भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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१६६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः केवल-प्रलयाकलाख्यत्रिविधपशुरूपाऽशुद्ध-शुद्ध-मिश्रप्रमातृत्रयस्वरूपं व्यञ्जयत इत्यर्थः ॥४३॥ पूर्वं विद्यास्थक्रोधीशत्रितयेन प्रमातृत्रयं लक्षयित्वेदानीं विद्यास्थश्रीकण्ठद्वादश- मध्ये आद्यदशकेनाव्यक्तम्, अनन्तरेण प्राणम्, चरमेणेशं च लक्षयति— श्रीकण्ठदशकं तद्वदव्यक्तस्य हि वाचकम् । प्राणरूपेः स्थितो देवि तद्वदेकादशः परः² ॥४४॥ श्रीकण्ठदशकं हृल्लेखात्रयवर्जितहकारादिद्वादशाक्षरोपरिगतानामकाराणां मध्ये श्रीकण्ठदशकम्, श्रीकण्ठा अकाराः, तेषां दशकम् । अव्यक्तो ³जीवोऽनादि- मलसंच्छन्नतया स्वशिवत्वापरिज्ञानकारणेन्द्रियादिजडवर्गान्तःपातितया विन्यस्तः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अनादिमलसंच्छन्नो मायाकर्मवृतोऽविभुः । शरीरी शिवतत्त्वाज्ञो⁴ भेदैकरसिको लघुः ।। इति । त्रिविध प्रमाताओं का दीक्षा परिशुद्ध स्वरूप लक्षित होता है। इसका भाव यह है कि विद्या के तीन बीजों में विद्यमान तीन ककारों से सकल, विज्ञानकेवल और प्रलयाकल नामक अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र नामक तीन प्रमाताओं का स्वरूप व्यक्त होता है ॥४३॥ विद्यास्थित तीन ककारों से तीन प्रमाताओं को लक्षित करने के बाद अब विद्यास्थित बारह श्रीकण्ठ (अकार) अक्षरों में से प्रथम दस में अव्यक्त की, ग्यारहवें में प्राण और बारहवें श्रीकण्ठ में ईश की भावना बताते हैं— विद्यागत दस श्रीकण्ठ (अकार) वर्ण परशिव के समान अव्यक्त जीव के भी वाचक हैं। हे देवि ! ग्यारहवाँ श्रीकण्ठ प्राणरूप है और बारहवाँ परपुरुष स्वरूप है ॥४४॥ तीन हृल्लेखाओं को छोड़कर हकार आदि बारह अक्षरों के आगे बारह अकार विद्या में विद्यमान हैं। इनमें से दस श्रीकण्ठ (अकार) अव्यक्त जीव के वाचक हैं। अनादि मल से घिरा हुआ जीव अपने शिवत्व को पहचान न पाने के कारण यहाँ अव्यक्त के नाम से कहा गया है, क्योंकि वह इन्द्रिय आदि जड़ पदार्थों के अधीन होकर स्वयं भी जड़सदृश हो गया है। स्वच्छन्दसंग्रह के एक श्लोक में इसका स्वरूप बताया गया है। इसका अर्थ १. भूतः-ख. ग. ने. च. छ. ज. झ. । २. इतः परम्—'परो द्वादशकस्तद्वत् पुरुषस्य च वाचकः' इति श्लोकार्धं उमातृकायां दृश्यते । ३. जीवः करणेन्द्रियसंच्छन्नतया स्वशिवत्वं जडवर्गान्तःपातितया च केवलचिन्मात्रतया न मन्यते, अनादिमलसंच्छन्नतया स्वशिवत्वा- परिज्ञानात्—मातृका। ४. —ज्ञोऽपि—मातृका।