भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६३ अशुद्धाः प्रमातारो भेद¹धीमात्रसाराः शिवाहमभावभावनाविहीनाः सकलाः पशवः । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— पशवस्त्रिप्रकाराः स्युस्तेष्वेके सकला मताः । प्रलयाकलनामानस्तेषां केचिन्महेश्वरि ॥ विज्ञानकेवलास्त्वन्ये तेषां रूपं क्रमाच्छृणु । अनादिमलसंच्छन्नो मायाकर्मवृतोऽविभुः ॥ शरीरी शिवतत्त्वाज्ञो² भेदैकरसिको लघुः । सर्वदा कर्मकर्ता³ च स्वकर्मफलभोजकः ॥ नित्यं विषयसंसक्तो⁴ बोध्यः शोध्यः पुमानयम् । इति । शुद्धाः प्रमातारः पक्वमलविज्ञानाः शिवतावन्मात्रसारा ⁵विज्ञानकेवलाः पशवः । तदुक्तं ⁶स्वच्छन्दसंग्रहे— मात्र भेदबुद्धि की ही जिनमें प्रधानता रहती है, ऐसे प्रमाता अशुद्ध वर्ग के अन्त- र्गत आते हैं । मैं शिव ही हूँ, इस तरह की भावना वे नहीं कर पाते । इनको सकल पशु कहा जाता है । स्वच्छन्दसंग्रह में ये इस तरह से वर्णित हैं— पशु तीन प्रकार के होते हैं । कुछ सकल पशु होते हैं । हे महेश्वरि ! इनमें से कुछ प्रलयाकल नाम वाले और दूसरे ¹विज्ञानकेवल नाम वाले बन जाते हैं । तुम इन तीनों पशुओं के स्वरूप को क्रमशः सुनो । अनादि आणव मल से घिरा हुआ, मायीय और कार्म मल से भी आवृत पशु अपने विभु (व्यापक) स्वरूप को खो बैठता है । वह अपने शरीर तक ही सीमित हो जाता है । शिवतत्त्व को वह नहीं जान पाता । उसमें भेदबुद्धि (द्वैत दृष्टि) की ही प्रधानता रहती है । वह बहुत लघु हो जाता है, अपने चंचल (हलके) स्वभाव के कारण अपनी गंभीरता को खो बैठता है । वह सदा अच्छे-बुरे कर्म करता रहता है और फिर अपने किये इन कर्मों का फल भी भोगता रहता है । विषयों में सदा आसक्त रहने वाले इस सकल नाम के पशुप्रमाता का बोधन और शोधन आवश्यक है, मन्त्रोपदेश और दीक्षा द्वारा गुरु को इनका बोधन और शोधन करना चाहिये ॥ मायीय और कार्म मल जिनके परिपक्व हो गये हैं, द्वैत दृष्टि के हट जाने से जो अपने को शिवममय ही समझते हैं, ऐसे शुद्ध प्रमाता विज्ञानकेवल नामक पशु कहलाते हैं । स्वच्छन्दसंग्रह में ये इस तरह से वर्णित हैं— १. 'धी' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. तत्त्वज्ञो—ख. ग. झ. उ. । ३. कान्तारे— ज. । ४. संरक्तो भाव्यः साध्यः—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. ज्ञान—ख. ने. ज. झ. । ६. महास्व—ख. ग. झ. उ. । १. सिद्धान्त शैव ग्रन्थों में वर्णित विज्ञानाकल को ही यहाँ विज्ञानकेवल नाम से दिया गया है । अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र प्रमाताओं के क्रम के आधार पर यहाँ सकल, विज्ञान-