योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५७ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धपञ्च ¹गुणान्वितम् । पृथिवीतत्त्वमाख्यातं ²कठिनं सर्वधारणम् ॥ पृथ्व्यादिव्योमतत्त्वान्त³पञ्चकं पूर्वपूर्वकम् । कार्यदृष्ट्या⁴ समावृत्य वर्तते पञ्चकं क्रमात् ॥ इति⁵ ॥ पूर्वं विद्यास्थहकारपञ्चकस्य पञ्चभूतस्थितशब्दपञ्चक⁶लक्षकतामुक्त्वे- दानीं ⁷वाय्वादिभूतचतुष्टयगतं स्पर्शचतुष्टयं वायुवाचकबीजैर्लक्षयति— महामायात्रयेणापि कारणेन च बिन्दुना ॥ ३८ ॥ वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां च चतुष्टयम् । उत्पन्नं भावयेद् देवि स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ ३९ ॥ महामाया ईकारः, तेषां त्रयं बीजत्रयशिखरवर्तिनामीकाराणां बिन्दुद्वयार्ध- मात्रामयानां त्रयम् । कारणेन च बिन्दुना तदक्षर⁸त्रयकारणेनाकारहकारसामरस्य- रूपेण कामाख्येनोर्ध्वबिन्दुना । वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां चतुष्टयमुत्पन्नं ये चार गुण रहते हैं । यह तत्त्व संग्रह क्रिया का निष्पादक है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच गुणों से युक्त पृथिवी तत्त्व है । यह कठोर है और सबको धारण करने वाला है । पृथिवी से लेकर आकाश पर्यन्त पाँच तत्त्वों में पहला तत्त्व अपने कार्य तत्त्व को अपने में समेटे हुए रहता है ॥ विद्यास्थित पाँच हकार पाँच भूतों में स्थित पाँच शब्दों को लक्षित करते हैं, इस विषय का वर्णन करने के उपरान्त अब बताया जा रहा है कि विद्यागत वायुवाचक बीजों से वायु प्रभृति चार भूतों के चार प्रकार के स्पर्शों को लक्षित किया जाता है— हे देवि ! तीन महामायाओं और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और भूमिगत चार स्पर्शों को उत्पति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये, क्योंकि स्थूल और सूक्ष्म भूत के क्रम से स्पर्श गुण की अनुवृत्ति चार भूतों में मानी जाती है ॥३८-३९॥ महामाया शब्द यहाँ ईकार का वाचक है । श्रीविद्या में तीन ईकार हैं । इनकी स्थिति तीनों बीजों के अन्त में है तथा इनका आकार दो बिन्दु और हार्धकला से बना है । इनके अतिरिक्त एक कारण बिन्दु भी है । यह तीनों ईकाराक्षरों का कारण है और इसकी स्थिति अकारहकारसामरस्यमय ऊर्ध्व बिन्दु के रूप में है, जिसको काम बिन्दु १. गुणात्मकम्–ख. ने. ज. उ. । २. कथितं–ख. ज. उ. । ३. तत्त्वान्तं–ज. झ. उ. । ४. कार्यं व्यत्यास–ने. ज. झ. । ५. इतः परं केवलं कपुस्तके विद्यमानः पाठोऽग्रे सूक्ष्माक्षरेषु स्थापितः । ६. पञ्चकं पूर्वं कथयित्वे–क. ग. । ७. वायुवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयतीत्याह–ने. ज. झ. उ. । ८. त्रयं नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. ।