपं रसगन्धौ चेति भूतसूक्ष्माणि। अयमेवातिनिकृष्टो जातो भूतात्मनाऽपि भूतेशः॥ गगनमनिलश्च तेजः सलिलं भूमिश्च पञ्चभूतानि। श्रोत्रादिकरणवेद्याः शब्दाद्यास्तानि वेदकान्येषाम्॥ वचनकरी वागासीत् पाणिः स्यात् करणभूतमादाने। गमनविसर्गानन्दत्रितये पादा¹दिकत्रिकं करणम्॥ गन्धवती भूमिः स्यादापः सांसिद्धिकद्रवास्तेजः। उष्णस्पर्शं²मरूपस्पर्शो वायुरम्बरं शब्दः॥ इति॥३३-३४॥ (सौ० सु० १।२८-४८) पुनरपि सिंहावलोकनन्यायेन भूतगुणानां पञ्चदशतां विद्यायाश्च तन्मय- रूपतां विवृणोति— पृथिव्यादिषु भूतेषु व्यापकं चोत्तरोत्तरम् ॥३४॥ भूतं त्वधस्तनं व्याप्यं पृथिव्यादिषु। आदिशब्देनाप्तेजोवाय्वाकाशा गृह्यन्ते। ⁴तेषूत्तरोत्तरं व्यापकमधिकवृत्ति। अधस्तनं भूतं व्याप्यं न्यूनवृत्ति। कोऽर्थः? आकाशमध- ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच सूक्ष्मभूत (तन्मात्राएँ) हैं। यही भूतेश शिव अपनी अत्यन्त निकृष्ट (जड़) अवस्था में आकर स्थूल भूतों का भी स्वरूप धारण कर लेता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाँच भूत हैं। शब्द आदि विषयों का ज्ञान श्रोत्र आदि इन्द्रियों से होता है। इस तरह से ये विषय वेद्य और इन्द्रियाँ वेदक कही जाती हैं। वागिन्द्रिय वचन की और पाणि आदान क्रिया की साधन है। पाद, पायु और उपस्थ क्रमशः गमन, विसर्ग और आनन्द के साधन हैं। भूमि गन्ध गुणवाली, जल सांसिद्धिक (स्वभावसिद्ध) द्रव (रस) वाला, तेज उष्ण स्पर्शवाला, वायु अरूप स्पर्शवाला और आकाश शब्द गुणवाला है ॥३३-३४॥ प्रस्तुत प्रकरण का सिंहावलोकन करते हुए पुनः पाँच भूतों के पन्द्रह गुणों और विद्या के पन्द्रह वर्णों का विवरण प्रस्तुत करते हैं— पृथिवी आदि पाँच महाभूतों में ऊपर ऊपर के भूत व्यापक रूप में और नीचे के भूत व्याप्य रूप में रहते ३४-३५॥ पृथिवी शब्द के साथ जो आदि शब्द लगा है, वह जल, तेज, वायु और आकाश का संग्राहक है। इन सबमें आगे आगे का तत्त्व व्यापक है, अधिक जगह घेरता है और १. दिकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. विशिष्टं सस्पर्शो-मु.। ३. शब्दाद-ने. ज. झ. उ.। ४. पृथिव्यादिषु भूतेषूत्तरं भूतं व्यापक-ख. ने. ज. झ.।
१५० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेत स्तनानां भूतानां व्यापकम्, अधिकवृत्तित्वात् । अन्यान्यपि चत्वारि भूतानि व्याप्यानि, न्यूनवृत्तित्वात् । एवं वायुरग्न्यादीनां त्रयाणां व्यापकः, तानि त्रीणि व्याप्यानि । एवं तेजोऽप्यधस्तनयोर्व्यापकम्, ते द्वे व्याप्ये । एवमापः पृथिव्या व्यापिकाः, पृथवी व्याप्येत्यर्थः ॥३४-३५॥ तेन व्यापकगुणा व्याप्ये¹ स्थिता इत्याह— तद्गुणा व्यापकाश्रयाः । व्याप्येष्ववस्थिता देवि स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥३५॥ व्यापकाश्रयास्तद्गुणा व्यापकगुणाः, व्याप्येष्ववस्थिताः स्थूलसूक्ष्मविभेदतः । स्थूलमधिकवृत्ति व्यापकम्, सूक्ष्ममल्पवृत्ति व्याप्यम् । व्यापकव्याप्ययोः स्थूलसूक्ष्म- विभेदाद् व्यापकगुणा व्याप्येषु तिष्ठन्तीत्यर्थः ॥३५॥ नीचे-नीचे का भूत व्याप्य है, कम जगह घेरता है। इसका अभिप्राय यह है कि आकाश अपने नीचे के सभी भूतों में व्यापक रूप से रहता है। सभी में इसकी स्थिति रहने से यह सभी तत्त्वों को घेरे हुए है। इसकी अपेक्षा अन्य चार भूत व्याप्य हैं, क्योंकि आकाश में रहने से उनका घेरा आकाश की अपेक्षा कम है। इसी तरह वायु शेष तीन अग्नि आदि की दृष्टि से व्यापक है और वे तीन भूत व्याप्य हैं। इसी प्रकार तेज नीचे के दो भूतों की अपेक्षा व्यापक है और वे दोनों व्याप्य हैं। इन दोनों में भी जल पृथिवी की अपेक्षा से व्यापक है और पृथिवी व्याप्य है ॥ ३४-३५ ॥ इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि व्यापक भूत के गुण व्याप्य भूत में रहते हैं। इसी विषय को स्पष्ट करते हैं— हे देवि ! व्यापक भूत में रहने वाले उसके गुण व्याप्य भूत में भी रहते हैं, क्योंकि स्थूल और सूक्ष्म के भेद से इनमें परस्पर व्याप्यव्यापकभाव संबन्ध है ॥ ३५ ॥ व्यापक आश्रय (भूत) के गुण भी व्यापक होते हैं, अर्थात् व्याप्य आश्रिय (भूत) में भी वे रहते हैं, क्योंकि ये ¹स्थूल और सूक्ष्म के भेद से विभक्त हैं। स्थूल शब्द का अर्थ यहाँ व्यापक है, जो कि अधिक जगह घेरता है। सूक्ष्म का अर्थ व्याप्य है, जो कि कम जगह घेरता है। व्यापक और व्याप्य भूत की इस स्थूलता और सूक्ष्मता के कारण व्यापक भूत के गुण व्याप्य भूत में भी रहते हैं ॥ ३५ ॥ १. व्याप्येष्वर्थेषु—ख. ने. ज. झ. उ. । 1 इस प्रकरण में अनेक स्थलों पर स्थूल और सूक्ष्म शब्दों का प्रयोग प्रचलित अर्थ से सर्वथा भिन्न रूप में हुआ है। दर्शन शास्त्र में सर्वत्र स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म तत्त्व श्रेष्ठ
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५१ ननु कस्य कस्य भूतस्य गुणाः केषु केषु भूतेषु स्थिताः ? विद्यायाः १ कानि कान्यक्षराणि २कस्य कस्य भूतस्य गुणान् लक्षयन्तीत्यत आह— तस्माद्व्योमगुणः शब्दो वाय्वादीन्व्याप्य संस्थितः । व्योमबीजैस्तु विद्यास्थैर्लक्षयेच्छब्दपञ्चकम् ॥३६॥ तस्माद् व्योम्नः ३श्वेतरभूतेभ्यः स्थूलत्वाद् व्यापकत्वम्, तेन व्योमगुणः शब्दो वाय्वादीन् वायुतेजःसलिलपृथिव्यात्मकान् व्याप्य स्थितः । विद्यास्थैर्व्योम- बीजैः पञ्चभिः पञ्चभूतेषु स्थितानां शब्दानां पञ्चकं लक्षयेत्, व्योमवाचकत्वाद् हकारपञ्चकं तद्गुणं शब्दपञ्चकं लक्षयतीत्यर्थः ॥३६॥ ननु विद्यायां षड् हकाराः ४सन्ति, अन्यस्य हकारस्य किं प्रयोजनमित्यत आह— तेषां कारणरूपेण स्थितं ध्वनिमयं परम् । किस किस भूत के गुण किन किन भूतों में रहते हैं और विद्या के कौन कौन से अक्षर किस किस भूत के गुणों को लक्षित करते हैं, इस विषय का वर्णन अब किया जा रहा है— ऊपर बताये व्याप्यव्यापक भाव के कारण आकाश का गुण शब्द वायु प्रभृति में भी रहता है । विद्या स्थित पाँच हकार इन्हीं गुणों के सूचक हैं ॥ ३६ ॥ ऊपर बताई गई पद्धति से आकाश अपने से भिन्न भूतों की अपेक्षा स्थूल है, व्यापक है । इसलिये आकाश का गुण शब्द वायु, तेज, जल और पृथिवी को भी व्याप्त करके स्थित है । विद्या में स्थित पाँच व्योम बीज पाँच भूतों में स्थित पाँच प्रकार के शब्दों को लक्षित करते हैं। इसका भाव यह है कि हकार आकाश का वाचक होता है । विद्या में पाँच हकार वर्ण हैं। पाँच वर्ण आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी में विद्यमान शब्दों की ओर इंगित करते हैं ॥ ३६ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि विद्या में तो छः हकार हैं, इस बचे हुए छठे हकार का क्या प्रयोजन है ? इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं— उन पाँच शब्दों का कारणभूत तत्त्व ध्वनिमय नाद है । यह छठा हकार इसी को लक्षित करता है ॥ १. विद्यायां-ख. ज. झ. उ. । २. 'कस्य कस्य भूतस्य गुणान्'—नास्ति-ख. ज. उ. । ३. श्वेतेरेभ्यः-ख. ने. ज. उ. । ४. निवसन्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । माना जाता है, किन्तु यहाँ स्थूल का अर्थ व्यापक तथा सूक्ष्म का अर्थ व्याप्य करने के कारण व्याप्य (सूक्ष्म) पृथिवी आदि की अपेक्षा से जल आदि तत्त्वों की व्यापकता (स्थूल) के आधार पर स्थूल (व्यापक) तत्त्वों को वरीयता दी गई है ।
१५२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तेषां शब्दानां कारणरूपेण स्थितः कारणात्मना स्थितो ध्वनिनादः शब्दानां कारणम्। तदुक्तमभियुक्तैः— पिण्डो वाचकविस्तरस्य महतः संस्कारशेषा¹ स्थिति- र्नादोऽसौ तव देवि मूर्ध्नि समनासीमानमुल्लङ्घयन्। ²घण्टाक्वाण इव क्रमेण विरम³न्नन्यामणीयस्तनी- माजिघ्रन् परचिद्दशामनुभवन् मूर्तिं पुराणीमुमे⁴ ॥ इति । तन्मयं ⁵तल्लक्षकत्वात्। परं कामराजबीजस्थितककारलकारमध्यगतहकारा- क्षरम्। कोऽर्थः ? कामराजमध्यस्थितः षष्ठो हकार आकाशादिपञ्चभूतगतशब्द- पञ्चककारणनादरूपः कामराजबीजस्य स्थितिरूपतां लक्षयतीत्यर्थः ॥ ऊपर बताये गये पाँच प्रकार के शब्दों को उत्पन्न करने वाला ध्वनिमय नाद ही इन सबका कारण है। जैसा कि किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है— वर्ण, पद, वाक्यरूप इस विशाल शब्द विस्तार की जहाँ संस्कार के रूप में स्थिति बनी रहती है, उसी का नाम पिण्ड है। इसको नाद कहते हैं। इसका भाव यह है कि नाद के रूप में परिणत हुए पिण्ड मन्त्र में वर्ण, पद, वाक्य रूप शब्दप्रपंच की संस्कार के रूप में स्थिति रहती