भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६१ संबन्धो विदितो लोके रसस्याप्यमृतस्य च ॥४१॥ अमृतस्य सुधाया रसस्यापि संबन्धो लोके विदितः सुरासुरैरपांनिधौ मध्य- माने तत्सारभूतममृतं समुदितमिति पुराणप्रसिद्ध्या¹ लोके विदितः² परिज्ञातः³ । अत्राप्तत्त्वसारभूतत्वात् तद्गुणो रसस्तृतीयसकारेण लक्ष्यते । कोऽर्थः ? अप्त्तत्त्वं स्थूलम्, अमृतं तत्सारभूतं सूक्ष्मम्, तद्व्याप्या पृथिवी च सूक्ष्मा । तेन सलिलामृत- पृथिव्यन्तरे⁴ त्रिधा स्थितो रसो विद्यास्थैस्त्रिभिः सकारैर्लक्ष्यत इत्यर्थः ॥४१॥ पूर्वमब्वाचकैरक्षरैरबगुणं रसत्रयं लक्षयित्वेदानीं पृथिवीवाचकैर्वर्णैः पृथिवीगुणं गन्धं लक्षयति— ⁵वसुन्धरागुणो गन्धस्तल्लिपिर्गन्धवाचिका । वसुन्धरायाः पृथिव्याः, गुणो गन्धः । तल्लिपिः पृथिवीवाचकवर्णो लकारः । गन्धवाचिका गन्धस्य⁶ परिभाषणकरी । लोक में अमृत रस का भी संबन्ध विदित है । इस अमृत का ही तृतीय सकार से बोध होता है ॥४१॥ अमृत (सुधा) के रस का भी संबन्ध लोक में विदित है कि देव और दानवों ने मिलकर क्षीरसमुद्र का जब मन्थन किया था, तो समुद्र के जल से उसके सार के रूप में अमृत निकला था । पुराणवर्णित यह कथा लोक में प्रसिद्ध है । यह अमृत जलतत्त्व का सार है । अतः जल का यह अमृतमय रस विद्यागत तृतीय सकार से लक्षित होता है । इनमें जलतत्त्व स्थूल (व्यापक) है । जलतत्त्व का सारभूत अमृत सूक्ष्म (व्याप्य) है और जलतत्त्व की व्याप्य पृथिवी का रस भी सूक्ष्म (व्याप्य) है । इस तरह जल, अमृत और पृथिवी में विद्यमान त्रिविध रस विद्यागत तीन सकारों से लक्षित होता है ॥४१॥ इस तरह जलतत्त्व के वाचक अक्षरों से त्रिविध रस को लक्षित करने के बाद अब पृथिवीवाचक वर्णों से पृथिवीगत गन्ध गुण की वासना बताते हैं— गन्ध पृथिवी का गुण है । पृथिवी का वाचक वर्ण इस गन्ध को लक्षित करता है ॥ वसुन्धरा (पृथिवी) का गुण गन्ध है । उसकी लिपि, अर्थात् पृथिवी तत्त्व का वाचक वर्ण लकार, गन्ध की वाचिका है, पृथिवीवाचक वर्ण तद्गत गन्ध को भी लक्षित करता है ॥ १. प्रसिद्धं-ख. ने. ज. उ. । २. 'विदितः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ३. ज्ञातम् । अतोऽमृतसार-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. न्तरस्थितो-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. वसु- नामाऽपि गन्ध-क. । ६. गन्धस्य प्रकाशिका-ने. ज. झ. उ. ११