योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६३ अशुद्धाः प्रमातारो भेद¹धीमात्रसाराः शिवाहमभावभावनाविहीनाः सकलाः पशवः । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— पशवस्त्रिप्रकाराः स्युस्तेष्वेके सकला मताः । प्रलयाकलनामानस्तेषां केचिन्महेश्वरि ॥ विज्ञानकेवलास्त्वन्ये तेषां रूपं क्रमाच्छृणु । अनादिमलसंच्छन्नो मायाकर्मवृतोऽविभुः ॥ शरीरी शिवतत्त्वाज्ञो² भेदैकरसिको लघुः । सर्वदा कर्मकर्ता³ च स्वकर्मफलभोजकः ॥ नित्यं विषयसंसक्तो⁴ बोध्यः शोध्यः पुमानयम् । इति । शुद्धाः प्रमातारः पक्वमलविज्ञानाः शिवतावन्मात्रसारा ⁵विज्ञानकेवलाः पशवः । तदुक्तं ⁶स्वच्छन्दसंग्रहे— मात्र भेदबुद्धि की ही जिनमें प्रधानता रहती है, ऐसे प्रमाता अशुद्ध वर्ग के अन्त- र्गत आते हैं । मैं शिव ही हूँ, इस तरह की भावना वे नहीं कर पाते । इनको सकल पशु कहा जाता है । स्वच्छन्दसंग्रह में ये इस तरह से वर्णित हैं— पशु तीन प्रकार के होते हैं । कुछ सकल पशु होते हैं । हे महेश्वरि ! इनमें से कुछ प्रलयाकल नाम वाले और दूसरे ¹विज्ञानकेवल नाम वाले बन जाते हैं । तुम इन तीनों पशुओं के स्वरूप को क्रमशः सुनो । अनादि आणव मल से घिरा हुआ, मायीय और कार्म मल से भी आवृत पशु अपने विभु (व्यापक) स्वरूप को खो बैठता है । वह अपने शरीर तक ही सीमित हो जाता है । शिवतत्त्व को वह नहीं जान पाता । उसमें भेदबुद्धि (द्वैत दृष्टि) की ही प्रधानता रहती है । वह बहुत लघु हो जाता है, अपने चंचल (हलके) स्वभाव के कारण अपनी गंभीरता को खो बैठता है । वह सदा अच्छे-बुरे कर्म करता रहता है और फिर अपने किये इन कर्मों का फल भी भोगता रहता है । विषयों में सदा आसक्त रहने वाले इस सकल नाम के पशुप्रमाता का बोधन और शोधन आवश्यक है, मन्त्रोपदेश और दीक्षा द्वारा गुरु को इनका बोधन और शोधन करना चाहिये ॥ मायीय और कार्म मल जिनके परिपक्व हो गये हैं, द्वैत दृष्टि के हट जाने से जो अपने को शिवममय ही समझते हैं, ऐसे शुद्ध प्रमाता विज्ञानकेवल नामक पशु कहलाते हैं । स्वच्छन्दसंग्रह में ये इस तरह से वर्णित हैं— १. 'धी' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. तत्त्वज्ञो—ख. ग. झ. उ. । ३. कान्तारे— ज. । ४. संरक्तो भाव्यः साध्यः—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. ज्ञान—ख. ने. ज. झ. । ६. महास्व—ख. ग. झ. उ. । १. सिद्धान्त शैव ग्रन्थों में वर्णित विज्ञानाकल को ही यहाँ विज्ञानकेवल नाम से दिया गया है । अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र प्रमाताओं के क्रम के आधार पर यहाँ सकल, विज्ञान-