है। सारा शब्दप्रपंच यहाँ आकर शान्त हो जाता है। हे देवि उमे ! यह नाद ललाट से ऊपर बढ़ता हुआ जब समना की सीमा को लांघकर उन्मनावस्था में पहुँचता है, तब वह एक अनोखी सूक्ष्मतर अवस्था को स्पर्श करता हुआ परचिद्दशा रूप अपने पुराने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह कैसे होता है, इसका उदा- हरण है— घण्टा ध्वनि। जैसे घण्टे को बजाने से उत्पन्न हुई ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती हुई सनसनाहट के रूप में बदल कर अन्ततः विलीन हो जाती है, उसी तरह से नाद भी समना पर्यन्त सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था में पहुँचता हुआ अन्त में विलीन हो जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ।। कामराज बीज के ककार और लकार के बीच में विद्यमान छठा हकार इसी नादमय शब्द को लक्षित करता है। इसका अभिप्राय यह है कि कामराज बीज में स्थित छठा हकार आकाश आदि पाँच भूतों में विद्यमान पाँच शब्दों के कारणभूत छठे नादरूप शब्द का बोधक है। इससे कामराज बीज स्थिति का प्रतिनिधि है, इस बात की पुनः¹ पुष्टि हो जाती है। १. दोषा-ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । २. 'घण्टा ॰॰॰मुमे' नास्ति-क. ग. उ. । ३. न्नन्त्यां-ब. । ४. णीं मम-ख. ब. । ५. तल्लक्ष्यत्वात्-ख. ने. ज. झ. । १. कामराज बीज की स्थितिरूपता का प्रतिपादन पहले (२।२२-२३) किया जा चुका है।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५३ ननु हकारादिवर्णा आकाशादिभूतवाचका इत्युक्तम्, कथं शब्दादिपञ्चभूत- गुणानामपि वाचका इत्युच्यन्त इत्यत आह— भवेद् गुणवतां बीजं गुणानामपि वाचकम् ॥३७॥ गुणवताम्, गुणाः शब्दादयः पञ्च, तद्वतामाकाशादीनां पञ्चभूतानां बीजम् । जातावेकवचनम् । अत्र विद्यायां हकारादीनि पञ्चभूताक्षराणि व्यञ्जनानि । अत्रै- वोक्तम्—"हकाराद् व्योम संभूतम्" (२।२९) इत्यादिना १ । अतो बीजान्युच्यन्ते । ककारादिक्षकारान्तानां व्यञ्जनानां बीजत्वमुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— षण्ढवर्जंमहिमद्युतेः २स्वरा बिन्दुसर्गंरहिताश्च ये शुचेः । सर्व एव शशिनः कलाः३ शिवे योनयो विधृतबोजतः स्वराः४ ॥ इति । (श्लो० ४०) फिर प्रश्न उठता है कि पहले यह बताया गया था कि विद्यागत हकार आदि वर्ण आकाश आदि भूतों के वाचक हैं, अब कहा जा रहा है कि ये वर्ण भूतगत शब्द आदि गुणों के भी वाचक हैं । यह कैसे होगा ? इसी का उत्तर देते हैं— गुणवान् आकाश आदि के वाचक बीजभूत हकार आदि अक्षर आकाशादि- गत गुणों के भी वाचक हो जाते हैं ॥३७॥ यहाँ एकवचन में प्रयुक्त बीज शब्द बीज जाति का वाचक है । विद्या में विद्यमान बीजाक्षर शब्द आदि गुणों से युक्त आकाश आदि के तो वाचक हैं ही, वे आकाश आदि में विद्यमान गुणों के भी वाचक हो जाते हैं । यहाँ विद्या में पाँच भूतों के वाचक हकार आदि अक्षर व्यंजन हैं । पहले (२।