भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 208

१५८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः लक्ष्यं भावयेत् । स्थूलसूक्ष्मविभेदतः । सूक्ष्माणि पृथिव्यप्तेजांसि, स्थूलो वायुरर्वा- चीनेभ्यः । अत एव एवंविधेन ईकारत्रयेणापि लक्षिता बिन्दवः ¹षट्संख्याकाः । कारणं बिन्दुः समष्टिवृत्तं हि, षड्बिन्दुलाञ्छितवृत्तात्मकत्वाद् वायुमण्डलस्य । तदुक्तमभियुक्तैः—"कण्ठादितालुपर्यन्तं वृत्तं षड्बिन्दुलाञ्छितम् । धूम्रम्" इति । [एवमन्यत्रापि— समष्टिबिन्दुना वायुः स्थूलसूक्ष्मप्रभेदतः ।] तद्वायुमण्डलवाचकेन ईकारत्रयेण समष्टिबिन्दुना च स्थूलसूक्ष्मविभेदतो वाय्वादि²भूतचतुष्टयस्थितं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयेदित्यर्थः ॥ ३८-३९ ॥ वायुवाचकैर्वायुगुणं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयित्वेदानीं तेजोवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं रूपत्रयं लक्षयति—

कहते हैं । इन तीन ईकारों और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और भूमिगत चार प्रकार के स्पर्श उत्पन्न हुए हैं, ऐसी भावना करनी चाहिये । इन चतुर्विध स्पर्शों की उत्पत्ति स्थूल-सूक्ष्म के भेद से होती है । इनमें पृथिवी, जल और तेज सूक्ष्म तथा वायु इनसे स्थूल है । ऊपर बताया गया है कि ईकार का स्वरूप दो बिन्दुओं से बना है । तीन ईकारों में मिलकर छः बिन्दु हुए और कारण बिन्दु समष्टि वृत्त का स्वरूप धारण कर लेता है । इस तरह से छः बिन्दुओं से लांछित वृत्ताकार ¹वायुमण्डल का स्वरूप इससे बन जाता है । किसी अभियुक्त ने वायुमण्डल का स्वरूप बताया है—"कण्ठ से तालु पर्यन्त वृत्ताकार छः बिन्दुओं से लांछित वायुमण्डल होता है । यह धूम्र वर्ण का है" । ²[अन्यत्र भी कहा गया है—"स्थूल और सूक्ष्म के भेद से समष्टि बिन्दु वायुमण्डल का बोध कराता है ।"] इस तरह से वायुमण्डल के वाचक तीन ईकार और समष्टि बिन्दु में स्थूल और सूक्ष्म के भेद से वायु प्रभृति चार भूतों में विद्यमान चार स्पर्शों की भावना करनी चाहिये ।।३८-३९।। विद्यागत वायुवाचक अक्षरों से वायु के गुणभूत चार स्पर्शों को लक्षित करने के बाद अब तेजोवाचक अक्षरों में तेजोगत रूपत्रय की भावना बताते हैं—

१. षट् सन्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'भूत' नास्ति—ख. ने. ज झ. उ. । १. वायुमण्डल का यह स्वरूप मूल ग्रन्थ (१।४२) में भी बताया गया है । २. कोष्ठक में संस्कृत के जिस अंश की व्याख्या की गई है, वह केवल एक मातृका में उपलब्ध है और पूर्व श्लोक की व्याख्या में महास्वच्छन्दसंग्रह के उद्धरण के बाद रखा गया है । वहाँ उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है, अतः हमने प्रसंग के अनुसार इसको यहाँ रखकर उसका भाषानुवाद किया है ।