योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५५ लक्षणायां निमित्तमाह— कार्यकारणभावेन तयोरैक्यं विवक्षया । तयोः गुणगुणिनोः । कार्यकारणभावेन । गुणी कारणम्, गुणः कार्यम् । अतः कार्यकारणभावेनै¹कत्वविवक्षया विवक्षितमेवैकत्वम्, न तु तात्त्विकम् । गुणगुणिनोः कार्यकारणभावादेकत्वमारोप्य तत्संबन्धं निमित्तीकृत्य लक्षण्या गुणिशब्दा गुणेषु योज्यन्त² इत्यर्थः । तदुक्तं ³महास्वच्छन्दसंग्रहे— शब्दः ⁴शान्तत्वघोरत्वविशेषा⁵पन्नरूपकः । शब्दस्तु शब्दतन्मात्रं मृदूष्णकठिनश्चलः ॥ लक्षणा में कोई निमित्त होना चाहिये, उसी को बताते हैं— गुण और गुणी का कार्यकारणभाव संबन्ध होता है । उनकी एकता की ओर इंगित करना ही मात्र यहाँ लक्षणा का प्रयोजन है ॥ गुण और गुणी का कार्यकारणभाव संबन्ध होता है । इनमें से गुणी कारण और गुण कार्य है । अतः इस कार्यकारणभाव की एकता को बताना मात्र यहाँ लक्षणा का प्रयोजन है । अर्थात् यहाँ एकता की विवक्षामात्र है, इनमें वास्तविक एकता नहीं है । गुण और गुणी में कार्यकारणभाव संबन्ध के आधार पर इनमें एकता का आरोप कर देते हैं । इस एकता संबन्ध को ही निमित्त बना कर लक्षणा वृत्ति के द्वारा गुणी के वाचक शब्दों का प्रयोग गुणों में भी कर दिया जाता है । इस विषय का विस्तार महास्वच्छन्द- संग्रह में इस तरह से किया गया है— स्थूल रूप में शब्द ¹शान्त, घोर और मूढ नामक विशेष दशा को धारण कर लेता है । सूक्ष्म रूप में विद्यमान यही शब्द शब्दतन्मात्र कहलाता है । ²मृदु, उष्ण, कठिन, १. एकत्वं विवक्षितं न तु—ख. ने. ज. उ. । २. योज्याः—ख. उ. । ३. 'महा' नास्ति—झ. । ४. सा(शा)न्तद्वयोरर्थविशे—ख. ने. ज. उ. । ५. षोऽयं न रूपकः—ख. ज. उ., पः पञ्चरूपकः—ने. । १. सांख्यकारिका (श्लो० ३८) में पाँच तन्मात्राओं को अविशेष तथा उनसे उत्पन्न पाँच महाभूतों को विशेष संज्ञा दी गई है तथा इन विशेषों को शान्त, घोर और मूढ स्वभाव का बताया गया है । वाचस्पति मिश्र सत्त्वगुणमय सुखात्मक प्रकाशात्मक और लघुस्वभाव को शान्त, रजोगुणमय दुःखात्मक अव्यवस्थित स्वभाव को घोर तथा तमोगुणात्मक निराशा से भरे हुए भारी स्वभाव को मूढ बताते हैं । शान्त, घोर और मूढ स्वभाव के भोग्य विषयों का भोक्ता पुरुष भी इन स्वभावों से आक्रान्त हो जाता है । २. इस विषय का विस्तार और संक्षेप मतङ्गपारमेश्वर (वि० १९-२३ पटल), स्वच्छन्दतन्त्र (१२।१५-३०), मृगेन्द्रागम (वि० १२।१९-२९), तत्त्वसंग्रह (श्लो० २-४), भोगकारिका (श्लो० ५-२०), तत्त्वप्रकाश (श्लो० ६१-६३) आदि में देखा जा सकता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)