२९) ही इस विषय का वर्णन किया जा चुका है । हकार आदि से आकाश आदि की इस उत्पत्ति के कारण ही इनको 'बीज' कहा गया है । ककार से क्षकार पर्यन्त व्यंजनों को चिद्गगनचन्द्रिका में 'बीज' नाम दिया गया है । जैसे कि— षण्ढ (ऋ ॠ ऌ ॡ) स्वरों को छोड़कर बाकी बारह स्वर सूर्य की बारह कलाओं के, बिन्दु और विसर्ग को भी छोड़कर बाकी दस स्वर अग्नि की १० कलाओं के और सभी १. इत्यादि-ख. ने. ज. झ. उ. । २. कला-ख. ने. ज. उ. । ३. कलाश्च ये योनयो-ख. ज. झ. उ. । ४. बीजकास्तदा-ख. ने. ज. उ. ।
१५४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः परापञ्चशिकायामप्युक्तम्—"द्विधेयं मातृका देवी बीजयोन्यात्मना स्थिता" (श्लो० ४०) इति । तानि तद्गुणानां शब्दादीनां वाचकानि लक्षकाणि, हकाराद्य- क्षराण्याकाशार्थेषु संकेतितत्वात्तद्गुणेषु शब्दादिषु लक्षकाण्येव । तदुक्तमभियुक्तैः— “साक्षात् संकेतितं योऽर्थमभिधत्ते स वाचकः” (का० प्र० २।७) इति । कोऽर्थः ? शब्दादिगुणवतामाकाशादिभूतानां यानि बीजानि वाचकानि १हकारादीनि, तानि तद्गुणानां शब्दादीनां लक्षकाणीत्यर्थः२ ॥३७॥ सोलह स्वर चन्द्र की १६ कलाओं के द्योतक हैं । हे देवि ! ये सभी स्वर१ बीजाक्षरों को धारण करने वाले हैं, अतः इनको ‘योनि' कहा जाता है ॥ परापञ्चाशिका में भी बताया गया है— “बीज और योनि के भेद से यह मातृका देवी दो रूपों में स्थित है”। आकाश आदि के अभिव्यंजक ये हकार आदि बीजाक्षर उन आकाश आदि के शब्द आदि गुणों को भी लक्षित करते हैं । हकार आदि अक्षरों का साक्षात् संकेतित (अभिधेय) अर्थ तो आकाश आदि ही हैं, किन्तु लक्षणा वृत्ति के द्वारा ये आकाशादिगत गुणों को भी लक्षित कर देते हैं । इस विषय में अभियुक्तों की उक्ति है—"साक्षात् संकेतित अर्थ को बताने वाला शब्द वाचक होता है”। इससे यह अभि- प्राय निकलता है कि शब्द आदि गुणों से संपन्न आकाश आदि भूतों के वाचक जो हकार आदि बीजाक्षर हैं, वे आकाशादिगत शब्द आदि गुणों का भी लक्षणा वृत्ति के द्वारा बोध कराते हैं ॥३७॥ १. ‘हकारादीनि' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. त्युक्तम्-ख. । १. सूर्य की १२, अग्नि की १० तथा सोम की १६ कलाओं की चर्चा योगिनीहृदय (३।१००-१०१) में हुई है और दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण से इनके नाम दिये हैं। वहाँ चन्द्र की १६ कलाओं में १६ स्वरों का, वह्नि की १० कलाओं में यादि क्षान्त दस वर्णों का तथा सूर्य की १२ कलाओं में ककार से ठकार पर्यन्त वर्णों का अनुलोम क्रम से तथा भकार से डकार पर्यन्त वर्णों का प्रतिलोम क्रम से विन्यास प्रदर्शित है। अतः चिद्गगनचन्द्रिका के प्रस्तुत श्लोक में द्वादश और दश स्वर केवल संख्या के सूचक माने जाने चाहिये । यहाँ स्वरों को योनि तथा व्यंजनों को बीज माना गया है । कर्रा अग्निहोत्र शास्त्री ने भी इसी मत का प्रतिपादन किया है । किन्तु मालिनी- विजय (३।