भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210

१६० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः १विद्याबीजस्थैश्चन्द्रबीजैः सकारैः। अभिधानमात्रमेतत्। तदुक्तमभि- युक्तैः— व्योमेन्दुवह्न्यधरबिन्दुभिरेकमन्य२द्रक्ताच्छकेन्द्रशिखिभिः सरमार्थचन्द्रैः। अन्यद् द्युशीतकरपावकमन्वमन्तैर्बीजैरमोभिरुदिता त्रिपुरेति विद्या॥ इति। (प्र० सा० ९।३) स्थूलः सूक्ष्मः। स्थूलो रसोऽप्तत्त्वगतः, व्यापकत्वात्। सूक्ष्मो रसो भूतत्त्वगतः, व्याप्यत्वात्। स्मृतः भावितः। स्मृतिर्हि भावना॥ ननु विद्यायां३ सकारत्रयमस्ति, अप्पृथिव्योस्तु रसद्वयमेव, इतरेण सकारेण किमुच्यत इत्यत आह— श्रीविद्या के बीजों में चन्द्रबीज (सकार) भी है। चन्द्रबीज सकार का १अभिधान है, इसमें प्रपंचसार का यह वचन प्रमाण है— व्योम हकार, इन्दु सकार, वह्नि रेफ, अधर ऐकार, बिन्दु अनुस्वार—इन सबके मिलने पर त्रिपुरा विद्या का प्रथम बीज; रक्त हकार, अच्छ सकार, ककार, इन्द्र लकार, शिखी रेफ, रमा ईकार, अर्धचन्द्र बिन्दु—इन सबके मिलने पर द्वितीय बीज तथा द्यु हकार, शीतकर सकार, पावक रेफ, मनु औकार, अमन्त विसर्ग—इन सबके मिलने पर तृतीय बीज बनता है। इन तीन बीजों वाली विद्या ही २त्रिपुरा विद्या कही जाती है। जलतत्त्वगत रस स्थूल (व्यापक) और पृथिवी तत्त्वगत सूक्ष्म (व्याप्य) है, क्योंकि पृथिवी की अपेक्षा जलतत्त्व अधिक व्यापक (बड़ा) है। अतः जलगत रस की स्थूल (व्यापक) रूप में और पृथिवीगत रस की सूक्ष्म (व्याप्य) रूप में भावना की जाती है॥ प्रश्न उठता है कि विद्या में तो तीन सकार हैं, जल और पृथ्वी में रस दो ही प्रकार का है, तब तीसरे सकार का क्या प्रयोजन है— १. 'विद्याबीजस्थैः' नास्ति—ख. ने. ज. ब. उ.। २. 'रक्ताच्छ....विद्या' नास्ति— ख. ग. ने. ज. ब.। ३. विद्यायामस्यां—ख. ने. ज. झ. उ.।

  1. इसका अभिप्राय यह है कि चन्द्र शब्द से सकार का बोध होता है। प्रपंचसार के जिस वचन को यहाँ प्रमाण के रूप में उद्धृत किया गया है, उसमें चन्द्र शब्द से विद्यागत सकार का उद्धार बताया गया है।
  2. नि० षो० की व्याख्या ऋजुविमर्शिनी (पृ० १०६) में इस श्लोक को आवाहनी विद्या के प्रसंग में उद्धृत किया गया है। इस विद्या का विनियोग त्रिपुरा के आवाहन के लिये किया जाता है, अतः प्रपंचसार में यह त्रिपुरा के नाम से ही संबोधित कर दी गई है।
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक) · पृष्ठ 210, कुल 485 में से · BharatKosha