भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५९ रूपाणां त्रितयं तद्वत् त्रिभी रेफैर्विभावितम् । रूपाणां त्रितयं वह्निवारिभूमिष्ठानां रूपाणां त्रितयं त्रिभो रेफैर्विभावितं लक्षितम् ॥ ननु रूपं पृथिव्यप्तेजसां साधारणम्, कथं तेजोबीजेन रेफेण लक्षितमित्यत आह— प्रधानं तेजसो रूपं तद्बीजेन हि जन्यते ॥४०॥ १सत्यं त्रिष्वपि भूतेषु विद्यते रूपम्, तथापि वाय्वाकाशयोरभावात् प्रथमं तेजस एव२ रूपं प्रधानम् । पश्चादितरयोर्भूतयोस्तद्बीजेन रेफेण जन्यते ३प्रका- श्यते । जननं प्रादुर्भावः ॥४०॥ पूर्वं तेजोवाचकैरक्षरैस्तेजोगुणं रूपत्रयं लक्षयित्वेदानीमब्वाचकैरक्षरैस्तद्गुणं रसद्वयं लक्षयति— विद्यास्थैश्चन्द्रबीजैस्तु स्थूलः सूक्ष्मो रसः स्मृतः । इसी तरह से विद्यागत तीन रेफों में तीन रूपों की भावना करे ॥ तेज, जल और पृथिवीगत रूप ही रूपत्रय के नाम से वर्णित है । विद्यागत तीन रेफों से इनकी उत्पत्ति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये ॥ रूप गुण पृथिवी, जल और तेज तीनों में रहता है, तब इसकी उत्पत्ति अग्निबीज रेफ से कैसे मानी जाती है ? इसका समाधान करते हैं— रूप गुण प्रधानतः तेजस्तत्त्व में ही रहता है, अतः उसकी उत्पत्ति अग्निबीज से ही मानी जाती है ॥४०॥ आपका यह कहना ठीक है कि तीनों भूतों में रूप रहता है, तो भी वायु और आकाश में तो यह है नहीं । उसके बाद प्रधानतः इसकी स्थिति सर्वप्रथम अग्नि में ही मानी जाती है । जल और पृथिवी में रूप की उत्पत्ति इसके बाद ही होती है और वह भी अग्निबीज रेफ के द्वारा ही लक्षित होती है । इस तरह अग्निबीज रेफ ही तीनों तत्त्वों में रूप को प्रकाशित करता है । इस पूरे प्रकरण में उत्पत्ति का अर्थ प्रादुर्भाव करना चाहिये ॥४०॥ इस तरह से अग्नितत्त्व के वाचक अक्षरों से त्रिविध रूपों की उत्पत्ति बताने के बाद अब जलतत्त्व के वाचक अक्षरों से दो प्रकार के रसों की उत्पत्ति बताते हैं— विद्यागत चन्द्रबीजों से स्थूल और सूक्ष्म रस की निष्पत्ति होती है ॥ १ 'सत्यं' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'एव' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'प्रकाश्यते' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. ।