१०-११) में स्वरों को बीज तथा व्यंजनों को योनि बताया गया है। अभिनव- गुप्त (तन्त्रसार,पृ० १५) इसी मत का अनुसरण करते हैं। आगे (३।१५३) दीपिकाकार भी स्वरों को बीज ही मानते हैं। सूर्य, वह्नि और सोम की ३८ कलाओं के समान अघोर आदि पाँच मन्त्रों की भी ३८ कलाएँ हैं। उनके नाम स्वच्छन्दतन्त्र (१।५३-५९) तथा नेत्रतन्त्र (२२।२६-३४) में देखे जा सकते हैं।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५५ लक्षणायां निमित्तमाह— कार्यकारणभावेन तयोरैक्यं विवक्षया । तयोः गुणगुणिनोः । कार्यकारणभावेन । गुणी कारणम्, गुणः कार्यम् । अतः कार्यकारणभावेनै¹कत्वविवक्षया विवक्षितमेवैकत्वम्, न तु तात्त्विकम् । गुणगुणिनोः कार्यकारणभावादेकत्वमारोप्य तत्संबन्धं निमित्तीकृत्य लक्षण्या गुणिशब्दा गुणेषु योज्यन्त² इत्यर्थः । तदुक्तं ³महास्वच्छन्दसंग्रहे— शब्दः ⁴शान्तत्वघोरत्वविशेषा⁵पन्नरूपकः । शब्दस्तु शब्दतन्मात्रं मृदूष्णकठिनश्चलः ॥ लक्षणा में कोई निमित्त होना चाहिये, उसी को बताते हैं— गुण और गुणी का कार्यकारणभाव संबन्ध होता है । उनकी एकता की ओर इंगित करना ही मात्र यहाँ लक्षणा का प्रयोजन है ॥ गुण और गुणी का कार्यकारणभाव संबन्ध होता है । इनमें से गुणी कारण और गुण कार्य है । अतः इस कार्यकारणभाव की एकता को बताना मात्र यहाँ लक्षणा का प्रयोजन है । अर्थात् यहाँ एकता की विवक्षामात्र है, इनमें वास्तविक एकता नहीं है । गुण और गुणी में कार्यकारणभाव संबन्ध के आधार पर इनमें एकता का आरोप कर देते हैं । इस एकता संबन्ध को ही निमित्त बना कर लक्षणा वृत्ति के द्वारा गुणी के वाचक शब्दों का प्रयोग गुणों में भी कर दिया जाता है । इस विषय का विस्तार महास्वच्छन्द- संग्रह में इस तरह से किया गया है— स्थूल रूप में शब्द ¹शान्त, घोर और मूढ नामक विशेष दशा को धारण कर लेता है । सूक्ष्म रूप में विद्यमान यही शब्द शब्दतन्मात्र कहलाता है । ²मृदु, उष्ण, कठिन, १. एकत्वं विवक्षितं न तु—ख. ने. ज. उ. । २. योज्याः—ख. उ. । ३. 'महा' नास्ति—झ. । ४. सा(शा)न्तद्वयोरर्थविशे—ख. ने. ज. उ. । ५. षोऽयं न रूपकः—ख. ज. उ., पः पञ्चरूपकः—ने. । १. सांख्यकारिका (श्लो० ३८) में पाँच तन्मात्राओं को अविशेष तथा उनसे उत्पन्न पाँच महाभूतों को विशेष संज्ञा दी गई है तथा इन विशेषों को शान्त, घोर और मूढ स्वभाव का बताया गया है । वाचस्पति मिश्र सत्त्वगुणमय सुखात्मक प्रकाशात्मक और लघुस्वभाव को शान्त, रजोगुणमय दुःखात्मक अव्यवस्थित स्वभाव को घोर तथा तमोगुणात्मक निराशा से भरे हुए भारी स्वभाव को मूढ बताते हैं । शान्त, घोर और मूढ स्वभाव के भोग्य विषयों का भोक्ता पुरुष भी इन स्वभावों से आक्रान्त हो जाता है । २. इस विषय का विस्तार और संक्षेप मतङ्गपारमेश्वर (वि० १९-२३ पटल), स्वच्छन्दतन्त्र (१२।