योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः विशिष्टस्पर्शरूपश्च स्पर्शतन्मात्रसंज्ञकः । नीलपीतत्वशुक्लत्वविशिष्टं रूपमेव च ॥ रूपतन्मात्रमित्युक्तं १मधुरत्वादिसंयुतम् । रसतन्मात्रसंज्ञं तु सौरभादिविशेषितः ॥ गन्धः स्याद् गन्धतन्मात्रं तेभ्यो वै भूतपञ्चकम् । आकाशं शब्दतन्मात्रं नित्यं शब्दगुणं महत् ॥ व्यापकं निर्मलं तत्त्वमवकाशप्रदानकम् । स्पर्शतन्मात्रतो वायुश्चलद्रूपोऽनिलोऽभवत् ॥ जगत्प्राणोऽनिलो व्यूहप्रेरणं च लघुर्भवेत् । शब्दस्पर्शगुणः प्रोक्तो गमागमनकर्मकृत् ॥ शब्दस्पर्शरूपगुणं तेजस्तत्त्वं तु भास्वरम् । रूपतन्मात्रकार्यं च पाककर्मकरं शिवे ॥ रसतन्मात्रतो जातं वारितत्त्वं द्रवात्मकम् । शब्दस्पर्शरूपरसगुणं संग्रहकर्मकृत् ॥ चल आदि विशेष स्पर्शवाला तत्त्व स्पर्शतन्मात्र कहलाता है। नील, पीत, शुक्ल आदि विशिष्ट रूपों वाला तत्त्व रूपतन्मात्र कहा गया है। मधुरत्व आदि गुणों से विशिष्ट रसतन्मात्र और सुरभि (सुगन्ध) आदि से विशिष्ट गन्धतन्मात्र कहा गया है। इन्हीं से पांच भूतों की उत्पत्ति होती है। शब्दतन्मात्र से आकाश की अभिव्यक्ति होती है। शब्द गुण वाला यह आकाश नित्य, महान्, व्यापक और निर्मल है। अन्य सभी तत्त्वों को यह अवकाश देने वाला है, अर्थात् अन्य सभी भूत आकाश के द्वारा प्रदत्त अवकाश में ही स्थित हैं। स्पर्शतन्मात्र से वायु की उत्पत्ति होती है। यह वायु चंचल गति वाला है, जगत् का प्राण है, १व्यूहन और प्रेरण इसकी वृत्ति है और यह बहुत हल्का है। शब्द और स्पर्श ये दो गुण इसमें हैं। श्वास-प्रश्वास के रूप में गमन (बाहर जाना) और आगमन (भीतर आना) की क्रिया यही करता है। शब्द, स्पर्श और रूप गुण वाला भास्वर तेजस्तत्त्व रूपतन्मात्र का कार्य है। हे शिवे ! यह तत्त्व पाक क्रिया का निष्पादक है। रसतन्मात्र से द्रवात्मक जल तत्त्व निकलता है। इसमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस १. मधुरत्वोष्णसं-ख. ज. झ. उ. ।
- ऊपर उद्धृत स्थलों का अवलोकन कीजिये । टीकाकारों ने व्यूहन का अर्थ अवयव-घटन, अवयव-विरचन, विविध-वहन अथवा पुंजीकरण किया है। पांच भूतों में वायु पहला तत्त्व है, जो कि जागतिक पदार्थों को योजना बद्ध रूप से जुटाने में लगता है। वायु के इस व्यूहन और प्रेरण व्यापार की ही चर्चा प्रस्तुत उद्धरण में भी हुई है।