भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६५ सर्वयोनिषु संभूये भोगार्थं स्वस्वकर्मणाम्। भुक्त्वा भोगानि तेषां तु कर्मसाम्ये शिवः स्वयम् ॥ सुपक्वमलकर्माणस्तान् किञ्चिदनुगृह्य च। जलतत्त्वादितत्त्वानां मध्ये लोकेश्वरास्त्रिधा ॥ इति। ²तेषां त्रिविधानां प्रमातृणाम्। वपुः स्वरूपम्। परमन्यत्। क्रोधीशत्रितयेन श्रीकण्ठन्यासपरिपाट्या क्रोधीशः ककारः, तेषां त्रितयेन। विद्यास्थेन बीजत्रित- यस्थेन। प्रकाश्यते व्यज्यते। कोऽर्थः ? बीजत्रयगतककारत्रयेण सकल-विज्ञान- लेते हैं और अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। भोगों का उपभोग पूरा हो जाने पर इनके शुभ और ¹अशुभ कर्म एकसे हो जाते हैं। उस समय भगवान् शिव स्वयं ही इनके ऊपर अनुग्रह करते हैं, क्योंकि इनका कार्म मल पूर्ण परिपक्व हो जाता है। ये तीनों प्रमाता ²जल, तेज और वायु नामक तीन तत्त्वों के अधिपति बन जाते हैं॥ इन त्रिविध प्रमाताओं का उत्कृष्ट स्वरूप, दीक्षा के बाद उत्पन्न हुआ वागीश्वरी देह, विद्यागत तीन ककार वर्णों से लक्षित होता है। ³श्रीकण्ठ न्यास की पद्धति से क्रोधीश ककार का सूचक है। विद्या में तीन क्रोधीश (ककार) हैं। विद्यास्थित इन तीन बीजों से १. संप्राप्य भोगाद्यं-ख. ने. ज. उ. । २. एषां-ख. ने. उ., एवंविधानां-ज. । १. शुभ और अशुभ कर्मों की समान स्थिति को शैव शास्त्रों में कर्मसाम्य नाम दिया गया है। इसके लिये लुप्ता. द्वि. के उपोद्घात (पृ० १५६-१५७) की टिप्पणी देखिये। २. अभी पृ० १३८-१३९ की टिप्पणी में जल से प्रकृति पर्यन्त तत्त्वों में जलतत्त्व की, पुरुष से मायान्त तत्त्वों में तेजस्तत्त्व की तथा ऊपर के तीन तत्त्वों में वायु तत्त्व की स्थिति बताई गई है। तदनुसार दीक्षाप्राप्त सकल जीव प्रकृत्यण्ड का और प्रलयाकल मायाण्ड का अधिपति बन जाता है। विज्ञानकेवल महामाया के साम्राज्य में पहुँच जाता है। सकल प्रमाता तीनों मलों से घिरा हुआ है। प्रलयाकल का कार्म मल परिपक्व हो जाता है और विज्ञानकेवल के मायीय और कार्म दोनों मल। इसका आणव मल बना रहता है। मलों की इस स्थिति के आधार पर भी सकल, प्रलयाकल और विज्ञानकेवल यही क्रम सिद्ध होता है। ३. प्रपंचसार (३।३९-४४) में श्रीकण्ठ से संवर्त पर्यन्त पचास नाम दिये गये हैं। ये अकार से क्षकार पर्यन्त पचास वर्णों के सूचक है। मन्त्रोद्धार के प्रसंग में अकार आदि वर्णों का प्रयोग न कर श्रीकण्ठ आदि पदों का ही प्रायः शास्त्रों में उल्लेख रहता है। इस तरह से अकार से क्षकार पर्यन्त मातृका (वर्णमाला) के न्यास को ही यहाँ दीपिका- कार ने श्रीकण्ठ न्यास के नाम से स्मरण किया है। तदनुसार क्रोधीश पद ककार का सूचक है।