१५-३०), मृगेन्द्रागम (वि० १२।१९-२९), तत्त्वसंग्रह (श्लो० २-४), भोगकारिका (श्लो० ५-२०), तत्त्वप्रकाश (श्लो० ६१-६३) आदि में देखा जा सकता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
३५६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः विशिष्टस्पर्शरूपश्च स्पर्शतन्मात्रसंज्ञकः । नीलपीतत्वशुक्लत्वविशिष्टं रूपमेव च ॥ रूपतन्मात्रमित्युक्तं १मधुरत्वादिसंयुतम् । रसतन्मात्रसंज्ञं तु सौरभादिविशेषितः ॥ गन्धः स्याद् गन्धतन्मात्रं तेभ्यो वै भूतपञ्चकम् । आकाशं शब्दतन्मात्रं नित्यं शब्दगुणं महत् ॥ व्यापकं निर्मलं तत्त्वमवकाशप्रदानकम् । स्पर्शतन्मात्रतो वायुश्चलद्रूपोऽनिलोऽभवत् ॥ जगत्प्राणोऽनिलो व्यूहप्रेरणं च लघुर्भवेत् । शब्दस्पर्शगुणः प्रोक्तो गमागमनकर्मकृत् ॥ शब्दस्पर्शरूपगुणं तेजस्तत्त्वं तु भास्वरम् । रूपतन्मात्रकार्यं च पाककर्मकरं शिवे ॥ रसतन्मात्रतो जातं वारितत्त्वं द्रवात्मकम् । शब्दस्पर्शरूपरसगुणं संग्रहकर्मकृत् ॥ चल आदि विशेष स्पर्शवाला तत्त्व स्पर्शतन्मात्र कहलाता है। नील, पीत, शुक्ल आदि विशिष्ट रूपों वाला तत्त्व रूपतन्मात्र कहा गया है। मधुरत्व आदि गुणों से विशिष्ट रसतन्मात्र और सुरभि (सुगन्ध) आदि से विशिष्ट गन्धतन्मात्र कहा गया है। इन्हीं से पांच भूतों की उत्पत्ति होती है। शब्दतन्मात्र से आकाश की अभिव्यक्ति होती है। शब्द गुण वाला यह आकाश नित्य, महान्, व्यापक और निर्मल है। अन्य सभी तत्त्वों को यह अवकाश देने वाला है, अर्थात् अन्य सभी भूत आकाश के द्वारा प्रदत्त अवकाश में ही स्थित हैं। स्पर्शतन्मात्र से वायु की उत्पत्ति होती है। यह वायु चंचल गति वाला है, जगत् का प्राण है, १व्यूहन और प्रेरण इसकी वृत्ति है और यह बहुत हल्का है। शब्द और स्पर्श ये दो गुण इसमें हैं। श्वास-प्रश्वास के रूप में गमन (बाहर जाना) और आगमन (भीतर आना) की क्रिया यही करता है। शब्द, स्पर्श और रूप गुण वाला भास्वर तेजस्तत्त्व रूपतन्मात्र का कार्य है। हे शिवे ! यह तत्त्व पाक क्रिया का निष्पादक है। रसतन्मात्र से द्रवात्मक जल तत्त्व निकलता है। इसमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस १. मधुरत्वोष्णसं-ख. ज. झ. उ. ।
