भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१६४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः मलमात्रेण संच्छन्नः¹ पशुर्विज्ञानकेवलः । सुपक्वमलविज्ञानकेवलः स स्वयं प्रिये ॥ ²सुतीव्रशक्तिपातेन कुरुते ³तान् स केवलान् । इति । मिश्राः प्रमातारः पुर्यष्टकसूक्ष्मशरीरमात्रसंबद्धाः प्रारब्धकर्मानुभवार्थमनेक- योनिषु संभूय तत्तत्कर्म⁴फलानुभवेन कर्मद्वयसाम्ये सति सुपक्कमलकर्माणो गुरुं विनाऽपि⁵ शिवानुग्रहशालिनः क्रियाज्ञानसाधारणाः प्रलयाकलाः पशवः । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— मिश्राः प्रमातृरूपाः स्युः प्रलयाकलसंज्ञकाः । पुर्यष्टकशरीराश्च स्वस्वकर्मवशात् प्रिये ॥ जो केवल आणव मल से घिरा हुआ है, ऐसे पशु को विज्ञानकेवल कहते हैं। मायीय और कार्म मल के परिपक्व हो जाने से यह विज्ञानकेवल अपने को शिव से अभिन्न मानने लगता है। हे प्रिये ! भगवान् शिव स्वयं ही ऐसे व्यक्तियों को ¹तीव्र- तम शक्तिपात के द्वारा इस तरह की केवलता प्रदान करते हैं ॥ मिश्र प्रमाता वे हैं, जो कि ²पुर्यष्टक के नाम से प्रसिद्ध सूक्ष्मशरीर से संबद्ध हैं। अपने प्रारब्ध कर्मों के फलों का उपभोग करने के लिये अनेक योनियों में जन्म लेकर इन्होंने अन्ततः अपने अनुभव के आधार पर शुभ और अशुभ कर्मों में समता दृष्टि प्राप्त कर ली है और इस तरह से इनका कार्म मल पूर्ण परिपक्व हो गया है। बिना गुरु के भी इनके ऊपर शिव का अनुग्रह हो जाता है और ऐसे व्यक्ति कर्म और ज्ञान में कोई भेद नहीं देखते । इनको प्रलयाकल पशु कहा जाता है। इनका स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह का वर्णन है— मिश्र स्वरूप वाले प्रमाता प्रलयाकल कहलाते हैं। पुर्यष्टक नाम से वर्णित सूक्ष्मशरीर मात्र से ये संबद्ध रहते हैं। हे प्रिये ! अपने-अपने कर्मों के कारण ये अनेक योनियों में जन्म १. संबद्धः-क. ख. । २. स्वतीव्र-ख. ने. झ. उ. । ३. ज्ञांश्च-उ. । ४. 'फल' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'अपि' नास्ति-ख. ज. झ. । केवल और प्रलयाकल यह क्रम दिया गया है। वस्तुतः सकल, प्रलयाकल, विज्ञानकेवल यही क्रम शास्त्रसंमत है। १. तन्त्रसार (पृ० ११९-१२०), तन्त्रालोक (१३।२११-२५४) आदि में प्रथमतः मृदु, मध्य और तीव्र के भेद से तीन प्रकार का तथा इनमें से प्रत्येक के तीन भेद कर नौ प्रकार का शक्तिपात वर्णित है। तीव्रतीव्र शक्तिपात को ही यहाँ तीव्रतम शक्तिपात कहा गया है। २. पुर्यष्टक शब्द की संक्षिप्त और विस्तृत व्याख्या के लिये क्रमशः विज्ञानभैरव (पृ० ५३-५४) की तथा लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग के उपोद्घात (पृ० १३२-१३३) की टिप्पणियाँ देखिये।