भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 212

१६२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु विद्यायां लकारत्रयमस्ति, तत्रैकेन लकारेण पृथिवी १संस्थितो गुणो गन्धो लक्षितः, शिष्टाभ्यां २लकाराभ्यां किं क्रियत इत्यत आह— भुवनत्रयसंबन्धात् त्रिधात्वं तु महेश्वरि ॥४२॥ भुवनत्रयं लोकत्रयम्, तत्संबन्धात् लोकत्रयाधारत्वात्, आधाराधेयभावः३ संबन्धः, तस्मात् संबन्धाद्धेतोः पृथिव्या ४स्त्रिधात्वम्। तेन पृथिवी ५भागत्रयगत- गन्धत्रयलक्षकं लकारत्रयमित्यर्थः ॥४२॥ “हकाराद् व्योम संभूतं ककारात्तु प्रभञ्जनः” (२।२९) ६इत्यत्र वायुवाचक- तयोक्तस्य७ ककारस्य प्रमातृवाचकत्वेनापि वक्तुं शक्यत्वादन्यैरक्षरैः स्पर्शचतुष्टयं लक्षयित्वेदानीं ककारत्रयेण प्रमातृत्रयं लक्षयति— अशुद्धशुद्धमिश्राणां प्रमातॄणां परं वपुः। क्रोधीशत्रितयेनाथ विद्यास्थेन प्रकाश्यते ॥४३॥ यहाँ पुनः प्रश्न उठता है कि विद्या में तो तीन लकार हैं, इनमें से एक से पृथिवीगत गुण गन्ध लक्षित हो जायगा, बाकी दो लकारों का क्या प्रयोजन है ? अब इसी का उत्तर देते हैं— हे महेश्वरि ! भुवन (लोक) तीन होते हैं। इन तीनों भुवनों को लक्षित करने के अभिप्राय से विद्या में तीन लकार स्थित हैं ॥ ४२ ॥ पृथिवी तीनों भुवनों (लोकों) से संबद्ध है। तीनों लोक इसी पर ठहरे हुए हैं, अतः इनमें परस्पर आधाराधेयभाव संबन्ध है। इस संबन्ध के कारण पृथिवी तीन लोकों के रूप में विभक्त मान ली जाती है। पृथिवी के इन तीन भागों में विद्यमान तीन गन्धों को लक्षित करने के लिये ही विद्या में तीन लकार स्थित हैं ॥ ४२ ॥ पहले (२।२९) बताया गया है कि हकार से आकाश और ककार से वायुतत्त्व की अभिव्यक्ति हुई। वायुतत्त्व के वाचक विद्यागत ककार तीन प्रमाताओं के भी वाचक हो सकते हैं, अतः महामाया प्रभृति वर्णों से स्पर्शचतुष्टय की वासना (२।३८) बता कर अब यहाँ विद्यागत तीन ककार वर्णों से तीन प्रमाताओं को लक्षित करते हैं— अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र स्वभाव वाले त्रिविध प्रमाताओं का वासनात्मक स्वरूप विद्यागत तीन क्रोधीश ( ककार ) वर्णों से लक्षित होता है ॥ ४३ ॥ १. 'संस्थितो' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । २. 'लकाराभ्यां' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । ३. 'भावः' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । ४. स्त्रित्वम्—ख. ने. ज. झ. ड. । ५. भागत्रयाल्लोकत्रय—क. ग. । ६. इत्येवं—ख. ने. ज. झ. ड. । ७. क्तस्यापि— झ. ड. । ८. णां प्र—ख. ने. ज. झ. ड. । ९. न्थितो—ख. ज. ।