- ऊपर उद्धृत स्थलों का अवलोकन कीजिये । टीकाकारों ने व्यूहन का अर्थ अवयव-घटन, अवयव-विरचन, विविध-वहन अथवा पुंजीकरण किया है। पांच भूतों में वायु पहला तत्त्व है, जो कि जागतिक पदार्थों को योजना बद्ध रूप से जुटाने में लगता है। वायु के इस व्यूहन और प्रेरण व्यापार की ही चर्चा प्रस्तुत उद्धरण में भी हुई है।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५७ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धपञ्च ¹गुणान्वितम् । पृथिवीतत्त्वमाख्यातं ²कठिनं सर्वधारणम् ॥ पृथ्व्यादिव्योमतत्त्वान्त³पञ्चकं पूर्वपूर्वकम् । कार्यदृष्ट्या⁴ समावृत्य वर्तते पञ्चकं क्रमात् ॥ इति⁵ ॥ पूर्वं विद्यास्थहकारपञ्चकस्य पञ्चभूतस्थितशब्दपञ्चक⁶लक्षकतामुक्त्वे- दानीं ⁷वाय्वादिभूतचतुष्टयगतं स्पर्शचतुष्टयं वायुवाचकबीजैर्लक्षयति— महामायात्रयेणापि कारणेन च बिन्दुना ॥ ३८ ॥ वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां च चतुष्टयम् । उत्पन्नं भावयेद् देवि स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ ३९ ॥ महामाया ईकारः, तेषां त्रयं बीजत्रयशिखरवर्तिनामीकाराणां बिन्दुद्वयार्ध- मात्रामयानां त्रयम् । कारणेन च बिन्दुना तदक्षर⁸त्रयकारणेनाकारहकारसामरस्य- रूपेण कामाख्येनोर्ध्वबिन्दुना । वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां चतुष्टयमुत्पन्नं ये चार गुण रहते हैं । यह तत्त्व संग्रह क्रिया का निष्पादक है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच गुणों से युक्त पृथिवी तत्त्व है । यह कठोर है और सबको धारण करने वाला है । पृथिवी से लेकर आकाश पर्यन्त पाँच तत्त्वों में पहला तत्त्व अपने कार्य तत्त्व को अपने में समेटे हुए रहता है ॥ विद्यास्थित पाँच हकार पाँच भूतों में स्थित पाँच शब्दों को लक्षित करते हैं, इस विषय का वर्णन करने के उपरान्त अब बताया जा रहा है कि विद्यागत वायुवाचक बीजों से वायु प्रभृति चार भूतों के चार प्रकार के स्पर्शों को लक्षित किया जाता है— हे देवि ! तीन महामायाओं और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और भूमिगत चार स्पर्शों को उत्पति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये, क्योंकि स्थूल और सूक्ष्म भूत के क्रम से स्पर्श गुण की अनुवृत्ति चार भूतों में मानी जाती है ॥३८-३९॥ महामाया शब्द यहाँ ईकार का वाचक है । श्रीविद्या में तीन ईकार हैं । इनकी स्थिति तीनों बीजों के अन्त में है तथा इनका आकार दो बिन्दु और हार्धकला से बना है । इनके अतिरिक्त एक कारण बिन्दु भी है । यह तीनों ईकाराक्षरों का कारण है और इसकी स्थिति अकारहकारसामरस्यमय ऊर्ध्व बिन्दु के रूप में है, जिसको काम बिन्दु १. गुणात्मकम्–ख. ने. ज. उ. । २. कथितं–ख. ज. उ. । ३. तत्त्वान्तं–ज. झ. उ. । ४. कार्यं व्यत्यास–ने. ज. झ. । ५. इतः परं केवलं कपुस्तके विद्यमानः पाठोऽग्रे सूक्ष्माक्षरेषु स्थापितः । ६. पञ्चकं पूर्वं कथयित्वे–क. ग. । ७. वायुवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयतीत्याह–ने. ज. झ. उ. । ८. त्रयं नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. ।